
संवाद 24 नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले के ईवीएम को लेकर दिए गए ताज़ा बयान ने महाराष्ट्र की विपक्षी राजनीति में हलचल तेज कर दी है। लोकसभा में बोलते हुए सुप्रिया सुले ने ईवीएम और वीवीपैट पर किसी भी तरह के संदेह से साफ इनकार किया। उनका कहना था कि वह चार बार इसी प्रणाली से निर्वाचित होकर संसद पहुंची हैं, इसलिए चुनावी मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का उन्हें कोई कारण नहीं दिखता।
सुले के इस रुख ने न सिर्फ कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) जैसे सहयोगी दलों को असहज कर दिया है, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के पिछले रुख से भी इसे सीधा टकराव माना जा रहा है।
पार्टी के भीतर ही दिखी वैचारिक दरार
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद राकांपा (शरदचंद्र पवार) के ही विधायक उत्तमराव जानकर ने मालशिरस क्षेत्र में ईवीएम के बजाय मतपत्रों से पुनर्मतदान की मांग को लेकर आंदोलन छेड़ा था। इस आंदोलन को उस समय पार्टी नेतृत्व के शीर्ष स्तर से नैतिक समर्थन मिला था। स्वयं शरद पवार मार्कड़वाड़ी गांव पहुंचकर इस पहल की सराहना कर चुके थे और चुनावी प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत पर जोर दिया था।
उस दौरान ईवीएम से जुड़े आंकड़ों और परिणामों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए थे। अब सुप्रिया सुले का ताज़ा बयान उसी पृष्ठभूमि के ठीक उलट नजर आ रहा है, जिससे पार्टी के भीतर एकरूपता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
महाविकास अघाड़ी में बढ़ा तनाव
ईवीएम को लेकर कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) पहले से ही आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। विधानसभा चुनाव में हार के बाद दोनों दलों के नेता लगातार मतचोरी और चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप लगा रहे हैं। उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे भी सार्वजनिक मंचों से ईवीएम के विरोध में आवाज बुलंद करते रहे हैं।
ऐसे समय में, जब राज्य में 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव घोषित हो चुके हैं, सुप्रिया सुले का यह स्पष्ट और अलग रुख महाविकास अघाड़ी के भीतर समन्वय को और चुनौतीपूर्ण बना सकता है।
राजनीतिक संदेश क्या?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रिया सुले का बयान राष्ट्रीय स्तर पर एक संतुलित और संस्थागत भरोसे वाला संदेश देता है, लेकिन राज्य की जमीनी राजनीति में यह सहयोगी दलों के लिए झटका साबित हो सकता है। ईवीएम पर जारी बहस के बीच उनका यह रुख आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में विपक्षी रणनीति को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि ईवीएम को लेकर उठी यह नई बहस सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने महाराष्ट्र की विपक्षी राजनीति में भीतरू मतभेदों को भी उजागर कर दिया है।






