
संवाद 24 नई दिल्ली। देश भर में शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान सामने आया है। मुंबई में आयोजित एक वैचारिक मंच पर बोलते हुए आरएसएस प्रमुख ने कहा कि अपनी मांगों या नाराजगी को लेकर सड़कों पर उतरने वाली नई पीढ़ी (Gen-Z) को सीधे तौर पर ‘देश-विरोधी’ करार देना पूरी तरह गलत है। वे हमारे ही समाज और देश का हिस्सा हैं। भागवत ने माना कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में वर्तमान में कई कमियों को दूर करने की दरकार है। जब युवाओं को अपनी समस्याओं का कोई प्रशासनिक हल नजर नहीं आता, तो वे अपनी आवाज उठाने के लिए लोकतांत्रिक विरोध का रास्ता चुनते हैं।
संवाद और अपनापन ही एकमात्र रास्ता
संघ प्रमुख ने युवाओं और प्रशासनिक तंत्र के बीच संवादहीनता पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी को डांटने या अलग-थलग करने के बजाय उनके साथ सीधे संवाद की जरूरत है।
तर्क और ईमानदारी: मोहन भागवत के अनुसार, पुरानी पीढ़ियों की तुलना में आज का युवा (Gen-Z और Gen-Alpha) किसी भी बात को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करता। वे हर विषय पर सवाल पूछते हैं और तार्किक जवाब की उम्मीद रखते हैं। यह उनकी स्पष्टवादिता और ईमानदारी को दर्शाता है।
विरोध की सीमाएं: उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन अपनी बात पहुंचाने का एक माध्यम है। हालांकि, विरोध प्रदर्शन का मकसद सहमति और समाधान खोजना होना चाहिए, न कि आपस में द्वेष बढ़ाना।
आंबेडकर के विचारों और ‘शास्त्रार्थ’ की परंपरा का जिक्र
मोहन भागवत ने भारतीय बौद्धिक परंपरा का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे देश में हमेशा से ‘शास्त्रार्थ’ यानी विचारों के आदान-प्रदान के जरिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की परंपरा रही है। उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर के सिद्धांतों का हवाला देते हुए याद दिलाया कि विरोध व्यक्त करते समय संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है। आरएसएस प्रमुख के इस बयान को हालिया छात्र आंदोलनों और प्रशासनिक रवैये के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण संतुलन के रूप में देखा जा रहा है।






