क्या सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से बाहर होंगे बच्चे? नाबालिगों के अकाउंट्स पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा कड़ा कानून

​संवाद 24 नई दिल्ली।​ इंटरनेट और सोशल मीडिया की चकाचौंध भरी आभासी दुनिया में मासूमों की सुरक्षा और उनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद कड़ा और निर्णायक रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज तथा तमाम डिजिटल मंचों पर 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की अनियंत्रित पहुंच पर अंकुश लगाने के लिए एक ठोस व बाध्यकारी कानूनी ढांचा तैयार करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार करे। अदालत के इस कड़े हस्तक्षेप से साफ संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में देश में नाबालिगों द्वारा स्वतंत्र रूप से सोशल मीडिया अकाउंट संचालित करने पर प्रभावी रोक लग सकती है और बिना अभिभावकों की विधिवत मंजूरी व ई-केवाईसी के खातों का संचालन पूरी तरह नामुमकिन हो जाएगा।

​भारतीय अनुबंध कानून और टेक दिग्गजों की मनमानी में सीधा टकराव​
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने गैर-सरकारी संस्था ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस’ द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक टिप्पणी की। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फुल्का ने पीठ के समक्ष दलील दी कि मौजूदा भारतीय अनुबंध कानून (Indian Contract Act) के तहत नाबालिगों द्वारा किया गया कोई भी करार या कानूनी अनुबंध पूरी तरह अमान्य व शून्य माना जाता है। इसके बावजूद इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और स्नैपचैट जैसे वैश्विक डिजिटल प्लेटफॉर्म 13 साल के मासूम बच्चों को भी बिना किसी रोक-टोक के अकाउंट बनाने की छूट दे रहे हैं, जो सीधे तौर पर भारतीय वैधानिक व्यवस्था और संविधान की मूल भावना के विपरीत है।

​केवल एडवाइजरी नहीं, कानूनी बाध्यता तय करे सरकार: अदालत की दो टूक​
अदालत ने सुनवाई के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया कि डिजिटल दिग्गजों के लिए केवल स्वैच्छिक या सलाहकारी दिशा-निर्देश जारी करना अब कोई समाधान नहीं है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से दो टूक कहा कि इस व्यवस्था को महज कागजी एडवाइजरी तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे इंटरमीडियरी नियमों के तहत एक वैधानिक और सख्त दंडात्मक प्रावधान का रूप दिया जाए। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को अपने तकनीकी सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम को हर हाल में भारतीय कानूनों के अनुरूप ढालना ही होगा; वे अपनी मनमानी नीतियां भारतीय सीमाओं और यहां के नागरिकों पर नहीं थोप सकतीं।

​साइबर बुलिंग और शोषण के साए में बचपन, टेक कंपनियों की लापरवाही उजागर​
याचिका में सोशल मीडिया कंपनियों की गैर-जिम्मेदाराना कार्यप्रणाली की परतें खोलते हुए बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं उठाई गईं। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पॉक्सो अधिनियम और अन्य सख्त दंडात्मक कानूनों के बावजूद इंटरनेट कंपनियां बच्चों से जुड़े यौन शोषण, साइबर बुलिंग, अवांछित आपत्तिजनक कंटेंट और हिंसक सामग्री को रोकने के लिए जरूरी ऑटोमेटेड फिल्टरिंग टूल्स तथा उम्र सत्यापन प्रणाली को ईमानदारी से लागू करने में पूरी तरह नाकाम रही हैं। परिणाम यह है कि बच्चे किसी भी निगरानी के अभाव में डार्क वेब और डिजिटल अपराधों के गंभीर दलदल में धकेले जा रहे हैं, जहां मानसिक अवसाद, अवसाद और डिजिटल ब्लैकमेलिंग की घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं।

​नए डेटा कानून का इंतजार नहीं, वर्तमान नियमों से ही कसी जा सकती है नकेल​
इस अति-संवेदनशील मामले पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया कि केंद्र सरकार बच्चों की सुरक्षा के इस विषय को अत्यंत गंभीरता से ले रही है और इस पर समग्रता से विचार कर समुचित कानूनी व नीतिगत कदम उठाएगी। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता फुल्का ने पीठ के समक्ष यह महत्वपूर्ण तथ्य रखा कि इस दिशा में तुरंत कार्रवाई करने के लिए किसी नए डेटा संरक्षण कानून या आगामी नियमों की लंबी प्रतीक्षा करने की कतई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वर्तमान भारतीय कानूनों और आईटी नियमों के तहत सरकार के पास पहले से ही नाबालिगों के हितों की रक्षा हेतु कंपनियों पर शर्तें थोपने का पूरा अधिकार मौजूद है।

​पैरेंटल कंट्रोल और ई-केवाईसी से बदलेगा डिजिटल परिदृश्य, अभिभावकों को बड़ी राहत​
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब सोशल मीडिया कंपनियों के लिए उम्र सत्यापन के नियमों को बाईपास करना नामुमकिन हो जाएगा। यदि केंद्र सरकार अदालत के सुझाव के अनुसार नए नियम अधिसूचित करती है, तो हर नए व पुराने अकाउंट के लिए माता-पिता की स्पष्ट सहमति, पहचान पत्र आधारित ई-केवाईसी (e-KYC) और उम्र की पुख्ता जांच को अनिवार्य बनाया जाएगा। शीर्ष अदालत की इस पहल से देश के उन करोड़ों अभिभावकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी है, जो लंबे समय से डिजिटल स्क्रीन के जानलेवा आकर्षण, साइबर खतरों और गेमिंग-सोशल मीडिया की लत से अपने बच्चों को बचाने के लिए कड़े नियमों की राह देख रहे थे।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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