
संवाद 24 नई दिल्ली। देश की राजनीति में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा वर्ष 2029 तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) शासित सभी 21 राज्यों में इसे लागू करने के संकल्प के बाद अब सत्ता पक्ष के भीतर से ही सधे हुए और सतर्क स्वर उभरने लगे हैं। गृह मंत्री के इस महत्वाकांक्षी रोडमैप पर गठबंधन के तीन सबसे अहम स्तंभों – तेलुगु देशम पार्टी (TDP), जनता दल यूनाइटेड (JDU) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) – ने खुलकर हामी भरने के बजाय ‘वेट एंड वॉच’ और व्यापक आम सहमति की शर्त रखकर केंद्र की राह में राजनीतिक पेंच फंसा दिया है।
2029 का ब्लूप्रिंट और शाह का भरोसा
मुंबई में एक प्रेस वार्ता के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया था कि अगले लोकसभा चुनाव (2029) से पहले एनडीए के शासन वाले सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के बाद, यूसीसी भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक और चुनावी संकल्प पत्र का सबसे प्रमुख एजेंडा रहा है। केंद्र सरकार ने राजनीतिक संवेदनशीलता और संवैधानिक जटिलताओं को देखते हुए इसे पूरे देश में एकमुश्त थोपने के बजाय राज्य-दर-राज्य आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम शुरू किया है। इस क्रम में उत्तराखंड में कानून प्रभाव में आ चुका है, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की विधानसभाओं ने प्रस्ताव पारित कर दिए हैं। वहीं राजस्थान, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
सहयोगियों का रुख: समर्थन नहीं, पहले ‘आम सहमति’
गृह मंत्री के बयान के फौरन बाद एनडीए के प्रमुख घटक दलों के बयानों ने साफ कर दिया है कि केंद्र की इस राह पर सहयोगियों का समर्थन बिना शर्तों के नहीं मिलने वाला:
तेलुगु देशम पार्टी (TDP): आंध्र प्रदेश में सरकार चला रही टीडीपी के संसदीय दल के नेता लवू श्री कृष्ण देवरायालु ने दो टूक कहा कि इस विषय पर अभी गठबंधन स्तर पर कोई औपचारिक चर्चा नहीं हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी समाज के सभी तबकों, अल्पसंख्यकों और हितधारकों से बातचीत और उनकी चिंताओं के समाधान के बाद ही कोई अंतिम रुख तय करेगी।
जनता दल (यूनाइटेड): बिहार में भाजपा के प्रमुख साझीदार जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने संकेत दिया कि वे जल्द ही गृह मंत्री अमित शाह से व्यक्तिगत रूप से मिलकर इस मुद्दे पर पार्टी का पक्ष रखेंगे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का रुख हमेशा से यह रहा है कि यूसीसी जैसे संवेदनशील सामाजिक विषय को केवल राजनीतिक बहुमत के आधार पर लागू नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि सभी समुदायों के साथ व्यापक विचार-विमर्श जरूरी है।
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास): केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी संतुलन साधते हुए कहा कि उनकी पार्टी भारत की बहुलतावादी संस्कृति, सामाजिक विविधता और संविधान द्वारा अनुसूचित जनजातियों एवं विभिन्न समुदायों को दिए गए विशेष संरक्षण का सम्मान करती है। उन्होंने मांग की कि सरकार पहले यूसीसी का विस्तृत मसौदा (Draft) सार्वजनिक करे, ताकि उस पर खुली बहस हो सके।
राज्यवार रणनीति और आगे की राह
गठबंधन के भीतर यह सतर्कता अकारण नहीं है। टीडीपी और जेडीयू दोनों ही ऐसे क्षेत्रीय दल हैं जिनका एक बड़ा वोट बैंक अल्पसंख्यक, पिछड़े और सामाजिक रूप से संवेदनशील समुदायों से जुड़ा है। ऐसे में बिना किसी ठोस सामाजिक आश्वासन के यूसीसी के समर्थन में खड़ा होना इन दलों के लिए क्षेत्रीय राजनीति में जोखिम भरा हो सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड या असम के सामाजिक ढांचे की तुलना बिहार या आंध्र प्रदेश से नहीं की जा सकती। जब तक केंद्र सरकार ड्राफ्ट के जरिए यह स्पष्ट नहीं करती कि आदिवासियों, जनजातीय परंपराओं और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों को किस हद तक छूट मिलेगी, तब तक सहयोगियों की यह झिझक खत्म होना मुश्किल है। स्पष्ट है कि 2029 तक 21 राज्यों में यूसीसी का ध्वज फहराने के लिए भाजपा को विपक्ष से पहले अपने ही कुनबे को एक राय पर लाना होगा।






