इंजीनियर्स डे 15 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है? सर एम. विश्वेश्वरैया की वह कहानी जिसने भारत के विकास की दिशा बदली

संवाद 24 गीता सिंह। भारत में हर साल 15 सितंबर को राष्ट्रीय अभियंता दिवस यानी Engineers’ Day मनाया जाता है। यह दिन देश के इंजीनियरों के योगदान को सम्मान देने के साथ उस महान इंजीनियर और प्रशासक को याद करने का अवसर भी है, जिनकी दूरदर्शिता ने सिंचाई, जल प्रबंधन, बुनियादी ढांचे, औद्योगिकीकरण और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में भारत को नई दिशा दी। बात हो रही है सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की, जिन्हें आमतौर पर सर एम. विश्वेश्वरैया या सर एमवी के नाम से जाना जाता है। 15 सितंबर 2026 को उनकी 165वीं जयंती है और इसी अवसर पर देश इंजीनियर्स डे मना रहा है।

आखिर 15 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है इंजीनियर्स डे?
भारत में इंजीनियर्स डे मनाने के लिए 15 सितंबर की तारीख किसी तकनीकी उपलब्धि की तारीख नहीं, बल्कि सर एम. विश्वेश्वरैया की जन्मतिथि से जुड़ी है। उनका जन्म 15 सितंबर 1861 को कर्नाटक के मुद्देनहल्ली में हुआ था। उनके असाधारण योगदान को सम्मान देने के लिए भारत में 1968 से उनकी जयंती को राष्ट्रीय अभियंता दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। यह दिन केवल एक महान इंजीनियर की स्मृति का अवसर नहीं है, बल्कि इंजीनियरिंग को राष्ट्र निर्माण की शक्ति के रूप में देखने का संदेश भी देता है।

कौन थे सर एम. विश्वेश्वरैया, जिनका नाम आज भी मिसाल है?
विश्वेश्वरैया ऐसे दौर में इंजीनियर बने जब भारत में आधुनिक तकनीकी शिक्षा और बड़े सार्वजनिक निर्माण कार्य अभी शुरुआती अवस्था में थे। उन्होंने इंजीनियरिंग की शिक्षा पुणे के कॉलेज ऑफ साइंस से प्राप्त की और इसके बाद बॉम्बे सरकार के लोक निर्माण विभाग यानी PWD में सहायक अभियंता के रूप में काम शुरू किया। यहीं से उनके लंबे और प्रभावशाली इंजीनियरिंग करियर की शुरुआत हुई।
उनकी विशेषता केवल इंजीनियरिंग की तकनीकी समझ नहीं थी। वे किसी समस्या को केवल तत्काल समाधान के नजरिये से नहीं देखते थे, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर जोर देते थे जो लंबे समय तक समाज के काम आए। जल प्रबंधन, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, उद्योग, शिक्षा और प्रशासन—उनकी कार्यशैली इन सभी क्षेत्रों में दिखाई देती है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से उपलब्ध सामग्री भी उन्हें सिंचाई डिजाइन, जलाशयों, बांधों, पेयजल आपूर्ति और ड्रेनेज योजनाओं का विशेषज्ञ तथा तकनीकी शिक्षा और औद्योगिकीकरण का मजबूत समर्थक बताती है।

एक ऐसा आविष्कार जिसने बाढ़ नियंत्रण की सोच बदल दी
सर एमवी के इंजीनियरिंग करियर की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में ऑटोमैटिक वियर फ्लडगेट प्रणाली शामिल है। उन्होंने ऐसा सिस्टम विकसित और पेटेंट किया, जिसकी मदद से जलाशय में पानी का स्तर नियंत्रित करने में सहायता मिलती थी। यह प्रणाली 1903 में पुणे के पास खड़कवासला जलाशय में स्थापित की गई।
उस समय यह काम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पानी का प्रबंधन केवल सिंचाई का विषय नहीं था, बल्कि बाढ़ से सुरक्षा और उपलब्ध जल के बेहतर इस्तेमाल से भी जुड़ा था। विश्वेश्वरैया की सोच ने इंजीनियरिंग को केवल निर्माण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन से जोड़ा।

कृष्णराज सागर बांध: दूरदर्शिता की बड़ी मिसाल
मैसूर क्षेत्र में जल प्रबंधन के लिए कृष्णराज सागर (KRS) बांध उनकी सबसे चर्चित परियोजनाओं में गिना जाता है। कावेरी नदी पर विकसित इस परियोजना ने सिंचाई और जल भंडारण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरकारी और तकनीकी स्रोतों में KRS को विश्वेश्वरैया की इंजीनियरिंग विरासत से जुड़े प्रमुख कार्यों में शामिल किया गया है।
KRS की कहानी यह भी बताती है कि किसी बड़े बांध का महत्व केवल उसके निर्माण में नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद दीर्घकालिक जल प्रबंधन की सोच में होता है। आज जब भारत के सामने जल संरक्षण, भूजल स्तर और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां हैं, तब विश्वेश्वरैया की जल-केंद्रित इंजीनियरिंग दृष्टि और भी प्रासंगिक दिखाई देती है।

हैदराबाद से विशाखापत्तनम तक दिखी उनकी इंजीनियरिंग दृष्टि
सर एमवी का काम किसी एक क्षेत्र या एक रियासत तक सीमित नहीं रहा। हैदराबाद में बाढ़ नियंत्रण से जुड़े कार्यों और विशाखापत्तनम बंदरगाह को समुद्री कटाव से बचाने के प्रयासों में भी उनका योगदान बताया जाता है।
यह उनके काम की व्यापकता को दिखाता है। एक तरफ वे बांध और सिंचाई की योजनाओं पर काम कर रहे थे, तो दूसरी तरफ शहरी बाढ़, बंदरगाह और औद्योगिक विकास जैसी अलग-अलग समस्याओं के तकनीकी समाधान तलाश रहे थे।

इंजीनियर से प्रशासक बने तो बदलने लगी मैसूर की तस्वीर
विश्वेश्वरैया की प्रतिभा केवल इंजीनियरिंग परियोजनाओं तक सीमित नहीं रही। वे 1912 से 1918 तक मैसूर के दीवान रहे। इस दौरान उन्होंने राज्य में औद्योगिक विकास, शिक्षा और संस्थागत निर्माण पर जोर दिया। इसी कारण उन्हें अक्सर ‘आधुनिक मैसूर का निर्माता’ कहा जाता है।
उनसे जुड़े प्रमुख संस्थागत प्रयासों में भद्रावती का आयरन एंड स्टील प्लांट, मैसूर साबुन फैक्ट्री और स्टेट बैंक ऑफ मैसूर जैसे उपक्रमों का उल्लेख मिलता है। तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण रही।

सर’ की उपाधि और भारत रत्न तक का सफर
विश्वेश्वरैया के योगदान को देश-विदेश में सम्मान मिला। उन्हें ब्रिटिश सरकार ने नाइटहुड की उपाधि दी, जिसके बाद उनके नाम के साथ ‘सर’ जुड़ा। स्वतंत्र भारत ने भी उनकी सेवाओं को सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा। 1955 में उन्हें भारत रत्न प्रदान किया गया।
उनकी खास बात यह थी कि उम्र बढ़ने के साथ भी देश के विकास को लेकर उनका उत्साह कम नहीं हुआ। सरकारी अभिलेखों में उल्लेख है कि 90 वर्ष की आयु के बाद भी वे बांधों और नदियों के विकास की जरूरत पर जोर देते रहे।

आज के इंजीनियरों के लिए क्या संदेश छोड़ गए विश्वेश्वरैया?
आज इंजीनियरिंग की दुनिया बांधों और पुलों से बहुत आगे निकल चुकी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष तकनीक, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्र तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे समय में इंजीनियर्स डे का महत्व केवल पेशेवर उपलब्धियों को गिनने तक सीमित नहीं रह जाता।
विश्वेश्वरैया का जीवन बताता है कि इंजीनियरिंग का वास्तविक उद्देश्य केवल मशीन या ढांचा तैयार करना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं का टिकाऊ और वैज्ञानिक समाधान खोजना है। उनके लिए तकनीक राष्ट्र निर्माण का माध्यम थी। यही दृष्टिकोण आज के इंजीनियरों के लिए भी महत्वपूर्ण है, खासकर तब जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अपनी तकनीकी और औद्योगिक क्षमता को मजबूत कर रहा है।

सिर्फ जयंती नहीं, इंजीनियरिंग की जिम्मेदारी याद करने का दिन
इंजीनियर्स डे पर सर एम. विश्वेश्वरैया को याद करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी विरासत किसी एक बांध, जलाशय या औद्योगिक परियोजना तक सीमित नहीं है। उनकी सबसे बड़ी विरासत समस्या को पहचानने, वैज्ञानिक तरीके से उसका समाधान खोजने और उस समाधान को बड़े सामाजिक हित से जोड़ने की सोच है।
15 सितंबर इसलिए केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह भारत की उस इंजीनियरिंग परंपरा को याद करने का दिन है जिसने सीमित संसाधनों के दौर में भी बड़े सपने देखने और उन्हें तकनीक के जरिए जमीन पर उतारने का साहस दिखाया। सर एम. विश्वेश्वरैया की कहानी आज भी यही सवाल सामने रखती है—जब देश के सामने नई चुनौतियां हों, तो क्या हमारी इंजीनियरिंग केवल तकनीक बनाएगी, या भविष्य भी गढ़ेगी?

Geeta Singh
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