विभाजन की त्रासदी और स्वयंसेवकों का संकल्प

संवाद 24 डॉ. धरवेश कठेरिया। किसी राष्ट्र की स्मृति केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं बनती, उसमें वे पीड़ाएँ भी दर्ज होती हैं जिन्हें पीढ़ियाँ अपने साथ लेकर आगे बढ़ती हैं। भारत की स्वतंत्रता के साथ विभाजन की ऐसी ही त्रासदी जुड़ी, जिसने लाखों परिवारों को अपनी जड़ों से उखाड़ दिया। भारत सरकार ने विभाजन के प्रभाव को लगभग दो करोड़ लोगों के जीवन से जुड़ा बताया है। पंजाब और बंगाल इस त्रासदी के प्रमुख केंद्र बने, जहाँ घर, आजीविका और सामाजिक पहचान पीछे छूट गई और असंख्य लोग शरणार्थी बनकर अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़े।

इसी मानवीय संकट के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका सामने आती है। संघ के आधिकारिक 1947 अभिलेख के अनुसार, विभाजन को हिंदू समाज और स्वयंसेवकों के लिए गहरा आघात मानते हुए संगठन ने विस्थापितों की सहायता के लिए 3,000 राहत शिविर आयोजित किए। इन शिविरों में भोजन, आश्रय और आवश्यक मानवीय सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।

सेवा को संगठनात्मक रूप 1950 में और अधिक स्पष्टता मिली। 7 मार्च, 1950 को सरसंघचालक श्री गुरुजी, माधव सदाशिव गोलवलकर ने पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की सहायता के लिए सार्वजनिक अपील की। उन्होंने कहा: “उन लाखों सताये हुए और बेघर भाई-बहिनों को, जो यहाँ आ रहे हैं, प्रेम और आत्मीयता से अपनाना अत्यन्त आवश्यक है।” श्री गुरुजी, सरसंघचालक, वक्तव्य, 1950

गुरुजी ने पाकिस्तान में रह रहे “डेढ़ करोड़ से अधिक हिन्दु” के भारत आने की इच्छा का उल्लेख करते हुए समाज से रुपये-पैसे, खाद्य सामग्री और वस्त्र जुटाने का आग्रह किया। यह संख्या उसी वक्तव्य में दर्ज अनुमान थी। उनके आवाहन में शरणार्थियों की सहायता को केवल सरकार का दायित्व न मानकर समाज की सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में देखने की भावना स्पष्ट थी। इसी भावना को 12 मार्च, 1950 को नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में हुई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की विशेष बैठक के प्रस्ताव ने औपचारिक रूप दिया। “विभाजन के दुष्परिणाम और हमारा कर्तव्य” शीर्षक वाले प्रस्ताव में कहा गया: “पाकिस्तान-स्थित हिन्दु भारतीय राष्ट्रीयता से न तो वंचित हुए हैं और न हो ही सकते हैं।”

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा, प्रस्ताव, 1950 – प्रस्ताव में पीड़ितों की सहायता के लिए धन एकत्र करने, स्वयंसेवक भेजने और आवश्यक उपाय करने का आह्वान किया गया। इससे संघ के लिए सेवा केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संगठित सामाजिक उत्तरदायित्व थी। पंजाब में हिंदू सहायता समिति और पंजाब राहत समिति तथा पूर्वी बंगाल के लिए वास्तुहारा सहायता समिति जैसे प्रयासों का भी संघीय स्रोतों में उल्लेख मिलता है। भोजन और आश्रय के साथ चिकित्सा, बिछड़े परिवारों की सहायता और अन्य मानवीय कार्यों में स्वयंसेवकों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है।

विभाजन के इस दौर में महात्मा गांधी से जुड़ा प्रसंग भी उल्लेखनीय है। संघ के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 14 सितंबर, 1947 को दिल्ली की भंगी कॉलोनी में गांधीजी ने लगभग 500 स्वयंसेवकों को संबोधित किया और उनके अनुशासन, सादगी तथा अस्पृश्यता के अभाव से प्रभावित होने की बात कही।

विभाजन के बाद संघ की दृष्टि राहत से आगे राष्ट्रीय अखंडता के प्रश्न तक भी पहुँची। संघ के अभिलेख के अनुसार, श्री गुरुजी 17 अक्टूबर, 1947 को श्रीनगर गए और महाराजा हरि सिंह से कश्मीर के भारत में विलय का आग्रह किया। कश्मीर का विलय अनेक राजनीतिक, प्रशासनिक और सैन्य परिस्थितियों का परिणाम था, फिर भी यह प्रसंग उस समय संघ की राष्ट्रीय दृष्टि को सामने रखता है।

विभाजन की व्याख्या को लेकर अलग-अलग मत रहे हैं। इसलिए संघ के अभिलेखों को पूरे इतिहास का अंतिम निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा, लेकिन उसकी भूमिका समझने के लिए उसके प्राथमिक दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं। भारत सरकार ने 2021 में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ घोषित किया।

विभाजन की पीड़ा आज भी इतिहास की स्मृति में जीवित है। उसका सबसे बड़ा संदेश यही है कि संकट की घड़ी में समाज अपने लोगों को अकेला न छोड़े। स्वयंसेवकों का सेवा-संकल्प इस विचार को रेखांकित करता है कि राष्ट्र की शक्ति केवल सत्ता और संस्थाओं में नहीं, बल्कि संकटग्रस्त समाज के साथ खड़ी होने वाली संगठित संवेदना में भी निहित होती है।

Email: dkskatheriya@gmail.com

Samvad 24 Office
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