
संवाद 24 गीता सिंह। देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से लगातार 13वीं बार राष्ट्र को संबोधित किया। इसके साथ ही उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक रिकॉर्ड बनाया, जिसने उन्हें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार 13 बार स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से संबोधन करने वाला दूसरा प्रधानमंत्री बना दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में पहली बार लाल किले से स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को संबोधित किया था और 2026 तक यह सिलसिला लगातार जारी रहा। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री का संबोधन भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा का एक प्रमुख प्रतीक बन चुका है। 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराने और देश को संबोधित करने की परंपरा स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों से चली आ रही है। सरकारी अभिलेखों में जवाहरलाल नेहरू के 1947 से लेकर 1963 तक के लगातार स्वतंत्रता दिवस संबोधनों का रिकॉर्ड दर्ज है।
नेहरू के बाद मोदी, लेकिन रिकॉर्ड अभी दूर
लगातार 13 स्वतंत्रता दिवस संबोधन का आंकड़ा प्रधानमंत्री मोदी को जवाहरलाल नेहरू के बाद दूसरे स्थान पर रखता है। नेहरू ने स्वतंत्र भारत के शुरुआती दौर में लगातार 17 बार 15 अगस्त को लाल किले से राष्ट्र को संबोधित किया था। सरकारी रिकॉर्ड में 15 अगस्त 1947 से 1963 तक उनके लगातार संबोधनों की सूची उपलब्ध है। प्रधानमंत्री मोदी का 13वां संबोधन इस रिकॉर्ड से चार कदम पीछे है, लेकिन यह उपलब्धि इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि इससे पहले इंदिरा गांधी के लगातार स्वतंत्रता दिवस संबोधनों का रिकॉर्ड उनके नाम था। 2025 में मोदी ने लगातार 12वीं बार लाल किले से संबोधित कर इंदिरा गांधी के लगातार संबोधनों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ा था। इस तरह 2026 का संबोधन केवल एक और स्वतंत्रता दिवस भाषण नहीं रहा, बल्कि प्रधानमंत्री के लगातार लंबे राजनीतिक कार्यकाल और लाल किले की परंपरा के साथ उनके जुड़ाव का नया पड़ाव बन गया।
2014 से शुरू हुआ सफर आज 13वें पड़ाव तक पहुंचा
नरेंद्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद पहली बार लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित किया था। उस समय उनका संबोधन लगभग 65 मिनट का था। इसके बाद हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर उनका संबोधन देश की राजनीतिक और नीतिगत प्राथमिकताओं को सामने रखने का महत्वपूर्ण मंच बनता गया। 2026 का संबोधन इस लगातार यात्रा का 13वां पड़ाव है। इन वर्षों में उनके भाषणों में ‘न्यू इंडिया’, आत्मनिर्भर भारत, स्वच्छता, डिजिटल भारत, मेक इन इंडिया, महिला सशक्तीकरण, युवा शक्ति और विकसित भारत जैसे विषय प्रमुखता से सामने आए। 2026 के संबोधन में भी युवाओं और विकसित भारत@2047 की दिशा को महत्वपूर्ण स्थान मिला। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह में Gen Z और ‘युवा शक्ति’ की ऊर्जा तथा आकांक्षाओं को विशेष महत्व दिया गया।
80वें स्वतंत्रता दिवस पर ‘विकसित भारत’ का संदेश
2026 का स्वतंत्रता दिवस भारत के लिए विशेष अवसर है। देश स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है और इस अवसर पर सरकार की ओर से 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्रमुख राष्ट्रीय विजन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रधानमंत्री के संबोधन में भी स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को याद करते हुए उनके सपनों से विकसित भारत के लक्ष्य को जोड़ा गया। इस वर्ष के समारोह की थीम में युवा शक्ति की भूमिका को प्रमुखता दी गई। साथ ही ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने का अवसर भी स्वतंत्रता दिवस समारोह से जुड़ा रहा। प्रधानमंत्री कार्यालय की जानकारी के अनुसार लाल किले पर ध्वजारोहण के बाद सेना के बैंड द्वारा ‘वंदे मातरम्’ और उसके बाद राष्ट्रगान की प्रस्तुति की गई।
भाषण की लंबाई में भी आया बदलाव
प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधनों की एक खास पहचान उनके लंबे भाषण भी रहे हैं। 2025 में उन्होंने 103 मिनट का संबोधन दिया था, जिसे उनके कार्यकाल का सबसे लंबा स्वतंत्रता दिवस भाषण बताया गया। 2024 में उनका भाषण 98 मिनट का था। इसके विपरीत 2026 का भाषण लगभग 78 मिनट का रहा, जिसे पिछले चार वर्षों में उनका सबसे छोटा संबोधन बताया गया है। यह बदलाव केवल समय की दृष्टि से देखने के बजाय भाषण की शैली में आए परिवर्तन के रूप में भी देखा जा सकता है। लगातार लंबे संबोधनों के बाद इस बार अपेक्षाकृत संक्षिप्त भाषण में भी प्रधानमंत्री ने युवाओं, आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय सुरक्षा, तकनीक और विकसित भारत जैसे व्यापक विषयों को सामने रखा।
लाल किले का संबोधन क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
भारत में प्रधानमंत्री का स्वतंत्रता दिवस संबोधन केवल सरकारी योजनाओं की जानकारी देने वाला भाषण नहीं माना जाता। लाल किले की प्राचीर से दिया गया संबोधन सरकार के अगले चरण की प्राथमिकताओं और राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श की दिशा का संकेत भी देता है। 1947 में जवाहरलाल नेहरू के पहले संबोधन से शुरू हुई यह परंपरा आज भारतीय लोकतंत्र की पहचान का हिस्सा बन चुकी है। प्रधानमंत्री कार्यालय और सरकारी अभिलेखों में स्वतंत्रता दिवस के प्रधानमंत्रियों के संबोधनों का अलग रिकॉर्ड उपलब्ध है, जो इस परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है। प्रधानमंत्री मोदी के लिए भी यह मंच पिछले 13 वर्षों में सरकार की उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य की योजनाओं को सीधे देश के सामने रखने का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है।
इस रिकॉर्ड का राजनीतिक महत्व कितना बड़ा?
लगातार 13 स्वतंत्रता दिवस संबोधन प्रधानमंत्री मोदी के लंबे कार्यकाल को रेखांकित करता है। 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भी यह परंपरा जारी रही। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार मोदी ने 9 जून 2024 को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। हालांकि केवल लगातार भाषणों की संख्या को किसी सरकार के प्रदर्शन का पैमाना मानना उचित नहीं होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की सफलता का आकलन नीतियों, आर्थिक प्रदर्शन, सामाजिक प्रभाव, रोजगार, प्रशासन और जनता के अनुभव जैसे अनेक पैमानों पर होता है। लेकिन राजनीतिक इतिहास के संदर्भ में यह रिकॉर्ड प्रधानमंत्री के लंबे कार्यकाल की एक स्पष्ट तस्वीर जरूर प्रस्तुत करता है।
नेहरू का 17 साल का रिकॉर्ड अभी भी सबसे आगे
मोदी के 13वें लगातार संबोधन के बावजूद जवाहरलाल नेहरू का 17 लगातार स्वतंत्रता दिवस संबोधनों का रिकॉर्ड अभी कायम है। 1947 से 1963 तक नेहरू ने हर स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से राष्ट्र को संबोधित किया। सरकारी अभिलेखों में इन वर्षों के उनके भाषण दर्ज हैं। मोदी अब इस रिकॉर्ड के काफी करीब पहुंच चुके हैं। यदि उनका लाल किले से स्वतंत्रता दिवस संबोधन आगे भी लगातार जारी रहता है, तो आने वाले वर्षों में नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी और उसे पीछे छोड़ने की संभावना राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन सकती है। हालांकि यह भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
13वां संबोधन सिर्फ आंकड़ा नहीं, बदलते भारत की तस्वीर भी
2014 से 2026 के बीच भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक और समाज में कई बड़े बदलाव हुए हैं। प्रधानमंत्री के लाल किले से दिए गए संबोधनों में भी इन बदलावों की झलक दिखाई देती रही है। शुरुआती वर्षों में स्वच्छता, जनभागीदारी और बुनियादी सुविधाओं पर जोर दिखाई दिया, जबकि बाद के वर्षों में आत्मनिर्भरता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, विनिर्माण, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा और विकसित भारत जैसे विषय अधिक प्रमुख हुए। 2026 के संबोधन में भी तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उल्लेख सामने आया। साथ ही युवा शक्ति और 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य पर जोर दिया गया।
इतिहास की दौड़ में मोदी के नाम एक और पड़ाव
80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार 13वां संबोधन भारतीय राजनीतिक इतिहास में दर्ज हो गया है। इसके साथ वह जवाहरलाल नेहरू के बाद ऐसे दूसरे प्रधानमंत्री बन गए हैं, जिन्होंने लगातार 13 स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से राष्ट्र को संबोधित किया है। नेहरू का 17 लगातार संबोधनों का रिकॉर्ड अभी भी सबसे आगे है, लेकिन मोदी का 13वां संबोधन उस ऐतिहासिक दूरी को काफी कम कर चुका है। 2014 में शुरू हुआ यह सिलसिला अब भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण परंपरा का हिस्सा बन चुका है। सबसे अहम बात यह है कि लाल किले से हर वर्ष दिया जाने वाला भाषण केवल प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा का रिकॉर्ड नहीं होता। यह उस समय के भारत की प्राथमिकताओं, चुनौतियों और भविष्य की कल्पना का दस्तावेज भी बनता है। 2026 में ‘युवा शक्ति’, ‘वंदे मातरम्’ और ‘विकसित भारत@2047’ के संदेश के साथ प्रधानमंत्री मोदी का 13वां संबोधन इसी बदलती राष्ट्रीय प्राथमिकता की एक और तस्वीर पेश करता है।






