
संवाद 24 हिमाचल प्रदेश। शांत वादियों और घने जंगलों के बीच बसे हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में आधी रात एक ऐसा खौफनाक मंजर सामने आया, जिसकी कल्पना किसी ने सपने में भी नहीं की थी। न आसमान में काले बादलों का डेरा था, न बारिश की एक बूंद गिरी थी, मौसम पूरी तरह साफ था—मगर अचानक आई गड़गड़ाहट और पानी के भीषण उफान ने पूरे इलाके में अफरा-तफरी मचा दी। पार्वती जल विद्युत परियोजना (चरण-दो) की टनल में अचानक हुए भीषण रिसाव के चलते सैंज घाटी की रैला पंचायत अंतर्गत पालचरा गांव में पानी और मलबे का ऐसा सैलाब उमड़ा कि लोगों को अपनी जान बचाने के लिए बदहवास होकर अंधेरे में ही घरों से भागना पड़ा।
आधी रात खुली आंखें और सामने था मौत जैसा मंजर
घटना आधी रात के समय की बताई जा रही है, जब पालचरा गांव के अधिकांश लोग गहरी नींद में सो रहे थे। अचानक टनल की तरफ से तेज धमाके जैसी आवाज और पानी का भारी शोर गूंजने लगा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पार्वती हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट फेज-2 के एडिट-5 (Adit-5) में प्रेशर वॉल के अचानक लीक होने से भारी मात्रा में पानी बेकाबू होकर बाहर निकल पड़ा।
पानी का बहाव इतना तीव्र और प्रचंड था कि उसने रास्ते में आने वाली हर चीज को अपनी चपेट में ले लिया। बिना किसी प्राकृतिक आपदा या मानसूनी बारिश के साफ मौसम में अचानक आए इस कृत्रिम सैलाब को देखकर ग्रामीण स्तब्ध रह गए। चारों तरफ चीख-पुकार मच गई और लोग अपने बच्चों व बुजुर्गों को गोद में उठाकर ऊंचे सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे।
एनएचपीसी की डंपिंग साइट बनी काल, 15 परिवारों का आशियाना मलबे में तब्दील
इस तकनीकी विफलता ने तब और भी विकराल रूप ले लिया जब पानी का तेज बहाव सीधे एनएचपीसी (NHPC) की आधिकारिक डंपिंग साइट से टकराया। वर्षों से वहां एकत्रित टन-दर-टन गाद, मिट्टी और भारी पत्थर पानी की तेज धार के साथ बहकर नीचे बसे रिहायशी क्षेत्र की ओर रुख कर गए।
देखते ही देखते कीचड़, मलबा और पानी का यह रेला पालचरा गांव के मकानों, दुकानों और स्थानीय पर्यटन पर आधारित होमस्टे में घुस गया। प्राथमिक सूचना के मुताबिक, इस हादसे की सीधी चपेट में आने से करीब 15 परिवारों के घरों को भारी क्षति पहुंची है। कमरों के भीतर कई फीट तक कीचड़ भर गया, घरेलू सामान, राशन और कीमती उपकरण मलबे में दबकर नष्ट हो गए। गांव के संपर्क रास्ते कट गए और लोगों की आजीविका के साधन पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील हो गए। कई परिवारों ने ठंड और दहशत के बीच रात अपने दूरदराज के रिश्तेदारों के घरों या खुले शेडों में शरण लेकर काटी।
सुरक्षा मानकों और लापरवाही पर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा
इस अप्रत्याशित तबाही के बाद सुबह होते ही पूरे क्षेत्र में गहरा रोष और भय का माहौल देखा गया। ग्रामीणों का साफ आरोप है कि यह कोई कुदरती आपदा नहीं, बल्कि परियोजना प्रबंधन की घोर लापरवाही और सुरक्षा मानकों की अनदेखी का प्रत्यक्ष परिणाम है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि टनल और प्रेशर वॉल के रख-रखाव में भारी ढिलाई बरती गई, जिसके चलते यह रिसाव हुआ। इसके अलावा रिहायशी इलाकों के ठीक ऊपर अनियोजित तरीके से बनाई गई डंपिंग साइट हमेशा से एक टाइम बम की तरह लटकी हुई थी, जिसे लेकर पहले भी चिंताएं जताई गई थीं। यदि यही रिसाव और तेज होता, तो पूरा गांव जमींदोज हो सकता था और दर्जनों जानें जा सकती थीं।
प्रशासन से तत्काल मुआवजे और स्थायी समाधान की गुहार
घटना के बाद प्रभावित ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और परियोजना अधिकारियों से तत्काल मौके का संयुक्त निरीक्षण करने की मांग की है। ग्रामीणों की मुख्य मांगें हैं:
नुकसान का त्वरित आकलन: राजस्व और तकनीकी टीम तुरंत मौके पर पहुंचकर सभी 15 पीड़ित परिवारों के मकानों, दुकानों और सामान के नुकसान का पारदर्शी मूल्यांकन करे।
उचित मुआवजा और पुनर्वास: प्रभावित लोगों को तुरंत सुरक्षित आश्रय, राशन और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए।
डंपिंग साइट की सुरक्षा घेराबंदी: डंपिंग साइट से भविष्य में मलबा नीचे न लुढ़के, इसके लिए पुख्ता क्रैश बैरियर और रिटेनिंग वॉल बनाई जाए ताकि आगे इस प्रकार की जानलेवा स्थिति दोबारा न बने।
कुल्लू के इस संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्र में बिना बारिश आई यह त्रासदी इस बात की सख्त चेतावनी है कि हिमालयी पारिस्थितिकी में बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट्स का निर्माण करते समय तकनीकी सुरक्षा और स्थानीय आबादी की जान-माल की रक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।






