
संवाद 24 मुंबई। देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में शुमार इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी बॉम्बे (आईआईटी बॉम्बे) का पवई परिसर एक बार फिर गहरे सदमे और भारी आक्रोश के साए में आ गया है। बीटेक सेकंड ईयर के एक 20 वर्षीय छात्र की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने समूचे उच्च शिक्षण तंत्र की आंतरिक कार्यप्रणाली और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले ने तब और भी गंभीर मोड़ ले लिया जब पुलिस ने संस्थान के इतिहास में संभवतः पहली बार किसी वरिष्ठ प्रोफेसर के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम जैसी संगीन धाराओं के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया।
परीक्षा कक्ष से हॉस्टल के कमरे तक का दर्दनाक घटनाक्रम
जानकारी के अनुसार, ऊर्जा विज्ञान विभाग (Energy Science Department) में द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोडे शुक्रवार दोपहर परीक्षा दे रहे थे। परीक्षा के दौरान कथित तौर पर उन पर मोबाइल फोन का उपयोग करने और प्रश्नपत्र को एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल पर अपलोड कर उत्तर तलाशने का आरोप लगा। उस समय ड्यूटी पर मौजूद इनविजिलेटर – जो संस्थान के पूर्व डीन ऑफ स्टूडेंट अफेयर्स और विभाग के प्रोफेसर सूर्यनारायण डूल्ला हैं – ने कथित रूप से छात्र को पकड़ा। इस घटना के कुछ ही घंटों बाद, साहिल का शव उनके हॉस्टल के कमरे में मिला। महज 20 वर्ष के होनहार छात्र का यह भयावह अंत संस्थान के अन्य विद्यार्थियों और पूरे परिवार के लिए एक ऐसा वज्रपात साबित हुआ, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।
परिवार का गंभीर आरोप: ‘महीनों से जारी थी मानसिक और जातिसूचक प्रताड़ना’
इस पूरे मामले में सबसे सनसनीखेज पहलू छात्र के परिजनों के बयान से सामने आया है। मृतक के पिता रविंद्र (जो एक कोऑपरेटिव सोसाइटी में कार्यरत हैं) और मां सोनाली (जो सरकारी शिक्षिका हैं) ने बेहद चौंकाने वाले और गंभीर आरोप लगाए हैं। परिजनों का दावा है कि यह कोई क्षणिक भावनात्मक तनाव में उठाया गया कदम नहीं था, बल्कि साहिल पिछले करीब तीन महीनों से लगातार प्रोफेसर द्वारा की जा रही जातिसूचक टिप्पणियों और अत्यधिक मानसिक उत्पीड़न का सामना कर रहा था।
परिजनों के अनुसार, परीक्षा के दौरान जिस कठोर और अपमानजनक अंदाज में व्यवहार किया गया, उसने छात्र के स्वाभिमान को पूरी तरह तोड़ कर रख दिया। इस गहरे आघात और अन्याय के खिलाफ विरोध जताते हुए परिजनों ने राजावाड़ी अस्पताल के पोस्टमार्टम सेंटर से सात घंटे से अधिक समय तक बेटे का पार्थिव शरीर स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। पिता का कहना था कि जब तक जिम्मेदार प्रोफेसर और संबंधित अधिकारियों की गिरफ्तारी नहीं होती, वे अपने इकलौते बेटे का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे।
क्राइम ब्रांच को सौंपी गई जांच, कानूनी शिकंजा कसा
परिजनों के भारी गतिरोध और छात्रों के बढ़ते गुस्से को देखते हुए पवई पुलिस और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर परिजनों को निष्पक्ष जांच का पूर्ण भरोसा दिलाया। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए मामले की जांच तुरंत मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को स्थानांतरित कर दी गई। पवई पुलिस ने प्रोफेसर सूर्यनारायण डूल्ला समेत कुछ अन्य जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित धारा और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) कानून के कड़े प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। वहीं, पीड़ित परिवार के कानूनी प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार से मामले के त्वरित और निष्पक्ष निपटारे के लिए विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने तथा पीड़ित परिवार को कानूनी राहत प्रदान करने की मांग की है।
पवई कैंपस में छात्रों का जोरदार प्रदर्शन, उठे कई चुभते सवाल
घटना की खबर फैलते ही आईआईटी बॉम्बे के सैकड़ों छात्र सड़कों पर उतर आए और देर रात तक प्रशासनिक भवन के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी युवा छात्र ने संस्थान के दबाव तंत्र से टूटकर जान दी हो। छात्रों के अनुसार, पिछले छह से सात महीनों के भीतर कैंपस में आत्महत्या की यह तीसरी घटना है, जबकि इस पूरे शैक्षणिक वर्ष में ऐसी चार घटनाएं सामने आ चुकी हैं। छात्रों ने संस्थान के प्रशासन से मांग की है कि वह पारदर्शी तरीके से सामने आए और जवाब दे कि आखिर छात्रों की मानसिक स्थिति, उनकी शिकायतों और फैकल्टी के अड़ियल रवैये को लेकर स्थापित आंतरिक कमेटियां क्या काम कर रही हैं। क्या केवल शैक्षणिक सख्ती और अनुशासन के नाम पर किसी छात्र को इस कदर हाशिए पर धकेला जा सकता है कि उसे अपनी जिंदगी ही खत्म करने का रास्ता चुनना पड़े? आईआईटी जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में लगातार सामने आ रहे ऐसे मामले इस बात का कड़ा संकेत हैं कि अब केवल तकनीकी उत्कृष्टता की बात करना काफी नहीं है; संस्थानों के भीतर छात्रों की गरिमा, सामाजिक समानता और मानसिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही अनिवार्य हो चुका है।






