
संवाद 24 नई दिल्ली। छह दशक से अधिक पुराने सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) को लेकर दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर भारत को घेरने की पाकिस्तान की मंशा पर नई दिल्ली ने करारा प्रहार किया है। द हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) के ताजा फैसले को भारत द्वारा सिरे से खारिज किए जाने और ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को ही अमान्य ठहराए जाने के बाद पड़ोसी देश की कूटनीति पूरी तरह बैकफुट पर नजर आ रही है। अंतरराष्ट्रीय अदालत से राहत का भ्रम टूटने के बाद अब पाकिस्तान के सुर बदले-बदले दिख रहे हैं और उसने भारत के सामने ‘सकारात्मक बातचीत’ की गुहार लगाई है।
हेग ट्रिब्यूनल का फैसला और भारत की दो टूक
विवाद की जड़ में हेग स्थित मध्यस्थता अदालत का वह फैसला है, जिसमें ट्रिब्यूनल ने दावा किया था कि 1960 की सिंधु जल संधि पूरी तरह वैध, प्रभावी और दोनों पक्षों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी है। पाकिस्तान इसी फैसले की आड़ लेकर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की जुगत में था।
हालांकि, भारत सरकार ने बिना किसी झिझक के इस फैसले को कूड़ेदान में डाल दिया। भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया कि वह इस तथाकथित आर्बिट्रेशन कोर्ट की वैधता और अधिकार क्षेत्र को ही स्वीकार नहीं करता। भारत का स्पष्ट मानना रहा है कि पाकिस्तान ने संधि के तहत तय त्रि-स्तरीय विवाद समाधान प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए एकतरफा तरीके से इस ट्रिब्यूनल का गठन कराया था, जिसमें भारत कभी भागीदार नहीं रहा। जब मंच ही अवैध है, तो उसके द्वारा सुनाए गए किसी भी आदेश का पालन करने का सवाल ही नहीं उठता।
बैकफुट पर इस्लामाबाद: ‘वार्ता की मेज पर आइए’
भारत के इस कड़े और दृढ़ रुख के सामने आते ही पाकिस्तानी हुकूमत की बेचैनी साफ जाहिर होने लगी है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने एक बयान जारी कर कहा कि पाकिस्तान संधि की मूल भावना, भाषा और उसके कानूनी प्रावधानों के अनुरूप काम करने के लिए प्रतिबद्ध है। अंद्राबी ने भारत से अपील की कि वह इस मुद्दे पर टकराव का रास्ता छोड़कर 1960 के जल-बंटवारे समझौते के दायरे में आकर रचनात्मक बातचीत की मेज पर बैठे। हालांकि, प्रवक्ता ने यह दोहराने की औपचारिकता भी निभाई कि उनका देश फैसले को लागू कराने के लिए हर संभव कानूनी रास्ता अपनाएगा, लेकिन जानकारों का मानना है कि भारत की सख्त घेराबंदी के आगे पाकिस्तान के पास अब ज्यादा कूटनीतिक विकल्प नहीं बचे हैं।
पानी पर पाकिस्तान की चौतरफा घेराबंदी
यह पूरा घटनाक्रम उस वक्त सामने आया है जब भारत ने सिंधु जल संधि के कुछ बुनियादी प्रावधानों की समीक्षा और संशोधन की मांग को लेकर सख्त रवैया अख्तियार कर रखा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। नई दिल्ली का सीधा संदेश रहा है कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते” – यानी सीमा पार आतंकवाद को पालने-पोसने की नीति और उदार जल समझौते का लाभ एक साथ नहीं मिल सकता।
भारत द्वारा किशनगंगा और रातले जैसी हाइड्रोपावर परियोजनाओं के निर्माण पर पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रोना रोता रहा है। लेकिन भारत ने जब संधि की नई व्याख्या और पुनर्मूल्यांकन की बात उठाई, तो इस्लामाबाद घबराकर हेग की शरण में चला गया। अब जब भारत ने उस अदालत के आदेश को ही दरकिनार कर दिया, तो पाकिस्तान को अपने जल संकट और कृषि क्षेत्र पर गहराते खतरे का अहसास सताने लगा है।
कूटनीतिक संदेश: पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगी बात
कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने साफ संदेश दे दिया है कि 1960 का दौर बीत चुका है। पिछले छह दशकों में जनसांख्यिकी, जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा की जरूरतें पूरी तरह बदल चुकी हैं। भारत अब किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता या अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के दखल के दबाव में नहीं आने वाला। पाकिस्तान की मौजूदा गुहार उसकी इसी कूटनीतिक लाचारी को उजागर करती है। यदि इस्लामाबाद वास्तव में सिंधु के पानी का स्थायी और शांतिपूर्ण समाधान चाहता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय अदालतों का चक्कर काटने के बजाय पहले सीमा पार आतंकवाद के बुनियादी मसले पर अपनी नीयत साफ करनी होगी और भारत के साथ द्विपक्षीय बातचीत के लिए गंभीर माहौल तैयार करना होगा।






