
संवाद 24 नई दिल्ली। देश की राजनीति में इन दिनों वार-पलटवार का दौर अपने चरम पर है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। ताजा विवाद कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को लेकर खड़ा हुआ है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक बार फिर राहुल गांधी पर हमला बोलते हुए दावा किया है कि न तो खुद कांग्रेस पार्टी और न ही विपक्षी गठबंधन ‘I.N.D.I.A.’ उन्हें गंभीरता से ले रहा है। भाजपा के इस हमले ने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है: क्या वाकई राहुल गांधी गठबंधन के भीतर अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं?
भाजपा का सीधा हमला: “घर में ही नहीं मिल रही अहमियत”
भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ताओं और दिग्गज नेताओं ने हालिया बयानों में राहुल गांधी की कार्यशैली और उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर तंज कसा है। भाजपा का तर्क है कि राहुल गांधी जिन विषयों को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं, उनके सहयोगी दल ही उन पर साथ खड़े दिखाई नहीं देते। भाजपा के अनुसार, राहुल गांधी की बातों को अब उनके खुद के कार्यकर्ता भी महज एक औपचारिकता के तौर पर लेते हैं। सत्ता पक्ष का कहना है कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाइयों को छू रहा है, वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी केवल नकारात्मक राजनीति का सहारा लेकर जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।
I.N.D.I.A. गठबंधन में बढ़ती दरार की सुगबुगाहट?
भाजपा का यह हमला ऐसे समय में आया है जब विपक्ष के भीतर नेतृत्व को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय दल जैसे टीएमसी, आप और समाजवादी पार्टी कई मुद्दों पर कांग्रेस से अलग राय रखते हैं। जब भाजपा यह कहती है कि “राहुल गांधी को इंडिया ब्लॉक गंभीरता से नहीं ले रहा”, तो वह दरअसल विपक्षी एकजुटता के उन कमजोर धागों पर प्रहार कर रही होती है। सूत्रों का कहना है कि कई मौकों पर गठबंधन के अन्य बड़े नेता राहुल के बयानों से खुद को अलग कर लेते हैं, जिससे भाजपा को यह कहने का मौका मिल जाता है कि राहुल गांधी एक ‘अकेले’ नेता बनते जा रहे हैं।
राहुल गांधी की रणनीति और कांग्रेस का बचाव
दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता से घबरा गई है, इसलिए इस तरह के व्यक्तिगत हमले किए जा रहे हैं। पार्टी का तर्क है कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद से राहुल गांधी ने जनता के बीच जो पैठ बनाई है, उससे भाजपा का ‘आईटी सेल’ बेचैन है। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी ही वह एकमात्र आवाज हैं जो सीधे प्रधानमंत्री से सवाल पूछने का साहस रखते हैं, और यही कारण है कि पूरी भाजपा मशीनरी उन्हें निशाना बनाने में जुटी रहती है।
जनता की अदालत और 2029 की तैयारी
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, इस तरह की बयानबाजी और तेज होने की उम्मीद है। भाजपा का लक्ष्य राहुल गांधी की छवि को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करना है जो ‘गंभीर’ नहीं हैं, ताकि मध्यम वर्ग और युवाओं के बीच उनकी स्वीकार्यता कम की जा सके। वहीं राहुल गांधी खुद को एक ‘जननायक’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं जो गरीबों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की आवाज बनता है। अब सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा का यह ‘नैरेटिव’ जनता के गले उतरेगा? क्या विपक्षी गठबंधन के नेता राहुल गांधी के पीछे मजबूती से खड़े होंगे या फिर आपसी मतभेदों के चलते भाजपा की बात सही साबित होगी? इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में होने वाले विधानसभा चुनावों और संसद के सत्रों में साफ हो जाएंगे।






