
संवाद 24 नई दिल्ली । वैश्विक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मोर्चे पर एक बहुत बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। संयुक्त राज्य अमेरिका की सीनेट ने लंबे समय से लंबित एक कड़े प्रतिबंध विधेयक (बिल) को अपनी मंजूरी दे दी है। इस कदम का सीधा और गहरा प्रभाव भारत, चीन और यूरोप के कई देशों पर पड़ सकता है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य रूस के तेल और गैस व्यापार को निशाना बनाना है ताकि उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर किया जा सके, लेकिन इसके दायरे में वे देश भी आ रहे हैं जो रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा संसाधनों का आयात कर रहे हैं। अगर यह विधेयक कानून का रूप लेता है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह अधिकार मिल जाएगा कि वे रूस से तेल खरीदने वाले देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम आयात शुल्क (टैरिफ) लगा सकें। इससे भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
रूसी अर्थव्यवस्था पर नकेल कसने की कवायद
अमेरिकी सीनेट में इस कड़े विधेयक के पक्ष में एकतरफा वोटिंग देखने को मिली। बिल के समर्थन में 86 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में महज 11 सांसदों ने ही मतदान किया। वोटों का यह भारी अंतर साफ दर्शाता है कि अमेरिकी संसद में दोनों प्रमुख दल रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने के पक्ष में हैं।
रूस और यूक्रेन के बीच पिछले करीब साढ़े चार वर्षों से चल रहे युद्ध के बीच अमेरिका का यह प्रयास है कि मॉस्को के सबसे बड़े वित्तीय स्रोत – तेल और गैस निर्यात – पर नकेल कसी जाए। वाशिंगटन का मानना है कि जब तक रूस को ऊर्जा व्यापार से भारी राजस्व मिलता रहेगा, तब तक युद्ध रोकना मुश्किल होगा। इस आर्थिक दबाव का मकसद रूस को बातचीत की मेज पर लाकर शांति समझौते के लिए मजबूर करना है।
भारत और चीन पर सबसे ज्यादा मंडराया संकट
इस विधेयक के कानून बनने का सबसे व्यापक असर भारत, चीन, जापान और कुछ यूरोपीय देशों पर पड़ने की संभावना है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात काफी बढ़ा दिया था।
आयात के आंकड़े: वर्तमान में भारत प्रतिदिन 20 लाख बैरल से भी अधिक कच्चा तेल रूस से खरीद रहा है।
गैस आयात में बढ़ोतरी: मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने और हालिया वैश्विक परिस्थितियों के चलते भारत ने रूस से प्राकृतिक गैस (LNG) की खरीदारी में भी इजाफा किया है।
यदि अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लागू करता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान अत्यधिक महंगे हो जाएंगे। भारत के कपड़ा, आईटी सेवाएं, दवाएं और इंजीनियरिंग उत्पाद अमेरिकी बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धा खो सकते हैं, जिसका सीधा नुकसान भारतीय निर्यातकों को उठाना पड़ेगा।
विधायी प्रक्रिया: आगे क्या होगा?
अमेरिकी सीनेट से मंजूरी मिलने के बावजूद, यह विधेयक अभी पूरी तरह से कानून नहीं बना है। इसे प्रभावी होने के लिए निम्नलिखित चरणों से गुजरना होगा:
प्रतिनिधि सभा में पेशी: सीनेट से पारित होने के बाद इस बिल को आगामी सितंबर महीने में अमेरिकी संसद के निचले सदन – प्रतिनिधि सभा (House of Representatives)- में पेश किए जाने की संभावना है।
राष्ट्रपति के दस्तखत: यदि प्रतिनिधि सभा से भी यह बिल पारित हो जाता है, तो इसे अंतिम मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही ये पाबंदियां और टैरिफ अधिकार औपचारिक रूप से लागू हो जाएंगे।
गौरतलब है कि इस विधेयक के प्रमुख प्रस्तावकों में रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ नेता दिवंगत लिंडसे ग्राहम भी शामिल थे, जो यूक्रेन के मजबूत समर्थक रहे थे।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं और कूटनीतिक हलचल
इस विधेयक के पास होने के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर बयानबाजी तेज हो गई है। वैश्विक विश्लेषकों का कहना है कि एक तरफ अमेरिका वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता की बात करता है, तो दूसरी तरफ प्रमुख देशों पर प्रतिबंधों और टैरिफ की तलवार लटका रहा है। ईरान समेत कई देशों ने अमेरिकी नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अमेरिका अपने राजनीतिक हितों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमों को प्रभावित कर रहा है। वहीं, भारत के लिए यह स्थिति काफी संवेदनशील है। भारत लगातार यह कहता आया है कि उसकी ऊर्जा नीति 1.4 अरब आबादी की जरूरतों और राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है। अब सबकी निगाहें सितंबर में प्रतिनिधि सभा के सत्र और भारत-अमेरिका के बीच होने वाली कूटनीतिक वार्ताओं पर टिकी हैं।






