
संवाद 24 नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता को लेकर भारत के दशकों पुराने संकल्प को अब तक का सबसे मजबूत वैश्विक समर्थन हासिल हुआ है। न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्च-स्तरीय सत्र के बीच यूरोप के चार प्रभावशाली देशों – पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य (विसेग्राद ग्रुप या V4) – ने एक सुर में भारत की स्थायी दावेदारी का खुलकर समर्थन कर दिया है। इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की बढ़ती धमक और वैश्विक शक्ति संतुलन में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने इस मील के पत्थर को दोनों पक्षों के रिश्तों के लिए अभूतपूर्व और ऐतिहासिक करार दिया है।
‘ग्लोबल साउथ और हिंद-प्रशांत की महाशक्ति को बाहर रखना नामुमकिन’
न्यूयॉर्क में आयोजित पहली ऐतिहासिक ‘V4+इंडिया’ मंत्रिस्तरीय बैठक के बाद स्लोवाकिया के विदेश मंत्री जुराज ब्लानार ने संयुक्त रूप से समूह का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि 21वीं सदी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ब्लानार ने कहा कि भारत न केवल ‘ग्लोबल साउथ’ की एक निर्विवाद और बुलंद आवाज है, बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र में एक उभरती हुई महाशक्ति है। ऐसे में वैश्विक शांति, सुरक्षा और स्थिरता के लिए फैसले लेने वाली दुनिया की सबसे ताकतवर मेज – यानी यूएनएससी – में भारत को स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल किया जाना अनिवार्य है।
‘V4+इंडिया’: सिर्फ कूटनीति नहीं, रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में आयोजित इस संवाद को केवल औपचारिक बैठक न बताते हुए एक ठोस रणनीतिक शुरुआत बताया। जयशंकर ने कहा, “यह पहली विसेग्राद-4 और भारत की औपचारिक बैठक थी, जो अपने आप में एक युगांतरकारी क्षण है। हमने इस बात पर सहमति बनाई है कि भारत और यूरोपीय संघ के मजबूत होते रिश्तों के समानांतर V4 समूह के साथ भी व्यापारिक, रक्षा और तकनीकी साझेदारी को नई ऊंचाई दी जाएगी।”
बैठक में यह निर्णय लिया गया कि भारत और विसेग्राद देशों के विदेश मंत्री अब हर वर्ष औपचारिक बैठक करेंगे। इसके साथ ही दोनों पक्षों के बीच आर्थिक निवेश और वाणिज्यिक गतिविधियों को गति देने के लिए एक वार्षिक ‘बिजनेस फोरम’ का गठन किया जाएगा। जयशंकर ने रेखांकित किया कि V4 देशों के पास उत्कृष्ट औद्योगिक आधार, आधुनिक इनोवेशन और उच्च तकनीक की बेजोड़ क्षमता है, जो भारत के बढ़ते विनिर्माण और रक्षा इकोसिस्टम के लिए अत्यंत उपयोगी साबित होगी।
रक्षा, अंतरिक्ष और वैश्विक संकटों पर गंभीर विमर्श
इस बहुपक्षीय वार्ता में रक्षा सहयोग के ऐतिहासिक संबंधों को पुनर्जीवित करने और स्पेस टेक्नोलॉजी, कनेक्टिविटी तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में छात्रों की आवाजाही को सरल बनाने पर सहमति बनी। वर्तमान में V4 देशों में हजारों भारतीय छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जिसे पीपल-टू-पीपल कनेक्ट के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।
रणनीतिक साझेदारी के साथ-साथ नेताओं ने यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र के मौजूदा संकटों पर भी गहन विचार-विमर्श किया। भारत ने साफ किया कि संवाद और कूटनीति ही समकालीन युद्धों का एकमात्र स्थायी समाधान हैं।
सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग अब बनी वैश्विक अनिवार्यता
वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के ढांचे पर टिकी हुई है, जहां केवल पांच देशों (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) के पास वीटो पावर के साथ स्थायी सीट है। भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि 1945 का यह ढांचा आज के 8 अरब लोगों की दुनिया का वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं करता। 1.4 अरब से अधिक की आबादी, दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय शांति मिशनों में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में शामिल होने के बावजूद भारत को स्थायी सदस्यता से दूर रखना स्वयं संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करता है। यूरोप के हृदय स्थल में स्थित इन चार देशों का यह खुला समर्थन ऐसे समय में आया है जब भारत सुरक्षा परिषद के व्यापक सुधारों के लिए विश्व मंच पर अगुवाई कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यूरोपीय संघ के भीतर से उठ रही यह मांग संयुक्त राष्ट्र के सत्ता गलियारों में शक्ति संतुलन को हमेशा के लिए बदलने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होगी।






