
संवाद 24, फर्रुखाबाद। “यदि किसान प्रकृति के नियमों के अनुरूप खेती करेगा तो उसकी लागत घटेगी, भूमि की उर्वरता बढ़ेगी, भोजन विषमुक्त होगा और आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ जीवन मिलेगा। प्राकृतिक खेती कोई नया प्रयोग नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी कृषि परंपरा का पुनर्जागरण है।” ये विचार लोकभारती के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री श्री गोपाल उपाध्याय ने पांचाल घाट स्थित ऐतिहासिक दुर्वासा आश्रम में आयोजित प्राकृतिक खेती कार्यशाला को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
प्राकृतिक खेती के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से आयोजित इस एक दिवसीय कार्यशाला में जनपद के विभिन्न क्षेत्रों से आए लगभग 120 प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया। दिनभर चले प्रशिक्षण में किसानों को प्राकृतिक खेती की वैज्ञानिक अवधारणाओं, व्यवहारिक तकनीकों तथा कम लागत वाली कृषि प्रणाली का प्रशिक्षण दिया गया। कार्यक्रम के अंत में सभी किसानों ने रसायनमुक्त खेती अपनाने तथा अपने गांवों में प्राकृतिक खेती का प्रचार-प्रसार करने का सामूहिक संकल्प लिया।

उप कृषि निदेशक ने बताया प्राकृतिक खेती का भविष्य
कार्यक्रम का शुभारंभ उप कृषि निदेशक अरविंद मिश्रा द्वारा उपस्थित अतिथियों के परिचय से हुआ। उन्होंने जनपद में प्राकृतिक खेती के अंतर्गत अब तक हुए कार्यों की जानकारी देते हुए कहा कि बदलती जलवायु, बढ़ती उत्पादन लागत और रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को देखते हुए प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक व्यवहारिक विकल्प बनकर उभर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार भी प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित कर रही है और इसका उद्देश्य किसानों की लागत कम कर उनकी आय में वृद्धि करना है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित न रहें, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, जल संरक्षण और मानव स्वास्थ्य को भी प्राथमिकता दें।

धरती मां को बीमार कर रही है रासायनिक खेती
प्रशिक्षण का प्रारंभ करते हुए गोपाल उपाध्याय ने बताया कि हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों के अंधाधुंध प्रयोग ने मिट्टी की प्राकृतिक शक्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि आज किसान की सबसे बड़ी समस्या उत्पादन नहीं बल्कि बढ़ती लागत है। हर वर्ष खाद, दवा, बीज और सिंचाई पर खर्च बढ़ रहा है, जबकि मिट्टी की उत्पादक क्षमता लगातार घट रही है। परिणामस्वरूप किसान कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में कृषि संकट और गहरा सकता है। इसलिए खेती को पुनः प्रकृति के साथ जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।
प्राकृतिक खेती भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्जागरण
गोपाल उपाध्याय ने कहा कि प्राकृतिक खेती किसी विदेशी अवधारणा का परिणाम नहीं है। यह भारत की प्राचीन कृषि परंपरा का आधुनिक स्वरूप है, जिसमें प्रकृति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। उन्होंने बताया कि हमारे पूर्वज बिना किसी रासायनिक उर्वरक के सदियों तक खेती करते रहे। मिट्टी की उर्वरता बनी रही, जल स्रोत सुरक्षित रहे और लोगों को शुद्ध भोजन मिलता रहा। आज आवश्यकता केवल उसी ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पुनः अपनाने की है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मिट्टी, जल, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य का संरक्षण करना भी है।
एक देसी गाय बदल सकती है पूरे खेत की तस्वीर
गोपाल उपाध्याय ने बताया कि पद्मश्री सुभाष पालेकर द्वारा विकसित प्राकृतिक खेती मॉडल में देसी गाय को कृषि व्यवस्था का आधार माना गया है। उन्होंने कहा कि एक स्वस्थ देसी गाय के गोबर और गोमूत्र में करोड़ों लाभकारी सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं। इन्हीं सूक्ष्मजीवों के आधार पर जीवामृत और अन्य प्राकृतिक घोल तैयार किए जाते हैं, जो मिट्टी को पुनः जीवंत बनाते हैं। उन्होंने बताया कि एक देसी गाय के माध्यम से लगभग 10 से 30 एकड़ तक प्राकृतिक खेती की जा सकती है, क्योंकि प्राकृतिक खेती में गोबर खाद की मात्रा नहीं, बल्कि उसमें मौजूद सूक्ष्मजीवों का महत्व होता है। उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे विदेशी नस्लों की बजाय भारतीय देसी गायों के संरक्षण और संवर्धन पर भी ध्यान दें।
जीवामृत और घन जीवामृत बनाने का व्यवहारिक प्रशिक्षण
शाहजहांपुर से आए लोकभारती के संपर्क प्रमुख श्री संजय उपाध्याय ने किसानों को व्यवहारिक प्रशिक्षण देते हुए जीवामृत और गहन जीवामृत तैयार करने की पूरी प्रक्रिया समझाई। उन्होंने बताया कि जीवामृत मिट्टी में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाने का प्रभावी माध्यम है, जिससे पौधों को प्राकृतिक रूप से पोषण प्राप्त होता है। उन्होंने यह भी बताया कि जीवामृत के नियमित प्रयोग से मिट्टी की संरचना बेहतर होती है, पानी धारण करने की क्षमता बढ़ती है और रासायनिक खादों पर निर्भरता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। किसानों को इसके छिड़काव एवं सिंचाई के साथ उपयोग की विभिन्न तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया।
मल्चिंग से नमी संरक्षण और खरपतवार नियंत्रण की जानकारी
कार्यशाला में मल्चिंग (Mulching) तकनीक पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि खेत की सतह को फसल अवशेषों, सूखी घास अथवा अन्य जैविक पदार्थों से ढकने से मिट्टी की नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। इससे तापमान नियंत्रित रहता है, खरपतवार कम उगते हैं तथा सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है। विशेषज्ञों के अनुसार मल्चिंग से सिंचाई की आवश्यकता कम होती है और फसल की उत्पादकता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
सहफसली खेती को बताया प्राकृतिक कृषि की मजबूती
सीतापुर से आए लोकभारती के संयोजक एवं प्राकृतिक कृषक श्री कमलेश सिंह ने सहफसली खेती (Intercropping) के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि विभिन्न प्रकार की फसलों को एक साथ उगाने से भूमि का संतुलन बना रहता है, कीटों एवं रोगों का प्रकोप कम होता है और किसानों को एक ही मौसम में विविध आय प्राप्त होती है। उन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाने में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों, प्रारंभिक संक्रमण काल तथा उनके समाधान के संबंध में अपने अनुभव साझा किए। उनका कहना था कि प्राकृतिक खेती में धैर्य और निरंतरता आवश्यक है, लेकिन कुछ वर्षों बाद इसकी आर्थिक और पर्यावरणीय उपयोगिता स्पष्ट दिखाई देने लगती है।
जैविक रोग एवं कीट नियंत्रण के घरेलू उपाय बताए
फर्रुखाबाद के प्रगतिशील कृषक श्री हिमांशु गंगवार ने किसानों को फसलों में लगने वाले विभिन्न रोगों और कीटों के जैविक उपचार की जानकारी दी। उन्होंने नीम, गोमूत्र, गोबर, लहसुन, हरी मिर्च तथा अन्य स्थानीय वनस्पतियों से तैयार किए जाने वाले जैविक घोलों के उपयोग की विधि समझाई। उन्होंने बताया कि इन उपायों से रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता काफी कम हो जाती है और उत्पाद भी विषमुक्त रहते हैं। साथ ही उन्होंने कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण (Processing) और मूल्य संवर्धन के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने के सुझाव भी दिए।
रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों पर पर्यावरणविद ने जताई चिंता
पर्यावरणविद श्रीमती गुंजा जैन ने कहा कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से केवल मिट्टी ही नहीं, बल्कि जल, वायु और मानव स्वास्थ्य भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि भोजन में रासायनिक अवशेषों की बढ़ती मात्रा अनेक गंभीर बीमारियों का कारण बन रही है। उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाएं।

प्राकृतिक खेती का मूल दर्शन भी समझाया गया
कार्यशाला में बताया गया कि प्राकृतिक खेती का उद्देश्य प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना है। इसमें मिट्टी को जीवित मानते हुए सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ाने, देसी गाय आधारित कृषि प्रणाली अपनाने, जैविक पदार्थों के पुनर्चक्रण तथा जल संरक्षण को विशेष महत्व दिया गया है। पुस्तिका में बीजामृत, जीवामृत, आच्छादन (मल्चिंग), वाफसा तथा प्राकृतिक कीट प्रबंधन जैसी तकनीकों का विस्तृत विवरण दिया गया है। साथ ही किसानों को रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर स्थानीय संसाधनों से तैयार जैविक घोलों के प्रयोग की सलाह दी गई है।
120 किसानों ने लिया प्राकृतिक खेती अपनाने का संकल्प
कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित सभी लगभग 120 किसानों ने रसायनमुक्त एवं प्राकृतिक खेती अपनाने का संकल्प लिया। किसानों ने कहा कि वे अपने-अपने गांवों में भी प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूकता फैलाएंगे और अन्य किसानों को भी इस दिशा में प्रेरित करेंगे।
विशेषज्ञों ने विश्वास व्यक्त किया कि यदि प्राकृतिक खेती का यह अभियान इसी प्रकार आगे बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में न केवल किसानों की उत्पादन लागत घटेगी, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, पर्यावरण संरक्षण और आमजन के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा। प्राकृतिक खेती केवल कृषि की तकनीक नहीं, बल्कि टिकाऊ विकास, आत्मनिर्भर किसान और स्वस्थ समाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।






