
संवाद 24, नई दिल्ली। भारत रत्न एवं पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के बहुआयामी व्यक्तित्व और राष्ट्रजीवन में उनके अविस्मरणीय योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से साप्ताहिक पत्र पाञ्चजन्य द्वारा निर्मित वृत्तचित्र ‘अमिट अटल: द अनफॉरगेटेबल अटल’ का शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित झंडेवालान के विचार विनिमय न्यास सभागार में भव्य प्रदर्शन किया गया। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले मुख्य अतिथि तथा वरिष्ठ चिंतक एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर सहित अनेक लेखक, पत्रकार, शिक्षाविद् और प्रबुद्धजन मौजूद रहे।

सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं, स्वयंसेवक, पत्रकार और कवि के रूप में भी प्रस्तुत हुआ अटल का व्यक्तित्व
वृत्तचित्र में अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन के उन पहलुओं को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है, जो सामान्यतः सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा कम बनते हैं। इसमें एक स्वयंसेवक, प्रचारक, पत्रकार, संपादक, ओजस्वी कवि, प्रखर वक्ता और अंततः भारत के प्रधानमंत्री तक की उनकी यात्रा को प्रामाणिक दस्तावेजों, संस्मरणों तथा ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। वृत्तचित्र का उद्देश्य केवल राजनीतिक जीवन का वर्णन करना नहीं, बल्कि उनके वैचारिक विकास, संगठनात्मक भूमिका और राष्ट्र निर्माण की दृष्टि को भी सामने लाना है।
‘अटल जी को देखकर इतिहास फिर से जीवंत हो उठा’
अपने संबोधन में दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि यह वृत्तचित्र केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सार्वजनिक जीवन के एक स्वर्णिम अध्याय का सजीव दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि वृत्तचित्र देखते समय अटल जी से जुड़ी अनेक ऐतिहासिक घटनाएं और संस्मरण मानो पुनः आंखों के सामने साकार हो उठे। उन्होंने बताया कि मात्र 27 वर्ष की आयु में श्रद्धेय भाऊराव देवरस की प्रेरणा तथा पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मार्गदर्शन में अटल बिहारी वाजपेयी को पाञ्चजन्य का प्रथम संपादक बनाया गया था। उस समय से ही उनकी लेखनी, वैचारिक स्पष्टता और प्रभावशाली अभिव्यक्ति ने भारतीय पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान की।
‘हिन्दू तन-मन…’ कविता का भी हुआ उल्लेख
होसबाले ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी की अत्यंत लोकप्रिय कविता “हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय” पहली बार पाञ्चजन्य में ही प्रकाशित हुई थी। उन्होंने कहा कि अटल जी की कविताओं में राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यही कारण है कि वे केवल राजनेता नहीं, बल्कि जनकवि के रूप में भी व्यापक सम्मान प्राप्त करते हैं।
जम्मू-कश्मीर पर अटल जी के संकल्प का किया स्मरण
सरकार्यवाह ने कहा कि पाञ्चजन्य के प्रथम संपादकीय का शीर्षक था— “जम्मू-कश्मीर से समझौता नहीं होने देंगे”। उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी अपने जीवन के अंतिम समय तक इस राष्ट्रीय संकल्प के प्रति प्रतिबद्ध रहे। उनके विचारों में राष्ट्रहित सर्वोपरि था और राष्ट्रीय एकता से जुड़े विषयों पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि अटल जी पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का माध्यम मानते थे। वे दैनिक समाचार पत्र को सूचना, साप्ताहिक पत्र को प्रचार और मासिक पत्रिका को विचार का माध्यम बताते थे। यह दृष्टि आज भी भारतीय वैचारिक पत्रकारिता के लिए प्रेरणास्रोत है।
नई तकनीक से नई पीढ़ी तक पहुंचेगा अटल का संदेश
दत्तात्रेय होसबाले ने पाञ्चजन्य द्वारा आधुनिक तकनीकों के माध्यम से तैयार किए गए इस वृत्तचित्र की सराहना करते हुए कहा कि डिजिटल माध्यमों के युग में ऐसे प्रयास नई पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण के महान व्यक्तित्वों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि अटल जी का जीवन सेवा, समर्पण, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय चिंतन का अद्भुत उदाहरण है।
‘सिद्धांतों से समझौता कभी नहीं किया’ – डॉ. मुरली मनोहर जोशी
विशिष्ट अतिथि डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने अपने संबोधन में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बिताए लगभग सात दशकों के अनेक संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि वर्ष 1948 से उन्हें अटल जी तथा पंडित दीनदयाल उपाध्याय के साथ कार्य करने का अवसर मिला और उन्होंने निकट से देखा कि अटल जी ने जीवन भर अपने विचारों और सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
उन्होंने कहा कि जनता पार्टी सरकार के दौर में अनेक राजनीतिक परिस्थितियां उत्पन्न हुईं, लेकिन अटल जी ने सदैव राष्ट्रहित और सिद्धांतों को प्राथमिकता दी। वे दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर निर्णय लेने वाले नेता थे।
‘हमारी नाल संघ से जुड़ी है’
डॉ. जोशी ने उस दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि जब कुछ राजनीतिक समूहों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध विच्छेद करने का दबाव बनाया, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था – “हमारी नाल संघ से जुड़ी है, हम संघ से अलग कैसे हो सकते हैं?” उन्होंने बताया कि संसद में भी अटल जी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे ऐसी किसी सरकार का समर्थन नहीं करेंगे, जो उन्हें अपने मूल विचारों से समझौता करने के लिए विवश करे।
सरस्वती वंदना और भारतीय परंपरा पर अटल जी का स्पष्ट दृष्टिकोण
डॉ. जोशी ने अपने शिक्षा मंत्री कार्यकाल का एक महत्वपूर्ण प्रसंग साझा करते हुए बताया कि जब विद्यालयों में सरस्वती वंदना को लेकर विवाद उत्पन्न करने का प्रयास हुआ, तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “यदि हमारी सरकार में सरस्वती वंदना नहीं होगी, तो फिर किस सरकार में होगी?” उन्होंने कहा कि अटल जी भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन दोनों के समर्थक थे। विलुप्त सरस्वती नदी के शोध एवं पुनर्स्थापना संबंधी प्रयासों के प्रति भी उनका विशेष आग्रह था।
अटल की राजनीति का मूल था संवाद और लोकतांत्रिक मर्यादा
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने वैचारिक प्रतिबद्धता और लोकतांत्रिक शालीनता का दुर्लभ संतुलन प्रस्तुत किया। विपक्ष में रहते हुए उनकी संसदीय वाणी जितनी प्रभावशाली रही, सत्ता में रहते हुए उतना ही समावेशी दृष्टिकोण दिखाई दिया। संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण, पोखरण परमाणु परीक्षण, आधारभूत संरचना के विकास के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना तथा पड़ोसी देशों के साथ संवाद की पहल उनके सार्वजनिक जीवन के प्रमुख आयाम माने जाते हैं।
वृत्तचित्र क्यों है विशेष?
‘अमिट अटल’ की विशेषता यह है कि यह केवल घटनाओं का क्रम प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उन विचारों और मूल्यों को भी सामने लाने का प्रयास करता है, जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व का निर्माण किया। इसमें उनके स्वयंसेवक जीवन, पाञ्चजन्य से जुड़े प्रारंभिक पत्रकारिता काल, काव्य साधना, संपादकीय दृष्टि और राजनीतिक नेतृत्व के विभिन्न पक्षों को एक सूत्र में पिरोया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी पर पहले भी फिल्म, टेलीविजन श्रृंखला और अन्य वृत्तचित्र बनाए गए हैं, किंतु यह प्रस्तुति विशेष रूप से उनके वैचारिक और पत्रकारिता जीवन पर केंद्रित होने के कारण अलग पहचान बनाती है। हाल के वर्षों में उनके जीवन पर आधारित फिल्म ‘मैं अटल हूं’ तथा अन्य स्मृति परियोजनाओं ने भी नई पीढ़ी में उनके जीवन के प्रति रुचि बढ़ाई है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनने का प्रयास
कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक नेतृत्व से नहीं, बल्कि विचार, पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक समर्पण से भी होता है। वक्ताओं ने विश्वास व्यक्त किया कि पाञ्चजन्य का यह वृत्तचित्र अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन के कम चर्चित पक्षों को देश के युवाओं तक पहुंचाएगा और उन्हें राष्ट्रसेवा, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रति प्रेरित करेगा।
कार्यक्रम में उपस्थित बुद्धिजीवियों ने भी इसे अटल बिहारी वाजपेयी की वैचारिक यात्रा को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास बताया। उनका मानना था कि ऐसे वृत्तचित्र इतिहास के दस्तावेज होने के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनते हैं।






