
संवाद 24, थ्रिसूर (केरल)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर केरल के थ्रिसूर में आयोजित विशेष व्याख्यान में संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ के उद्देश्य, कार्यपद्धति और भविष्य की दिशा पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ न तो राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए कार्य करता है और न ही किसी व्यक्ति, समुदाय अथवा धर्म के विरोध में उसकी स्थापना हुई थी। पिछले 100 वर्षों से संघ का एकमात्र लक्ष्य भारत के कल्याण के माध्यम से विश्व कल्याण की दिशा में कार्य करना रहा है। यह व्याख्यान संघ के शताब्दी वर्ष के जनसंपर्क अभियान का हिस्सा था, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों के आमंत्रित लोग उपस्थित थे।
‘संघ सबको अपना मानता है, कोई पराया नहीं’
अपने संबोधन में डॉ. भागवत ने कहा कि संघ की दृष्टि में धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र अथवा पंथ के आधार पर कोई व्यक्ति पराया नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ भारतीय समाज को उसकी सांस्कृतिक एकात्मता के आधार पर देखता है और इसी संदर्भ में “हिंदुत्व” को भारत की जीवंत सभ्यतागत परंपरा बताया। उनके अनुसार इस सांस्कृतिक अर्थ में भारत में रहने वाले सभी लोग इस परंपरा का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व किसी विशेष उपासना पद्धति का नाम नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों और साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इसलिए ईसाई, मुस्लिम अथवा किसी भी मत को मानने वाले व्यक्ति भी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के अभिन्न अंग हैं। उन्होंने कहा कि संघ बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक जैसी अवधारणाओं के आधार पर समाज को विभाजित नहीं मानता, बल्कि सभी को समान दृष्टि से देखता है।
‘विविधता स्वाभाविक है, धर्म जोड़ने वाला तत्व है’
सरसंघचालक ने कहा कि मानव समाज में विविधता स्वाभाविक है, किंतु इन विविधताओं के बीच जो तत्व लोगों को जोड़ता है, वह धर्म है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यहां धर्म का आशय किसी विशेष धार्मिक पंथ या पूजा-पद्धति से नहीं, बल्कि उन सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों से है जो समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। उन्होंने सत्य, करुणा, शुचिता और तप को धर्म का आधार बताते हुए कहा कि इन्हीं मूल्यों पर आधारित समाज स्थायी प्रगति कर सकता है। भारत की सांस्कृतिक शक्ति और एकता का मूल भी यही मूल्य हैं, जिन्होंने हजारों वर्षों से विविधताओं के बावजूद समाज को एक सूत्र में बांधे रखा है।

‘हर गांव में ऐसे व्यक्ति तैयार करना ही संघ का उद्देश्य’
डॉ. भागवत ने कहा कि संघ का वास्तविक कार्य किसी आंदोलन का संचालन करना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना है जो समाजहित को सर्वोपरि मानते हों। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक गांव और प्रत्येक मोहल्ले में ईमानदार, अनुशासित, निस्वार्थ और समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति तैयार हो जाएं तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन स्वतः दिखाई देगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दैनिक शाखाएं इसी उद्देश्य की पूर्ति का माध्यम हैं। शाखा में व्यक्तित्व निर्माण, अनुशासन, सामाजिक समरसता और राष्ट्रभाव का विकास किया जाता है। यही स्वयंसेवक आगे चलकर शिक्षा, सेवा, ग्राम विकास, पर्यावरण, चिकित्सा, सामाजिक समरसता तथा अनेक अन्य क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं।
‘संघ प्रेरणा देता है, नियंत्रण नहीं करता’
संघ और उससे प्रेरित विभिन्न संगठनों के संबंध पर बोलते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि सेवा भारती सहित अनेक संगठन स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। संघ उन्हें केवल वैचारिक प्रेरणा देता है, उनके दैनिक कार्यों अथवा निर्णयों पर उसका कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होता। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक समाज की आवश्यकताओं के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में संस्थाएं बनाते हैं और उन संस्थाओं का संचालन स्वतंत्र रूप से करते हैं। संघ का उद्देश्य समाज में ऐसे कार्यकर्ताओं का निर्माण करना है जो स्वयं नेतृत्व संभाल सकें और समाजहित में कार्य करें।
‘समाज-केंद्रित है भारतीय संस्कृति’
अपने व्याख्यान में उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशेषता बताते हुए कहा कि भारत की संस्कृति राज्य-केंद्रित नहीं बल्कि समाज-केंद्रित रही है। समाज स्वयं अपनी शक्ति से समस्याओं का समाधान करने में सक्षम है और इसी कारण भारत अनेक संकटों के बावजूद अपनी सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखने में सफल रहा। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति ईमानदारी, पारदर्शिता और निस्वार्थ भाव से समाज के लिए कार्य करता है, वही वास्तविक अर्थों में स्वयंसेवक है। संघ में औपचारिक सदस्यता की कोई व्यवस्था नहीं है। जो व्यक्ति संघ की शाखा में आता है और उसके मूल्यों को स्वीकार करता है, वही स्वयंसेवक माना जाता है।
‘संघ को बाहर से नहीं, भीतर आकर समझिए’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर प्रचलित धारणाओं और आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि संघ को दूर से देखकर या केवल आलोचना के आधार पर समझना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति संघ के बारे में जानना चाहता है, उसके लिए संघ के द्वार खुले हैं। उन्होंने कहा, “आइए, संघ को देखिए, समझिए और उसके बाद अपनी राय बनाइए।” उनके अनुसार संघ को उसके स्वयंसेवकों के जीवन, सेवा कार्यों और समाज में उनके योगदान के आधार पर समझा जाना चाहिए।
कर्नाटक में पंजीकरण की मांग पर भी दिया जवाब
व्याख्यान के दौरान प्रश्नोत्तर सत्र में कर्नाटक में संघ के पंजीकरण की मांग से जुड़े प्रश्न पर डॉ. भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले सौ वर्षों से बिना किसी औपचारिक पंजीकरण के कार्य करता आया है और आगे भी करता रहेगा। उन्होंने इस मांग को राजनीतिक प्रकृति का बताते हुए कहा कि ऐसी मांगें समय के साथ समाप्त हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि संघ का समूचा कार्य समाज के सामने खुला है और उसकी गतिविधियों में किसी प्रकार की गोपनीयता नहीं है।
शताब्दी वर्ष में जनसंपर्क अभियान पर विशेष जोर
संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर देशभर में व्यापक जनसंपर्क कार्यक्रम, व्याख्यानमालाएं और सामाजिक संवाद आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में केरल के तिरुवनंतपुरम और थ्रिसूर में विशेष व्याख्यान आयोजित किए गए, जिनमें समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, उद्योगपति और अन्य नागरिक आमंत्रित किए गए थे। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य संघ के कार्य, विचार और समाज जीवन में उसकी भूमिका को प्रत्यक्ष रूप से समाज के सामने रखना बताया गया।
शताब्दी वर्ष के संदेश का केंद्र: व्यक्तित्व निर्माण से राष्ट्र निर्माण
अपने पूरे संबोधन में डॉ. मोहन भागवत ने बार-बार इस बात पर बल दिया कि संघ का मूल कार्य व्यक्ति निर्माण है। उनका कहना था कि जब समाज में चरित्रवान, अनुशासित और सेवा-भाव से प्रेरित व्यक्तियों की संख्या बढ़ेगी, तब राष्ट्र का समग्र विकास स्वतः संभव होगा। उन्होंने कहा कि संघ किसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच नहीं, बल्कि समाज संगठन का एक सतत प्रयास है। भारत की सांस्कृतिक एकता, सामाजिक समरसता और मानव मूल्यों के संरक्षण के माध्यम से राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य ही संघ के शताब्दी वर्ष का प्रमुख संदेश है।






