
संवाद 24 अलवर। अरावली पर्वतमाला को बचाने की मुहिम के बीच भिवाड़ी क्षेत्र से पर्यावरण को झकझोर देने वाली तस्वीरें सामने आई हैं। तिजारा-खैरथल क्षेत्र के कहरानी गांव की पहाड़ियों में वर्षों तक चले अवैध खनन के चलते अब पहाड़ लगभग समाप्त हो चुके हैं। जहां कभी हरियाली और मजबूत चट्टानें थीं, वहां अब 50-50 फीट गहरे गड्ढे और टावर जैसी नुकीली चट्टानें दिखाई दे रही हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इसी क्षेत्र से निकले पत्थरों का उपयोग दिल्ली और नोएडा के बड़े निर्माण कार्यों में किया गया। अनुमान है कि बीते वर्षों में यहां से एक लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के खनिज अवैध रूप से निकाले गए।

विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली से गुजरात तक फैली लगभग 670 किलोमीटर लंबी अरावली श्रृंखला में सबसे अधिक क्षति दिल्ली-एनसीआर से सटे इलाकों में हुई है। कहरानी क्षेत्र में केवल एक दशक के भीतर लगभग 2.5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पहाड़ों को काट दिया गया। आसपास के सैकड़ों गांवों में भी लंबे समय तक अवैध खनन होता रहा।
वन विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में अवैध खनन से करीब 50 हजार करोड़ रुपये की वन और खनिज संपदा का नुकसान हुआ। ड्रोन सर्वे में पहाड़ियों की वर्तमान ऊंचाई 70 से 80 मीटर के आसपास पाई गई, जबकि जमीन के नीचे तक गहरी खुदाई पहले ही की जा चुकी है।
ग्रामीणों ने बताया कि अवैध खनन के दौर में दिन-रात सैकड़ों डंपर चलते थे। इस दौरान कई हादसे भी हुए, जिनमें लोगों की जान गई। खनन बंद होने के बाद शोर-शराबा और दुर्घटनाएं कम हुईं, लेकिन स्थानीय स्तर पर बेरोजगारी भी बढ़ी है।
वर्ष 2012 में प्रशासनिक सख्ती के बाद अवैध खनन पर कुछ हद तक रोक लगी थी, हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ इलाकों में अब भी यह गतिविधि जारी है। पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अरावली को लेकर ठोस और दीर्घकालिक नीति नहीं बनाई गई, तो इसका असर पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण और जलस्तर पर पड़ेगा।






