दुनिया की आधी आबादी का मंच, 11 देश और अनगिनत कूटनीतिक चालें: दिल्ली में BRICS समिट पर क्यों टिकी है सुपरपावर्स की नजर?

संवाद 24 नई दिल्ली। जब पूरी दुनिया युद्ध के मुहाने, गंभीर आर्थिक प्रतिबंधों, टूटती आपूर्ति श्रृंखलाओं और पश्चिम एशिया में जारी भीषण अस्थिरता से जूझ रही है, तब राजधानी दिल्ली कूटनीति के सबसे बड़े वैश्विक अखाड़े में तब्दील होने जा रही है। 12 और 13 सितंबर को दिल्ली के प्रतिष्ठित ‘भारत मंडपम’ में 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का भव्य आयोजन होने जा रहा है। इस महामंथन में 11 प्रमुख राष्ट्रों के शीर्ष नेता और प्रतिनिधि एक छत के नीचे जुट रहे हैं। ये 11 मुल्क मिलकर विश्व की करीब आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी के एक विशाल हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही वजह है कि वाशिंगटन से लेकर मॉस्को और बीजिंग तक, हर महाशक्ति की नजर इस बात पर गड़ी है कि दिल्ली से निकलने वाला साझा संदेश विश्व व्यवस्था का नया रुख क्या तय करेगा।

एक मंच, लेकिन 11 देशों के अपने-अपने समीकरण
ब्रिक्स अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का साधारण समूह नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसे बहुध्रुवीय मंच का रूप ले चुका है जहां हर भागीदार अपने रणनीतिक हितों की बिसात बिछा रहा है। इस बार सम्मेलन की सबसे बड़ी रोचकता यह है कि समूह का कोई साझा एकल एजेंडा होने के बजाय हर सदस्य राष्ट्र अपनी वैश्विक छवि और जरूरतों को साधने में लगा है:
भारत (मेजबान): संतुलन और बहुध्रुवीय व्यवस्था का पैरोकार
भारत की कूटनीति इस समय सबसे व्यावहारिक नजर आ रही है। एक तरफ भारत पश्चिमी देशों के साथ ‘क्वाड’ में खड़ा है, तो दूसरी तरफ ‘एससीओ’ और ‘ब्रिक्स’ में ग्लोबल साउथ का सबसे बड़ा स्वर बनकर उभरा है। नई दिल्ली ब्रिक्स को किसी ‘पश्चिम-विरोधी’ गुट में तब्दील करने के बजाय ठोस विकास और व्यावहारिक सहयोग का केंद्र बनाना चाहती है। भारत का मुख्य फोकस डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (जैसे यूपीआई), स्टार्टअप्स, एमएसएमई, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्वच्छ ऊर्जा पर है। इसके साथ ही, भारत ईरान और यूएई जैसे देशों के आपसी तनाव को साधकर एक सर्वसम्मत घोषणापत्र जारी कराने की गंभीर चुनौती से भी निपट रहा है।
चीन: अमेरिकी प्रभुत्व को सीधी चुनौती देने की फिराक
राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस मंच को अमेरिका-केंद्रित वित्तीय व्यवस्था के मजबूत विकल्प के तौर पर पेश करना चाहते हैं। बीजिंग यह प्रदर्शित करने में जुटा है कि जहां कई देशों का भरोसा पश्चिमी तंत्र पर डगमगा रहा है, वहीं वे चीन के प्रभाव वाले आर्थिक तंत्र में सहज हैं। चीन का मुख्य ध्यान स्थानीय मुद्राओं में आपसी व्यापार बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) व संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं के ढांचे में बदलाव लाने पर रहेगा।
रूस: प्रतिबंधों को धता बताकर वैधता का प्रदर्शन
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए यह सम्मेलन पश्चिमी प्रतिबंधों की विफलता को दुनिया के सामने साबित करने का सबसे बड़ा जरिया है। मॉस्को यह साफ करना चाहता है कि वह कूटनीतिक रूप से अलग-थलग नहीं है। रूस ब्रिक्स के भीतर पश्चिमी स्विफ्ट (SWIFT) पेमेंट सिस्टम से इतर एक वैकल्पिक भुगतान तंत्र चाहता है। इसके अलावा अनाज सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और रक्षा सहयोग पर रूस का विशेष जोर रहेगा।
ईरान: ‘अलग-थलग नहीं हैं हम’, तेहरान का संदेश
पश्चिम एशिया में महीनों से जारी तनाव और युद्ध के बावजूद राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान दुनिया को यह संदेश देना चाहते हैं कि तेहरान की रीढ़ नहीं टूटी है। ईरान ऊर्जा निर्यात, चाबहार पोर्ट कॉरिडोर और गैर-डॉलर व्यापार पर ध्यान देगा। साथ ही वह क्षेत्रीय संकट पर अपना पक्ष रखते हुए पश्चिमी नीतियों को कठघरे में खड़ा करेगा।
अरब देश और ग्लोबल साउथ के अन्य स्तंभ:
यूएई: ऊर्जा बाजार में स्थिरता का भरोसा देने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि पश्चिम एशिया के मसले पर ईरान मंच से एकतरफा आख्यान न गढ़े।
इंडोनेशिया: नए पूर्ण सदस्य के रूप में जकार्ता आसियान और ग्लोबल साउथ के बीच एक मजबूत सेतु की भूमिका में दिखना चाहता है।
ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका: ब्राजील जहां पर्यावरण संरक्षण, अमेजन फंडिंग और रियायती वित्त पर बल देगा, वहीं दक्षिण अफ्रीका वैश्विक संस्थाओं में अफ्रीका के स्थायी प्रतिनिधित्व और महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) के संरक्षण की मांग उठाएगा।
मिस्र और इथियोपिया: स्वेज नहर के व्यापारिक गलियारे, क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक विकास के लिए ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) से मदद की राह तलाशेंगे।

क्या निकल पाएगा ठोस साझा घोषणापत्र?
इस शिखर सम्मेलन में भारत के सामने सबसे बड़ी राजनयिक चुनौती इन विरोधी विचारधाराओं और क्षेत्रीय तनावों के बीच संतुलन साधने की होगी। पश्चिम एशिया के सुलगते हालात और डॉलर के विकल्प पर सदस्यों के अलग-अलग रुख के चलते सर्वसम्मत घोषणापत्र तैयार करना आसान नहीं होगा। जहां चीन और रूस डॉलर के मुकाबले आक्रामक रुख चाहते हैं, वहीं भारत इसे संतुलित रखते हुए व्यावहारिक व्यापारिक समाधानों पर केंद्रित रखना चाहता है।
आने वाले दो दिनों में भारत मंडपम से उठने वाली आवाज केवल 11 देशों की नहीं होगी, बल्कि यह तय करेगी कि आने वाले दशकों में वैश्विक शक्ति का संतुलन किस दिशा में झुकेगा।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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