
संवाद 24 महाराष्ट्र। सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली राजनीतिक खबर सामने आ रही है, जिसने समूचे विपक्षी खेमे और ‘इंडी’ (INDIA) गठबंधन के भीतर खलबली मचा दी है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष और कद्दावर सांसद सुप्रिया सुले ने मोदी सरकार द्वारा संसद के मानसून सत्र में पेश किए जाने वाले बेहद महत्वपूर्ण 131वें संविधान संशोधन विधेयक का खुला समर्थन कर दिया है। सुप्रिया सुले के इस अप्रत्याशित कदम के तुरंत बाद राजनीतिक गलियारों में यह कयासबाजी तेज हो गई है कि क्या शरद पवार की पार्टी का झुकाव अब एनडीए (NDA) की तरफ बढ़ रहा है, या फिर यह महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चली गई कोई बहुत बड़ी राजनीतिक चाल है। इस मुद्दे पर खुद पार्टी सुप्रीमो शरद पवार ने भी अपनी चुप्पी तोड़ते हुए बेहद अहम रुख अख्तियार किया है। हालांकि, सुप्रिया सुले और शरद पवार दोनों ने इस विधेयक का समर्थन करने के साथ ही केंद्र सरकार के सामने एक बड़ी शर्त भी रख दी है। पवार परिवार के इस बदले राजनीतिक रुख के कारण विपक्षी INDIA गठबंधन के भीतर दरारें और आपसी मतभेद खुलकर सतह पर आ गए हैं, क्योंकि गठबंधन के कई अन्य घटक दल इस विधेयक का कड़ा विरोध करने की रणनीति बना रहे थे।
क्या है 131वां संविधान संशोधन और क्यों मची है खलबली?
दरअसल, केंद्र की मोदी सरकार संसद में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से 131वां संविधान संशोधन विधेयक लाने की तैयारी में है। राजनीतिक जानकारों और सूत्रों के मुताबिक, यदि यह ऐतिहासिक विधेयक संसद से पारित हो जाता है, तो देश में लोकसभा की कुल सदस्य संख्या वर्तमान की 543 सीटों से बढ़कर लगभग 850 के पार पहुंच सकती है। देश की तेजी से बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप जनता का सही प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने और देश के तमाम निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से पुनर्गठन (Delimitation) करने के लिए केंद्र सरकार इस बड़े कदम को उठाने जा रही है।
सुप्रिया सुले और शरद पवार की क्या है बड़ी शर्त?
इस पूरे मामले पर अपनी पार्टी का रुख साफ करते हुए सांसद सुप्रिया सुले ने मुंबई में कहा कि बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुपात में जनप्रतिनिधियों यानी सांसदों की संख्या का बढ़ना आज के समय की बेहद महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसी तार्किकता को देखते हुए उनकी पार्टी इस बड़े संविधान संशोधन का पूरी तरह से समर्थन करती है। लेकिन इसके साथ ही सुप्रिया सुले ने चेतावनी भरे लहजे में यह भी स्पष्ट किया कि केवल सीटों की संख्या बढ़ा देना ही काफी नहीं होगा, बल्कि परिसीमन की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान देश के सभी राज्यों के साथ पूरी तरह से समान, पारदर्शी और न्यायपूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए। किसी भी राज्य के साथ किसी प्रकार का राजनीतिक या क्षेत्रीय भेदभाव नहीं होना चाहिए।
वहीं, दूसरी ओर मराठा राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार ने इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार के सामने दक्षिण भारत के राज्यों की पैरवी की है। शरद पवार ने मांग उठाई है कि जिन राज्यों ने बीते दशकों में जनसंख्या नियंत्रण (Family Planning) के मोर्चे पर देश में सबसे बेहतरीन और अनुकरणीय प्रदर्शन किया है—विशेष रूप से दक्षिण भारत के राज्य—उनके साथ सीटों के आवंटन में किसी भी प्रकार का अन्याय या पक्षपात नहीं होना चाहिए। पवार का तर्क है कि जिन राज्यों ने जिम्मेदारी से परिवार नियोजन को प्रभावी ढंग से लागू किया, उनकी देशभक्ति और बेहतर प्रदर्शन के बदले में उनका संसदीय प्रतिनिधित्व कम कर देना कतई उचित और न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
शरद पवार ने मोदी सरकार को नसीहत देते हुए आगे कहा कि यदि बड़ी और अनियंत्रित जनसंख्या वाले राज्यों को उनकी आबादी के आधार पर अतिरिक्त लोकसभा सीटें दी जा रही हैं, तो जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहने वाले राज्यों के राजनीतिक और लोकतांत्रिक हितों की रक्षा के लिए भी केंद्र सरकार को संसद में एक बेहद स्पष्ट और ठोस नीति सामने लानी होगी।
महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों पर क्या पड़ेगा इसका सीधा असर?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस 131वें संविधान संशोधन के जरिए पूरे देश में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन होता है, तो आर्थिक राजधानी मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र की लोकसभा सीटों की कुल संख्या में भी भारी बढ़ोतरी होने की पूरी संभावना है। वर्तमान समय में महाराष्ट्र में कुल 48 लोकसभा सीटें हैं। हालांकि, राज्य को कितनी अतिरिक्त सीटें मिलेंगी, इसका अंतिम और आधिकारिक फैसला आगामी जनगणना के ताजा आंकड़ों और परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) की अंतिम सिफारिशों के आधार पर ही तय होगा।
विपक्षी ‘INDIA’ गठबंधन में पड़ गई बड़ी दरार!
शरद पवार और सुप्रिया सुले द्वारा मोदी सरकार के इस महत्वाकांक्षी बिल को समर्थन देने के संकेतों ने विपक्षी खेमे में भारी असहजता पैदा कर दी है। विपक्षी गठबंधन के कई बड़े दल इस बिल को लेकर केंद्र सरकार को घेरने की फिराक में थे, लेकिन पवार परिवार के इस स्टैंड ने विपक्ष की एकता की हवा निकाल दी है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि महाराष्ट्र के आगामी चुनावों से ठीक पहले पवार का यह दांव क्या विपक्षी एकता के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा या फिर इसके पीछे कोई और गहरा सियासी खेल छिपा है।






