भाषा विवाद पर झारखंड में बढ़ी सियासी गर्मी! मंत्री के बयान से गठबंधन में मचा घमासान
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संवाद 24 झारखंड । भाषा को लेकर एक बार फिर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। राज्य के वित्त मंत्री के हालिया बयान के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने मंत्री की टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भाषा और संस्कृति जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गैर-जिम्मेदाराना बयान राज्य के सामाजिक माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। इस मामले ने अब राजनीतिक बहस का रूप ले लिया है और विपक्ष भी सरकार पर सवाल उठाने लगा है।
झामुमो ने जताई कड़ी नाराजगी
झामुमो के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि झारखंड की पहचान उसकी स्थानीय भाषाओं, संस्कृति और आदिवासी परंपराओं से जुड़ी हुई है। पार्टी महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने वित्त मंत्री के बयान पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसे मुद्दों पर सार्वजनिक मंच से बयान देने से पहले गठबंधन के अंदर चर्चा होनी चाहिए थी। उन्होंने यह भी कहा कि कैबिनेट के भीतर चर्चा किए बिना सरकार को कटघरे में खड़ा करना ठीक नहीं माना जा सकता।
भाषा और पहचान का मुद्दा बना राजनीतिक हथियार
झारखंड में भाषा का मुद्दा लंबे समय से बेहद संवेदनशील माना जाता रहा है। राज्य में हिंदी के अलावा संथाली, हो, मुंडारी, कुरुख, नागपुरी और कई क्षेत्रीय भाषाएं बोली जाती हैं। स्थानीय संगठनों का आरोप रहा है कि कई बार बाहरी भाषाओं को बढ़ावा देने की कोशिश में स्थानीय पहचान कमजोर पड़ती है। इसी वजह से भाषा से जुड़ा कोई भी बयान तुरंत राजनीतिक रंग पकड़ लेता है। विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी माहौल के बीच यह मुद्दा आने वाले दिनों में और ज्यादा गरमा सकता है।
गठबंधन के भीतर बढ़ सकती है खींचतान
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस विवाद से झारखंड की गठबंधन सरकार के अंदर असहज स्थिति पैदा हो सकती है। पहले भी कई मुद्दों पर सहयोगी दलों के बीच मतभेद सामने आ चुके हैं, लेकिन भाषा जैसे भावनात्मक विषय पर खुला टकराव सरकार के लिए परेशानी बढ़ा सकता है। हालांकि अब तक मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से इस विवाद पर कोई बड़ा बयान सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे को लेकर लगातार चर्चाएं जारी हैं।
विपक्ष ने सरकार को घेरा
भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मामले को लेकर सरकार पर हमला बोला है। विपक्ष का कहना है कि सरकार के मंत्री ही अलग-अलग बयान देकर भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार विकास और रोजगार जैसे अहम मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए भाषा विवाद को हवा दे रही है। वहीं कुछ संगठनों ने मांग की है कि सरकार स्थानीय भाषाओं के संरक्षण और प्रचार के लिए स्पष्ट नीति सामने लाए।
आदिवासी संगठनों ने भी जताई चिंता
भाषा विवाद बढ़ने के बाद कई आदिवासी और क्षेत्रीय संगठनों ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। संगठनों का कहना है कि झारखंड की मूल पहचान उसकी सांस्कृतिक विविधता में छिपी है और किसी भी भाषा को लेकर राजनीति करना राज्य के हित में नहीं है। कुछ संगठनों ने सरकार से अपील की है कि स्थानीय भाषाओं को शिक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था में और ज्यादा महत्व दिया जाए ताकि युवाओं का अपनी संस्कृति से जुड़ाव मजबूत हो सके।
आने वाले दिनों में और गरमा सकता है मामला
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद जल्द शांत होता नजर नहीं आ रहा। जिस तरह से बयानबाजी तेज हुई है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में भाषा और क्षेत्रीय पहचान का मुद्दा झारखंड की राजनीति में प्रमुख विषय बन सकता है। फिलहाल सभी की नजर मुख्यमंत्री और सरकार की अगली रणनीति पर टिकी हुई है। अगर जल्द समाधान नहीं निकला तो यह मामला गठबंधन की एकजुटता पर भी असर डाल सकता है।






