लिपुलेख विवाद फिर गरमाया: नेपाल ने दोहराया दावा, भारत से बातचीत की मांग
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संवाद 24 नई दिल्ली। भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख को लेकर पुराना सीमा विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। नेपाल ने इस क्षेत्र पर अपना दावा दोहराते हुए भारत से औपचारिक बातचीत की मांग की है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्र नेपाल के हिस्से हैं और इस मुद्दे पर सरकार का रुख पूरी तरह साफ और दृढ़ है।
नेपाल का कड़ा रुख, बातचीत की पहल
नेपाल ने हाल ही में भारत और चीन द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा को लिपुलेख मार्ग से फिर शुरू करने की तैयारी पर आपत्ति जताई। काठमांडू का कहना है कि यह इलाका उसके अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए इस पर किसी भी गतिविधि से पहले उसकी सहमति जरूरी है। हालांकि, नेपाल ने साथ ही यह भी संकेत दिया है कि वह इस विवाद को बातचीत और कूटनीतिक तरीके से सुलझाना चाहता है। सरकार के प्रवक्ताओं ने कहा कि दोनों देशों के बीच संवाद ही इस मुद्दे का समाधान निकाल सकता है।
भारत ने दावे को किया खारिज
भारत ने नेपाल के दावे को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। भारतीय पक्ष का कहना है कि लिपुलेख दर्रा लंबे समय से कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है और यह भारत के नियंत्रण में है। विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि नेपाल के दावे “ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित नहीं हैं” और इस तरह के दावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा विवाद?
लिपुलेख दर्रा हिमालय में स्थित एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो भारत, नेपाल और चीन के त्रि-जंक्शन के पास पड़ता है। नेपाल अपने दावे का आधार 1816 की सुगौली संधि को मानता है, जबकि भारत का कहना है कि सीमा निर्धारण की व्याख्या अलग है और यह क्षेत्र उसके प्रशासन में लंबे समय से है।
यात्रा और राजनीति का कनेक्शन
कैलाश मानसरोवर यात्रा, जो हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, इसी मार्ग से संचालित होती है। यात्रा को फिर से शुरू करने के फैसले ने इस विवाद को एक बार फिर हवा दे दी है और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ा दिया है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रणनीतिक और भू-राजनीतिक पहलू भी जुड़े हुए हैं। अब नजर इस बात पर है कि क्या भारत और नेपाल बातचीत के जरिए इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान निकाल पाएंगे या फिर यह मुद्दा आगे और तनाव बढ़ाएगा।
निष्कर्ष
लिपुलेख विवाद ने एक बार फिर भारत-नेपाल संबंधों की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। जहां नेपाल अपने दावे पर अडिग है, वहीं भारत भी अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा। ऐसे में कूटनीतिक बातचीत ही इस मुद्दे को सुलझाने का एकमात्र रास्ता नजर आता है।






