संयुक्त राष्ट्र में भारत का बड़ा कदम: रूस-यूक्रेन युद्ध विराम प्रस्ताव पर फिर बनाई दूरी
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संवाद 24 नई दिल्ली। रूस और यूक्रेन के बीच जारी भीषण युद्ध को लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में एक बार फिर सरगर्मी तेज हो गई है। हाल ही में यूक्रेन में तत्काल युद्ध विराम को लेकर लाए गए एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर मतदान हुआ, जिसमें भारत ने एक बार फिर ‘अनुपस्थित’ (Abstain) रहने का विकल्प चुना। भारत का यह निर्णय वैश्विक राजनीति में उसके स्वतंत्र और निष्पक्ष विदेश नीति के रुख को और मजबूती से रेखांकित करता है। जहां पश्चिमी देशों ने इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है, वहीं भारत ने स्पष्ट किया है कि संवाद और कूटनीति ही इस संघर्ष का एकमात्र समाधान है।
वोटिंग का गणित और भारत की अनुपस्थिति
संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किए गए इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य रूस से अपनी सेनाएं वापस बुलाने और तत्काल प्रभाव से शत्रुता समाप्त करने की मांग करना था। वोटिंग के दौरान कुल 141 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जबकि 7 देशों ने इसके खिलाफ वोट दिया। भारत और चीन समेत 32 देश ऐसे रहे जिन्होंने मतदान की प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया। भारत का यह स्टैंड युद्ध की शुरुआत से ही कायम है, जिसमें वह किसी भी गुट का हिस्सा बनने के बजाय शांति का पक्षधर बना हुआ है।
भारत ने क्यों बनाई दूरी? कूटनीतिक वजहें
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने मतदान के बाद अपने स्पष्टीकरण में कहा कि भारत यूक्रेन की स्थिति को लेकर गहराई से चिंतित है, लेकिन किसी भी प्रस्ताव की सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या वह जमीन पर शांति लाने में सहायक है। भारत का मानना है कि केवल प्रस्ताव पारित करने से शांति स्थापित नहीं होगी जब तक कि दोनों पक्ष मेज पर बैठकर बात न करें। भारत ने “तटस्थ” रहने के बजाय “सक्रिय शांति दूत” की भूमिका निभाने पर जोर दिया है।
पश्चिमी दबाव और प्रधानमंत्री मोदी का ‘शांति संदेश’
इस मतदान से पहले भारत पर पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ की ओर से भारी दबाव था कि वह रूस के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए। हालांकि, भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों और रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए संतुलित फैसला लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही रूसी राष्ट्रपति पुतिन से कहा था कि “यह युद्ध का युग नहीं है”, और भारत का संयुक्त राष्ट्र में यह वोट उसी विचार का विस्तार माना जा रहा है।
यूक्रेन संकट और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से इस बात को भी उठाया कि इस युद्ध का सबसे बुरा असर विकासशील देशों (Global South) पर पड़ रहा है। खाद्य सुरक्षा, ईंधन की कमी और उर्वरकों की बढ़ती कीमतों ने गरीब देशों की कमर तोड़ दी है। भारत ने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उन देशों की समस्याओं पर भी ध्यान देना चाहिए जो इस युद्ध का हिस्सा नहीं हैं, फिर भी इसकी कीमत चुका रहे हैं।
भविष्य की राह: जी-20 और मध्यस्थता की भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह रणनीति उसे भविष्य में एक बड़े मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर सकती है। भारत एकमात्र ऐसा देश है जिसके संबंध रूस और पश्चिम, दोनों के साथ बेहतर हैं। आगामी जी-20 शिखर सम्मेलनों और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत इस युद्ध को समाप्त कराने के लिए एक सेतु का काम कर सकता है। भारत ने बार-बार दोहराया है कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का सम्मान किया जाना चाहिए।
भारत की संप्रभु विदेश नीति
भारत का मतदान से दूर रहना यह साबित करता है कि नई दिल्ली की विदेश नीति किसी बाहरी दबाव में नहीं, बल्कि सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के आधार पर काम करती है। यूक्रेन में मानवीय सहायता भेजने से लेकर शांति की अपील करने तक, भारत ने एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति की भूमिका निभाई है। अब देखना यह होगा कि वैश्विक मंच पर भारत का यह स्टैंड आने वाले समय में रूस-यूक्रेन के बीच बातचीत के द्वार खोलने में कितना मददगार साबित होता है।






