भारत नहीं करेगा शेख हसीना का प्रत्यर्पण, दो कानूनी आधार बने ढाल, सुप्रीम कोर्ट में विवाद गहराया
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नई दिल्ली: बांग्लादेश न्यायाधिकरण के फैसले और अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस की प्रत्यर्पण मांग के बावजूद भारत ने साफ संकेत दे दिया है कि वह पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को नहीं सौंपेगा। भारत सरकार ने सोमवार को जारी अपने बयान में इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। हसीना फिलहाल भारत की सुरक्षा में हैं। यह मामला आपराधिक से अधिक राजनीतिक प्रकृति का माना जा रहा है, जो भारत के रुख को मजबूत करता है।
2013 में भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर हुए थे और 2016 में इसमें संशोधन भी हुआ था। इसके आधार पर ही बांग्लादेश ने दिसंबर 2024 में हसीना को सौंपने की मांग की थी। इसी संधि के तहत भारत 2020 में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के दो दोषियों को बांग्लादेश भेज चुका है। हालांकि प्रत्यर्पण तभी हो सकता है जब दोनों देशों में वह अपराध अपराध की श्रेणी में आता हो और आरोपी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो।
दो मुख्य आधार जिन पर भारत प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है
1. राजनीतिक अपराध का मामला (अनुच्छेद 6)
अगर अपराध राजनीतिक प्रकृति का है तो भारत प्रत्यर्पण से इंकार कर सकता है। हालांकि हत्या, नरसंहार और मानवता विरोधी अपराध इस श्रेणी से बाहर हैं। न्यायाधिकरण ने हसीना को गंभीर आरोपों में दोषी माना है, लेकिन भारत यह तर्क दे सकता है कि मुकदमा राजनीतिक मकसद से प्रेरित है।
2. निष्पक्ष सुनवाई का अभाव (अनुच्छेद 8)
यदि आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई या कानूनी सहायता नहीं मिली और उसकी जान को खतरा है, तो भारत प्रत्यर्पण नहीं करेगा। संयुक्त राष्ट्र पहले ही न्यायाधिकरण की प्रक्रियाओं और न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर सवाल उठा चुका है। हसीना को अपना पक्ष रखने या वकील नियुक्त करने का अवसर नहीं दिया गया था। भारत इस आधार को आसानी से सिद्ध कर सकता है।
अगर भारत प्रत्यर्पण से इन्कार करता है तो असर क्या होगा
- कूटनीतिक तनाव बढ़ेगा, बांग्लादेश कह सकता है कि भारत न्यायिक फैसले का सम्मान नहीं कर रहा
- संबंध टूटने की संभावना कम, क्योंकि बांग्लादेश व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति में भारत पर निर्भर है
- रणनीतिक जोखिम, यदि बांग्लादेश चीन या पाकिस्तान की ओर झुकता है
- पहले से एक पाकिस्तानी युद्धपोत ढाका पहुंच चुका है और यूनुस को ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ का नक्शा लिए देखा गया
हसीना के संभावित विकल्प
कानूनी विकल्प:
- बांग्लादेश हाई कोर्ट में फैसले को चुनौती दें
- अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं से हस्तक्षेप की मांग करें
- पुनर्विचार के लिए सबूतों और सुनवाई प्रक्रिया पर प्रश्न उठाएं
राजनीतिक विकल्प:
- भारत या किसी अन्य देश में शरण मांग सकती हैं
- अवामी लीग अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाकर मुकदमे को रोकने की कोशिश कर सकती है
- जनसमर्थन जुटाकर सजा में नरमी या माफी का प्रयास
सीमित भूमिका संयुक्त राष्ट्र और ICC की
यूएन मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच कर सकता है और मुकदमे की निष्पक्षता पर सवाल उठा सकता है। यदि इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) प्रक्रिया में अनियमितता पाता है, तो भारत उसके आधार पर हसीना को प्रत्यर्पण से इंकार कर सकता है।
थरूर ने भी जताई चिंता
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा—
“मैं मृत्युदंड के खिलाफ हूं। किसी को अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना सुनवाई करना और फिर सजा-ए-मौत सुनाना परेशान करने वाली बात है।”






