इजरायल में अमेरिकी मॉडल पर सीधे प्रधानमंत्री चुनने की सुगबुगाहट तेज

​संवाद 24 नई दिल्ली। मध्य-पूर्व की राजनीति में इस समय जबरदस्त भूचाल आया हुआ है। इजरायल के संसदीय चुनाव संपन्न होने के बाद सत्ता की कुर्सी को लेकर रस्साकशी चरम पर पहुंच चुकी है। देश की 120 सदस्यीय संसद यानी नीसेट में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण एक बार फिर राजनीतिक गतिरोध की गंभीर स्थिति पैदा हो गई है। इस बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ आम जनता और समूचे विपक्षी खेमे ने मोर्चा खोल दिया है। सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब और संसद के भीतर विपक्षी दलों की लामबंदी यह साफ संकेत दे रही है कि इजरायल के सियासी पटल पर कोई बड़ा बदलाव दस्तक देने वाला है।

​सड़कों पर फूटा जनाक्रोश, सभी बड़े शहरों में प्रदर्शन
​राजधानी तेल अवीव से लेकर हाइफा, यरुशलम और देश के अन्य प्रमुख महानगरों तक हजारों की तादाद में नागरिक सड़कों पर उतर आए हैं। हाथों में राष्ट्रीय ध्वज, तख्तियां और बैनर लिए प्रदर्शनकारी नेतन्याहू विरोधी खेमे से एकजुट होकर तत्काल वैकल्पिक सरकार बनाने की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि देश पिछले कई वर्षों से लगातार चुनावी चक्रव्यूह और राजनीतिक अनिश्चितता में फंसा हुआ है। ऐसे में जनता का धैर्य अब जवाब दे चुका है। नागरिक संगठनों और विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्षी दल अपने आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच पर नहीं आए, तो देश को फिर से एक अस्थिर दौर में धकेला जा सकता है।

​स्पीकर आमिर ओहाना को हटाने पर विपक्ष एकमत
​संसदीय गणित के लिहाज से देखा जाए तो कार्यवाहक प्रधानमंत्री नेतन्याहू के लिकुड गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जो 61 सीटों के जादुई आंकड़े से 8 सीट दूर है। दूसरी ओर, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी ब्लॉक और अन्य दल मिलकर संख्याबल में आगे दिखाई दे रहे हैं। ​संसद के आगामी सत्र से पहले ही विरोधी गुटों ने रणनीतिक शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। खबर है कि विपक्षी दलों के बीच लिकुड पार्टी के प्रमुख चेहरे और वर्तमान स्पीकर आमिर ओहाना को पद से हटाने पर पूर्ण सहमति बन चुकी है। विपक्ष की रणनीति है कि संसद के पहले ही सत्र में अपना नया स्पीकर चुनकर नेतन्याहू गुट के रणनीतिक नियंत्रण को खत्म किया जाए, जिससे सरकार गठन की प्रक्रिया पर विपक्ष अपनी पकड़ मजबूत कर सके।

​अमेरिकी मॉडल: सीधे प्रधानमंत्री चुनाव का ऐतिहासिक प्रस्ताव
​इजरायल की राजनीति में पिछले एक दशक से त्रिशंकु जनादेश एक आम समस्या बन चुका है। 120 सीटों वाली नीसेट में छोटी-छोटी पार्टियों की सौदेबाजी और गठबंधनों के बार-बार टूटने से शासन व्यवस्था ठप हो जाती है। इस राजनीतिक पक्षाघात से हमेशा के लिए बाहर निकलने के लिए विपक्षी खेमे में एक अभूतपूर्व फॉर्मूले पर गंभीरता से विचार शुरू हुआ है – प्रधानमंत्री पद के लिए सीधे जनता द्वारा मतदान।
​इस व्यवस्था के तहत:
1- ​देश का मतदाता किसी पार्टी के बजाय सीधे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को वोट देकर चुनेगा, जैसा कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की प्रणाली में होता है।
2- ​सीधे चुने गए प्रधानमंत्री को नीसेट में विश्वास मत या 61 सीटों के पारंपरिक बहुमत साबित करने की मजबूरी नहीं रहेगी।
3- ​निर्वाचित प्रधानमंत्री अपनी मर्जी और योग्यता के आधार पर मंत्री परिषद का गठन कर बिना किसी ब्लैकमेलिंग के पूर्ण कार्यकाल तक सरकार चला सकेगा।
​दिलचस्प बात यह है कि इस तरह का विचार साल 2021 में खुद नेतन्याहू ने उस समय सामने रखा था जब वे सरकार बनाने में नाकाम रहे थे। अब वही पासा विपक्ष उनकी सत्ता को चुनौती देने के लिए फेंकने की तैयारी में है। शुक्रवार को आहूत होने वाले संसद के पहले सत्र में इस आशय का एक विधायी प्रस्ताव पेश किया जा सकता है। माना जा रहा है कि यदि यह प्रस्ताव सदन में आता है, तो इसे सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के कई सांसदों का अप्रत्यक्ष समर्थन मिल सकता है। हालांकि, अरब राजनीतिक दलों के रुख को लेकर अभी संशय बना हुआ है और उन्हें भी विश्वास में लेने की बातचीत जारी है। ​आने वाले चंद दिन इजरायल के इतिहास की दिशा तय करने वाले साबित होंगे। क्या इजरायल अपने 76 वर्षों से चले आ रहे संसदीय ढांचे को बदलकर प्रत्यक्ष निर्वाचन व्यवस्था को अपनाएगा या फिर विपक्षी दल एक साथ मिलकर नेतन्याहू के सियासी वर्चस्व को समाप्त करेंगे, इस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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