केंद्र सरकार की नई नीति से 70% तक गिरेंगे दवाओं के दाम, मरीजों को हर साल बचेंगे ₹2,500 करोड़

संवाद 24 नई दिल्ली। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे लाखों भारतीय परिवारों के लिए एक बहुत बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। अक्सर यह देखा गया है कि कैंसर का पता चलते ही मरीजों और उनके परिजनों पर बीमारी के डर से कहीं ज्यादा उसके इलाज और महंगी दवाओं के आर्थिक बोझ का पहाड़ टूट पड़ता है। कई परिवारों की जीवन भर की जमा-पूंजी इन महंगी जीवनरक्षक दवाओं को खरीदने में ही खत्म हो जाती है। इसी गंभीर संकट को संज्ञान में लेते हुए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक और युगांतरकारी कदम उठाने की योजना तैयार की है। सरकार कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख दवाओं पर कंपनियों और वितरकों के व्यापारिक मुनाफे (Trade Margin Rationalization – TMR) को अधिकतम 30 प्रतिशत तक सीमित करने जा रही है। इस प्रस्तावित नीति के लागू होते ही कैंसर की दवाओं के खुदरा दामों में 20 से लेकर 70 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आने का अनुमान है।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का बड़ा खुलासा
यह महत्वपूर्ण जानकारी केंद्र सरकार ने दवाओं की मनमानी कीमतों और मूल्य नियमन से जुड़ी एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में दाखिल एक औपचारिक हलफनामे में दी है। उल्लेखनीय है कि यह जनहित याचिका डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ द्वारा दायर की गई थी, जिसमें जीवनरक्षक दवाओं की वास्तविक लागत और उन पर वसूले जाने वाले अनुचित मुनाफे पर कड़ा नियंत्रण लगाने की गुहार लगाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने स्पष्ट किया कि उसका प्राथमिक उद्देश्य कैंसर रोधी दवाओं को हर आम और खास नागरिक की जेब के अनुकूल बनाना, उनकी बाजार में निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना और दवाओं की मूल्य निर्धारण प्रणाली में पूरी पारदर्शिता लाना है। सरकारी अनुमान के अनुसार, व्यापारिक मार्जिन पर 30 फीसदी की सीमा लगाने से देश भर के कैंसर पीड़ित परिवारों को हर साल लगभग 2,500 करोड़ रुपये की सीधी बचत होगी।

समझिए क्या है ‘ट्रेड मार्जिन’ और कैसे बढ़े दाम?
आम तौर पर जब कोई दवा फैक्ट्री में बनकर तैयार होती है, तो उसकी निर्माण लागत (Ex-Factory Price) और मरीज तक पहुंचते-पहुंचते उसके अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच जमीन-आसमान का अंतर हो जाता है। फार्मास्युटिकल कंपनियां, बड़े थोक वितरक, स्टॉकिस्ट और खुदरा केमिस्ट इस अंतर के बीच कई सौ फीसदी तक का भारी मुनाफा (ट्रेड मार्जिन) कमाते हैं। प्रस्तावित ‘ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन’ (TMR) नीति के तहत सरकार इस पूरी आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) के कुल मुनाफे को दवा के एमआरपी के 30 प्रतिशत के दायरे में बांध देगी। इसका सीधा असर यह होगा कि जो इंजेक्शन या गोलियां पहले हजारों और लाखों रुपये में बिकती थीं, उनकी कीमतें धड़ाम से नीचे आ जाएंगी। हालांकि, सरकार ने साफ किया है कि यह फिलहाल एक प्रस्तावित व्यवस्था है, जिसे विशेषज्ञों की अंतिम समीक्षा के बाद आधिकारिक तौर पर अधिसूचित किया जाएगा।

15 दिनों में आएगी विशेषज्ञ समिति की अंतिम रिपोर्ट
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने कैंसर की आवश्यक दवाओं की औपचारिक सूची तय करने के लिए 9 अक्टूबर को स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (DGHS) की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। यह विशेषज्ञ पैनल 10 से 15 दिनों के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट और सिफारिशें सरकार को सौंपेगा। समिति की सिफारिशों के आधार पर राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) आवश्यक अधिसूचना जारी करेगा। सरकार के अनुसार, अत्यधिक कम कीमत वाली और अति-सामान्य दवाओं को इस कड़े नियमन से बाहर रखा जा सकता है ताकि उनकी आपूर्ति प्रभावित न हो। बाजार की मांग और जनस्वास्थ्य की प्राथमिकताओं के अनुसार समय-समय पर इस सूची का विस्तार भी किया जाएगा।

2019 के सफल मॉडल से मिली प्रेरणा
हलफनामे में सरकार ने इस बात का भी उल्लेख किया कि यह पहला मौका नहीं है जब ट्रेड मार्जिन पर कैंडल लगाई जा रही है। इससे पहले वर्ष 2019 में एनपीपीए ने एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत कैंसर की 42 चुनिंदा गैर-अनुसूचित दवाओं के मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित किया था। उस फैसले का परिणाम यह रहा था कि 526 अलग-अलग ब्रांड्स की दवाओं के एमआरपी में अचानक भारी कमी दर्ज की गई थी, जिससे मरीजों को प्रति वर्ष लगभग 984 करोड़ रुपये की सीधी राहत मिली थी। इसी सफल अनुभव के बाद अब सरकार ने डायबिटीज और दिल की बीमारियों से जुड़ी जरूरी दवाओं, कोरोनरी स्टेंट और नी-इम्प्लांट्स की तरह कैंसर की विस्तृत श्रृंखला को इस दायरे में लाने का मजबूत फैसला किया है।

उद्योग जगत की चिंता और संतुलित समाधान
सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि ट्रेड मार्जिन घटाने से छोटे और मध्यम दवा निर्माताओं, स्थानीय वितरकों और खुदरा विक्रेताओं के वित्तीय गणित पर असर पड़ने की चिंताएं सामने आई हैं। विशेष रखरखाव (कोल्ड चेन) वाली और दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में भेजी जाने वाली दवाओं के वितरण को लेकर उद्योग संगठनों ने अपनी बात रखी है। सरकार का कहना है कि वह दवाओं को सस्ता करने और उनकी पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने के बीच सटीक संतुलन साध रही है। इसके अलावा, देश भर में संचालित लगभग 19,000 ‘जन औषधि केंद्रों’ और ‘अमृत’ (AMRIT) फार्मेसियों के विशाल नेटवर्क के माध्यम से भी सस्ती जेनेरिक दवाएं निर्बाध रूप से आम जनता तक पहुंचाई जा रही हैं।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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