
संवाद 24 नई दिल्ली। देश के निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों और उनके लाचार परिवारों की जेब काटने की मनमानी पर अब केंद्र सरकार और देश की शीर्ष अदालत का शिकंजा कसने लगा है। जीवन रक्षक दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स (उपकरणों व सर्जिकल सामग्रियों) पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के नाम पर मरीजों से मोटी रकम वसूलने की बढ़ती शिकायतों के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद अहम हलफनामा दाखिल किया है। सरकार ने अदालत में साफ और कड़े शब्दों में स्वीकार किया है कि निजी अस्पतालों द्वारा दवाओं और कंज्यूमेबल्स पर अधिकतम खुदरा मूल्य वसूलना सीधे तौर पर ‘कदाचार’ (Malpractice) की श्रेणी में आता है। सरकार ने शीर्ष अदालत को भरोसा दिलाया है कि वह इस गंभीर समस्या से पूरी तरह वाकिफ है और सभी पक्षों के साथ परामर्श करके एक प्रभावी विनियामक ढांचा तैयार करने पर काम कर रही है।
बेबस मरीज और अस्पताल: सूचना का खतरनाक असंतुलन
सुप्रीम कोर्ट में सभी आवश्यक दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों की सीमा तय करने (प्राइस कैपिंग) को लेकर दायर याचिका पर जवाब देते हुए केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने यह हलफनामा पेश किया। सरकार ने अदालत के सामने जमीनी हकीकत को बयां करते हुए कहा कि एक सामान्य उपभोक्ता की तुलना में अस्पताल में भर्ती मरीज की सौदेबाजी करने की क्षमता (Bargaining Power) शून्य के बराबर होती है। हलफनामे में रेखांकित किया गया कि स्वास्थ्य सेवा और फार्मास्यूटिकल सेक्टर की प्रकृति ऐसी है कि यहां डॉक्टर, अस्पताल और मेडिकल स्टोर्स के मुकाबले मरीज के पास जानकारी का भारी अभाव (Information Asymmetry) होता है। मरीज या उसके तीमारदार उस मानसिक दबाव और लाचारी में नहीं होते कि वे डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा या सर्जिकल उपकरण के मूल्य पर मोलभाव कर सकें। इसी भावनात्मक और व्यावहारिक मजबूरी का फायदा उठाकर निजी अस्पताल उन पर मनमाना बोझ लाद देते हैं।
विडंबना: जहां बनती हैं दुनिया की सबसे सस्ती दवाएं, वहीं मरीज बेहाल
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में भारतीय स्वास्थ्य बाजार की एक चौंकाने वाली विडंबना को भी उजागर किया। भारत दुनिया भर में सस्ती और गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक माना जाता है, जिसके चलते इसे ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहा जाता है। इसके बावजूद देश के अपने ही नागरिकों को अस्पतालों में निर्माण लागत से कई गुना अधिक दाम चुकाने पड़ रहे हैं। सरकार का कहना है कि सामान्य बाजार व्यवस्था में जहां कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है, वहां कीमतें स्वाभाविक रूप से कम रहती हैं और सरकार को हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन अस्पतालों के बंद परिसरों में यह प्रतिस्पर्धा पूरी तरह गायब हो जाती है। मरीज को अस्पताल के अंदर स्थित फार्मेसी से ही दवाएं और उपकरण खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है, जहां उन्हें भारी-भरकम एमआरपी पर बिल थमा दिया जाता है।
भारी डिस्काउंट पर खरीद, मरीज को पूरी MRP पर बिल
सरकारी हलफनामे में इस पूरे खेल के आंतरिक तंत्र का भी जिक्र किया गया है। बड़े निजी अस्पताल और कॉर्पोरेट स्वास्थ्य संस्थान थोक स्तर पर दवा कंपनियों से मेडिकल उपकरण, सीरिंज, कैनुला, कैथेटर, दस्ताने और जीवन रक्षक दवाएं बेहद कम कीमतों और भारी छूट पर खरीदते हैं। लेकिन जब बात सीधे भुगतान करने वाले (Cash/Out-of-Pocket) मरीजों को बिल देने की आती है, तो वही सामग्रियां छपे हुए पूरे एमआरपी पर चार्ज की जाती हैं। इस व्यवस्था के चलते अस्पतालों का मुनाफा कई सौ प्रतिशत तक बढ़ जाता है, जबकि मरीज का पूरा बजट तबाह हो जाता है। इस लूट के कारण कई मध्यमवर्गीय परिवार इलाज के भारी खर्च के नीचे दबकर गंभीर आर्थिक संकट का शिकार हो जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और आगे की राह
इससे पहले की सुनवाइयों के दौरान सुप्रीम कोर्ट भी इस बात पर तीखी नाराजगी जता चुका है कि कॉर्पोरेट अस्पताल सेवा भाव को ताक पर रखकर इसे विशुद्ध उद्योग बना चुके हैं। अदालत ने टिप्पणी की थी कि अस्पतालों को मरीजों की लाचारी का फायदा उठाने की खुली छूट नहीं दी जा सकती।
केंद्र सरकार ने अब स्पष्ट किया है कि वह नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA), स्वास्थ्य मंत्रालय और उपभोक्ता मामलों के विभागों के साथ मिलकर इस मनमानी पर लगाम लगाने के लिए ठोस दिशानिर्देश तैयार कर रही है। सरकार का इरादा न सिर्फ आवश्यक दवाओं की सूची का विस्तार करना है, बल्कि अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले सभी मेडिकल कंज्यूमेबल्स पर ट्रेड मार्जिन की सीमा तय करने का भी है, ताकि इलाज के नाम पर हो रही इस संगठित लूट पर पूर्ण विराम लगाया जा सके।






