
संवाद 24 नई दिल्ली। वैश्विक कूटनीति के गलियारों में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के भारत आगमन को लेकर बने संशय के बादलों के बीच एक बड़ा कूटनीतिक खुलासा सामने आया है। 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शिरकत करने के लिए आ रहे चीनी राष्ट्रपति की यात्रा अचानक तय नहीं हुई, बल्कि इसकी पटकथा हफ्तों पहले ही लिखी जा चुकी थी। राजनयिक सूत्रों से मिले संकेतों के अनुसार, बीजिंग ने सार्वजनिक घोषणा से काफी पहले 27 अगस्त को ही नई दिल्ली स्थित संबंधित दूतावास के जरिए उच्चस्तरीय वीजा प्रक्रिया शुरू कर दी थी। पिछले सात वर्षों के अंतराल के बाद चीनी राष्ट्राध्यक्ष का यह पहला भारत दौरा है, जिसे एशिया की दो सबसे बड़ी ताकतों के बीच नए सामरिक और आर्थिक संतुलनों की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
24 घंटे का सघन दौरा और उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी
चीनी राष्ट्रपति का यह दौरा लगभग 24 घंटे की निर्धारित अवधि का होगा। तय कार्यक्रम के तहत वे शनिवार दोपहर राष्ट्रीय राजधानी में लैंड करेंगे और अगले दिन दोपहर में प्रस्थान करेंगे। उनके साथ आ रहा 67 सदस्यीय उच्चस्तरीय सरकारी प्रतिनिधिमंडल इस यात्रा की गंभीरता को दर्शाता है। इस दल में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) के वरिष्ठ नीति निर्माता, पोलित ब्यूरो के शीर्ष रणनीतिकार और विदेश मंत्री वांग यी जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। इसके अलावा चीनी उद्योग जगत का एक बड़ा व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी समानांतर रूप से दिल्ली पहुंच रहा है, जो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार के आयामों पर चर्चा करेगा।
भारत मंडपम में भव्य अगवानी और द्विपक्षीय वार्ता का एजेंडा
शनिवार दोपहर मुख्य सम्मेलन स्थल भारत मंडपम पहुंचने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनका औपचारिक स्वागत किया जाएगा। इसके बाद ब्रिक्स के बंद सत्रों, बहुपक्षीय विमर्श और शाम को आयोजित होने वाले विशेष आधिकारिक रात्रिभोज में दोनों शीर्ष नेता एक साथ उपस्थित रहेंगे। शनिवार शाम को ही दोनों नेताओं के बीच बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय वार्ता का समय निर्धारित किया गया है। कूटनीतिक हलकों में इस मुलाकात को मील का पत्थर माना जा रहा है, क्योंकि साल 2024 में कजान शिखर सम्मेलन के बाद से दोनों पड़ोसियों के बीच संबंधों को सामान्य करने की जो प्रक्रिया शुरू हुई थी, यह बैठक उसे सीधे आगे बढ़ाने का काम करेगी।
व्यापार घाटा, बाजार पहुंच और भरोसेमंद सप्लाई चेन पर रहेगा जोर
सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य तनाव कम होने और गश्त व्यवस्था के सुचारू होने के बाद अब द्विपक्षीय वार्ताओं का केंद्र आर्थिक और व्यापारिक यथार्थवाद की ओर मुड़ता दिख रहा है। भारतीय पक्ष की ओर से व्यापार असंतुलन को पाटने, भारतीय उत्पादों को चीनी बाजारों में निष्पक्ष पहुंच दिलाने और फार्मास्यूटिकल्स, कृषि और सूचना तकनीक जैसे क्षेत्रों में गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाने पर कड़ा रुख अपनाए जाने की संभावना है। इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय और लचीली आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) सुनिश्चित करने तथा दोनों देशों के बीच निवेश नियमों में पारदर्शिता लाने जैसे अहम मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श होगा।
बदलते वैश्विक परिवेश में एशियाई संतुलन का नया अध्याय
वैश्विक भू-राजनीति में जारी ध्रुवीकरण और व्यापारिक टकरावों के बीच भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व का आमने-सामने बैठना केवल द्विपक्षीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से भी अत्यधिक संवेदनशील माना जा रहा है। ब्रिक्स के बढ़ते प्रभाव के बीच दोनों देशों का यह प्रयास है कि मतभेदों को विवाद न बनने दिया जाए और आर्थिक प्राथमिकताओं को प्राथमिकता दी जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, सीमित समय का यह दौरा दोनों देशों के भविष्य के आर्थिक सहयोग और सीमावर्ती क्षेत्रों में दीर्घकालिक शांति की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।






