कभी पुरुषों तक सीमित थी पंडवानी, एक महिला ने बदल दी पूरी तस्वीर, एक तंबूरा और महाभारत की पूरी दुनिया, आखिर क्या है पंडवानी का जादू?

संवाद 24 डेस्क। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में कुछ ऐसी परंपराएं हैं, जिनमें इतिहास, धर्म, लोकविश्वास और मनोरंजन एक साथ दिखाई देते हैं। पंडवानी भी ऐसी ही एक विलक्षण लोकनाट्य और गायन परंपरा है, जिसमें महाभारत की कथाओं को गीत, संवाद, अभिनय और वाद्य संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। मंच पर सामान्यतः एक प्रमुख कलाकार कथा को आगे बढ़ाता है और अपनी आवाज, हाव-भाव तथा अभिनय से महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देता है। यही वजह है कि पंडवानी को महज लोकगीत कहना इसके व्यापक स्वरूप को छोटा कर देना होगा। यह एक साथ गायन, कथावाचन, अभिनय और लोकनाट्य की विधा है।
आज पंडवानी का नाम आते ही पद्म विभूषण तीजन बाई की छवि सामने आती है। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने की कहानी आसान नहीं थी। जिस दौर में महिलाओं के लिए सार्वजनिक मंच पर पंडवानी गाना स्वीकार्य नहीं माना जाता था, उस समय तीजन बाई ने न केवल इस परंपरा में प्रवेश किया, बल्कि उस शैली को चुना जिसे लंबे समय तक पुरुष कलाकारों का क्षेत्र माना जाता था। उन्होंने अपनी सशक्त आवाज और अभिनय शैली से पंडवानी को देश के गांवों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।

आखिर क्या है पंडवानी, जिसके लिए पूरी दुनिया में बनी पहचान?
‘पंडवानी’ शब्द को सामान्यतः ‘पांडववाणी’ से जोड़ा जाता है, जिसका आशय पांडवों की कथा या पांडवों से संबंधित महाभारत की गाथा से है। हालांकि इसके प्रदर्शन में महाभारत के केवल पांडवों से जुड़े प्रसंग ही नहीं, बल्कि महाकाव्य के अनेक पात्रों और घटनाओं का वर्णन किया जाता है। छत्तीसगढ़ सरकार के सांस्कृतिक विवरण के अनुसार यह मुख्य रूप से महाभारत के पांडवों की कथा को अत्यंत जीवंत तरीके से प्रस्तुत करने वाली लोकगाथा है।
पंडवानी की सबसे बड़ी विशेषता इसका मौखिक और प्रदर्शनात्मक स्वरूप है। कलाकार किसी लिखित पटकथा को केवल पढ़ता नहीं है, बल्कि कथा को अपनी आवाज और अभिनय के जरिए सामने लाता है। कभी आवाज में क्रोध, कभी करुणा, कभी वीरता और कभी हास्य का भाव पैदा करके कलाकार दर्शकों को कथा के भीतर खींच लेता है।
एक प्रमुख कलाकार के साथ सहयोगी गायक और वादक भी होते हैं। मुख्य कलाकार के हाथ में सामान्यतः तंबूरा या एकतारा जैसा वाद्य रहता है, जिसका उपयोग केवल संगीत के लिए नहीं, बल्कि अभिनय में भी किया जाता है। यही कारण है कि पंडवानी का मंचन किसी पारंपरिक गायन कार्यक्रम की तुलना में लोकनाट्य के अधिक करीब दिखाई देता है।

कभी पुरुषों का क्षेत्र क्यों मानी जाती थी पंडवानी?
पंडवानी के इतिहास में महिलाओं की भागीदारी को लेकर सामाजिक और सांस्कृतिक सीमाएं लंबे समय तक मौजूद रही हैं। विशेष रूप से कापालिक शैली में पुरुष कलाकारों का प्रभाव मजबूत था। इस शैली में कलाकार बैठकर केवल कथा नहीं गाता, बल्कि खड़े होकर पात्रों और घटनाओं को अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत करता है।
छत्तीसगढ़ सरकार के सांस्कृतिक विवरण में भी पंडवानी को पारंपरिक रूप से पुरुषों के वर्चस्व वाली विधा बताया गया है, जिसमें बाद के दौर में महिला कलाकारों की भागीदारी बढ़ी।
इसी पृष्ठभूमि में तीजन बाई का मंच पर आना महज किसी नई कलाकार का आगमन नहीं था। यह एक ऐसी सामाजिक सीमा को चुनौती देना था, जिसके भीतर महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती थी।

तीजन बाई ने जब चुनी कापालिक शैली, बदल गया पंडवानी का इतिहास
तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के गनियारी गांव में हुआ था और वे पारधी समुदाय से संबंधित थीं। बचपन में उन्होंने अपने नाना ब्रजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनीं। इन लोककथाओं ने उनके भीतर पंडवानी के प्रति गहरी रुचि पैदा की। बाद में उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से पंडवानी का प्रशिक्षण भी लिया।
उनकी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति किशोरावस्था में हुई। उस समय महिलाओं के लिए पंडवानी की प्रस्तुति का तरीका अलग था और उन्हें सामान्यतः बैठकर गाने वाली वेदमती शैली तक सीमित माना जाता था। लेकिन तीजन बाई ने कापालिक शैली को अपनाया, जिसमें कलाकार खड़े होकर कथा का अभिनय करता है।
यही फैसला आगे चलकर उनकी पहचान बना।
उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का धनुष और कभी युद्धभूमि का प्रतीक। चेहरे के भाव, आवाज का उतार-चढ़ाव और शरीर की गति मिलकर महाभारत के पात्रों को मंच पर साकार कर देते थे। इस तरह तीजन बाई ने पंडवानी को केवल सुनने की विधा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे देखने और महसूस करने वाला अनुभव बना दिया।

वेदमती और कापालिक शैली में क्या है अंतर?
पंडवानी की चर्चा में इसकी दो प्रमुख शैलियों—वेदमती और कापालिक—का उल्लेख जरूरी है।
वेदमती शैली अपेक्षाकृत सरल और स्थिर प्रस्तुति के लिए जानी जाती है। इसमें मुख्य कलाकार बैठकर कथा का गायन और वर्णन करता है। इसके विपरीत कापालिक शैली अधिक नाटकीय और गतिशील है। कलाकार खड़े होकर पात्रों का अभिनय करता है, घटनाओं को हाव-भाव से प्रस्तुत करता है और कथा में नाटकीयता पैदा करता है।
इसी अंतर ने तीजन बाई की कला को विशेष पहचान दी। उन्होंने कापालिक शैली को अपनी विशिष्ट आवाज और अभिनय के साथ ऐसा रूप दिया कि पंडवानी के मंचीय प्रदर्शन की एक अलग पहचान बनी।
हालांकि समकालीन पंडवानी में दोनों शैलियों के तत्वों का मेल भी दिखाई देता है। प्रदर्शन की परंपरा समय के साथ बदली है और कलाकारों ने अपनी सुविधा, प्रशिक्षण तथा मंच की जरूरत के अनुसार अलग-अलग तत्वों को अपनाया है।

महाभारत की कथा को लोकभाषा में सुनाने की ताकत
पंडवानी की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसकी भाषा और प्रस्तुति है। महाभारत जैसा विशाल महाकाव्य जब लोकभाषा, स्थानीय लय और ग्रामीण जीवन से जुड़े भावों के साथ प्रस्तुत होता है तो वह आम दर्शक के लिए सहज हो जाता है।
पंडवानी में कलाकार केवल यह नहीं बताता कि महाभारत में क्या हुआ। वह घटनाओं को इस तरह प्रस्तुत करता है कि दर्शक स्वयं उस दृश्य का हिस्सा महसूस करने लगता है। युद्ध का वर्णन हो तो आवाज में वीरता आ जाती है, द्रौपदी के प्रसंग में भावनात्मक तीव्रता दिखाई देती है और भीम या अर्जुन जैसे पात्रों का वर्णन करते समय कलाकार की देहभाषा भी बदल जाती है।
यही पंडवानी की लोकशक्ति है—महाकाव्य को पुस्तक से निकालकर जनस्मृति और मंच पर ले आना।

तीजन बाई के सामने केवल मंच की चुनौती नहीं थी
तीजन बाई की कहानी को केवल सफलता की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा। उनकी यात्रा सामाजिक रूढ़ियों और व्यक्तिगत संघर्षों से होकर गुजरी।
भारतीय Express के अनुसार, बचपन में जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से पंडवानी गाने की इच्छा जताई तो उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। उनके समुदाय में महिलाओं के सार्वजनिक रूप से गाने को लेकर कठोर सामाजिक मान्यताएं थीं। उन्होंने इन बाधाओं के बावजूद अपनी कला को नहीं छोड़ा।
यही वह बिंदु है जहां तीजन बाई का संघर्ष पंडवानी के इतिहास का हिस्सा बन जाता है। उन्होंने केवल एक कला सीखी नहीं, बल्कि उस कला में महिलाओं की जगह के लिए भी संघर्ष किया।
उनका जीवन इस बात का उदाहरण बना कि लोककला की परंपरा स्थिर नहीं होती। उसे आगे बढ़ाने वाले कलाकार उसमें नए रास्ते खोल सकते हैं।

गांव की चौपाल से विदेशों तक पहुंची पंडवानी
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पंडवानी ने छत्तीसगढ़ की सीमाओं से बाहर अपनी पहचान बनानी शुरू की। सांस्कृतिक दस्तावेजों के अनुसार 1970 के दशक में पंडवानी कलाकारों के विदेशी दौरे शुरू हुए और इस लोकविधा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।
तीजन बाई इस यात्रा की सबसे प्रमुख हस्तियों में शामिल रहीं। उनकी प्रस्तुति की ताकत भाषा की सीमा को पार कर जाती थी। दर्शक छत्तीसगढ़ी भाषा पूरी तरह न समझने के बावजूद आवाज, अभिनय, भाव और कथा के माध्यम से महाभारत के प्रसंगों को महसूस कर सकते थे।
यही कारण है कि उनकी प्रस्तुतियां भारत के साथ विदेशों में भी सराही गईं। पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय मंच मिलने में उनके योगदान को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है।

पुरस्कारों ने भी दी उनके योगदान को राष्ट्रीय मान्यता
तीजन बाई की कला को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में लगातार पहचान मिली। उन्हें पद्म श्री 1988 में, पद्म भूषण 2003 में और पद्म विभूषण 2019 में प्रदान किया गया। इस तरह वे भारत के तीनों प्रमुख पद्म सम्मानों से सम्मानित होने वाली प्रमुख लोककलाकारों में शामिल हुईं।
उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य सम्मानों से भी नवाजा गया। फुकुओका पुरस्कार जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान ने भी उनकी कला की वैश्विक स्वीकार्यता को रेखांकित किया।
इन पुरस्कारों का महत्व केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं है। यह उस लोकपरंपरा की भी राष्ट्रीय पहचान है, जिसे लंबे समय तक ग्रामीण और मौखिक संस्कृति का हिस्सा माना जाता रहा।

तीजन बाई के निधन के बाद फिर उठता है संरक्षण का सवाल
जुलाई 2026 में तीजन बाई के निधन के साथ पंडवानी की दुनिया ने अपनी सबसे प्रभावशाली आवाजों में से एक खो दी। उनका निधन रायपुर स्थित एम्स में हुआ। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं।
उनके निधन के बाद एक बार फिर यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि लोककलाओं को किसी एक महान कलाकार के नाम और व्यक्तित्व से आगे कैसे जीवित रखा जाए।
किसी भी लोकविधा की वास्तविक सुरक्षा केवल कलाकार को सम्मानित करने से नहीं होती। इसके लिए नई पीढ़ी को प्रशिक्षण, मंच, आर्थिक सहयोग और दर्शक—चारों की जरूरत होती है। पंडवानी के मामले में भी यही चुनौती है।

पंडवानी की असली ताकत उसकी मौखिक परंपरा में है
पंडवानी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह केवल पुस्तकीय ज्ञान पर आधारित कला नहीं है। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनने, याद रखने, गाने और प्रस्तुत करने से आगे बढ़ी है। IGNCA के अनुसार पंडवानी की परंपरा लंबे समय से मौखिक रूप में महाभारत की कथाओं को आगे बढ़ाती रही है और इसका संबंध पारधान, गोंड तथा देवार जैसे समुदायों से भी रहा है।
मौखिक परंपरा की यही खूबी उसकी चुनौती भी है। यदि कलाकारों की नई पीढ़ी इस कला से दूर होती गई तो केवल लिखित दस्तावेज इसे जीवित नहीं रख पाएंगे। इसलिए प्रशिक्षण शिविर, स्थानीय मंच, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में लोककला अध्ययन तथा डिजिटल रिकॉर्डिंग जैसे प्रयास महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

तीजन बाई की सबसे बड़ी विरासत क्या है?
तीजन बाई की सबसे बड़ी विरासत केवल उनके पुरस्कार नहीं हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने पंडवानी को एक ऐसी मंचीय पहचान दी जिसमें लोकपरंपरा और आधुनिक प्रस्तुति का प्रभावी मेल दिखाई दिया।
उन्होंने यह साबित किया कि लोककला किसी संग्रहालय में रखी पुरानी वस्तु नहीं है। वह समय के साथ बदल सकती है, नए कलाकारों को स्वीकार कर सकती है और दुनिया के किसी भी मंच पर दर्शकों से संवाद कर सकती है।
उन्होंने महिलाओं के लिए भी एक रास्ता खोला। आज पंडवानी में अनेक महिला कलाकार सक्रिय हैं और इसकी परंपरा में महिलाओं की भागीदारी पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देती है।

अब जिम्मेदारी अगली पीढ़ी की
तीजन बाई का जीवन एक सवाल छोड़ता है—क्या हम लोककला को केवल तब याद करते हैं जब उसका कोई महान कलाकार हमारे बीच नहीं रहता?
पंडवानी को जीवित रखने का सबसे बेहतर तरीका यही होगा कि इसे केवल स्मृति या श्रद्धांजलि का विषय न बनाया जाए। इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए, कलाकारों को मंच मिले, लोकभाषाओं को सम्मान मिले और महाभारत की इन लोकगाथाओं को आधुनिक तकनीक के माध्यम से संरक्षित किया जाए।
पंडवानी की कहानी दरअसल एक लोककला की कहानी से कहीं बड़ी है। यह उस भारत की कहानी है जहां महाकाव्य केवल संस्कृत या पुस्तकों में नहीं रहा, बल्कि गांवों की चौपाल, लोकभाषा, गीत और कलाकार की आवाज के जरिए पीढ़ियों तक पहुंचता रहा।

जब आवाज मंच से आगे इतिहास बन जाती है
छत्तीसगढ़ की पंडवानी ने महाभारत को केवल सुनाया नहीं, उसे जिया है। कलाकार की आवाज में भीम की शक्ति, अर्जुन का संकल्प, द्रौपदी की पीड़ा और कृष्ण की नीति जैसे प्रसंगों को लोकजीवन ने अपनी भाषा में महसूस किया है।
कभी पुरुषों के वर्चस्व वाली मानी जाने वाली इस विधा में तीजन बाई का प्रवेश एक ऐतिहासिक मोड़ था। उन्होंने कापालिक शैली को अपनाकर उस सीमा को चुनौती दी, जिसे उनके समय में महिलाओं के लिए लगभग बंद माना जाता था। आगे चलकर उनकी आवाज ने पंडवानी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नई पहचान दी।
आज तीजन बाई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान किसी पुरस्कार, पदवी या मंच से नहीं, बल्कि उस आवाज से है जिसने एक लोकगाथा को दुनिया तक पहुंचाया। उनकी यात्रा यह बताती है कि लोककला तभी जीवित रहती है, जब कोई कलाकार परंपरा का सम्मान करते हुए उसमें अपने समय की नई ऊर्जा जोड़ता है।
पंडवानी इसलिए केवल छत्तीसगढ़ की लोकगाथा नहीं है। यह भारतीय सांस्कृतिक स्मृति की वह जीवित परंपरा है, जिसमें महाभारत आज भी किताब के पन्नों पर नहीं, बल्कि कलाकार की आवाज में सांस लेता है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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