बृह्माण्ड पुराण का रहस्य: सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई, जानिए लोक और सप्तद्वीपों का पूरा वर्णन

संवाद 24 डेस्क| भारतीय पुराण साहित्य में सृष्टि की उत्पत्ति का प्रश्न केवल यह जानने तक सीमित नहीं है कि पृथ्वी, आकाश या जीव-जंतु कब बने। यह प्रश्न इससे कहीं व्यापक है—संसार की शुरुआत कैसे हुई, ब्रह्माण्ड की रचना किस क्रम में हुई, देवताओं और प्रजापतियों का उद्भव कैसे हुआ, पृथ्वी का विस्तार कितना है और मनुष्य का स्थान इस विराट व्यवस्था में कहाँ है। बृह्माण्ड पुराण इसी व्यापक दृष्टि से सृष्टि, लोकों, पर्वतों, द्वीपों, समुद्रों और कालचक्र का वर्णन करता है। ग्रंथ के प्रक्रिया-पाद में सृष्टि-रचना, लोकविन्यास और पृथ्वी के विस्तार से जुड़े प्रसंग मिलते हैं।
बृह्माण्ड पुराण का यह वर्णन आधुनिक खगोल विज्ञान की तरह दूरबीनों, गणितीय मॉडलों या अंतरिक्ष-प्रेक्षणों पर आधारित वैज्ञानिक मानचित्र नहीं है। यह पुराणिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान है, जिसमें सृष्टि को दैवी शक्ति, प्रकृति, समय, कर्म और विभिन्न लोकों की एक क्रमबद्ध व्यवस्था के रूप में समझाया गया है। इसलिए इसके वर्णन को धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ में पढ़ना अधिक उचित है।

सृष्टि से पहले क्या था? जल, अंधकार और अव्यक्त अवस्था का वर्णन
बृह्माण्ड पुराण के सृष्टि-वर्णन में आरंभिक अवस्था को अत्यंत रहस्यमय रूप में प्रस्तुत किया गया है। एक प्रसंग में कहा गया है कि जब दृश्य संसार का प्रलय हो चुका था और स्थावर-जंगम प्राणी नष्ट हो गए थे, तब व्यापक जलराशि का वर्णन मिलता है। उस समय सामान्य रूप से पहचाना जा सकने वाला संसार अस्तित्व में नहीं था। इसी स्थिति में ब्रह्मा के प्रकट होने और आगे सृष्टि-रचना की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है।
यहाँ ‘जल’ को केवल आज के समुद्रों के समान भौतिक जल मानना आवश्यक नहीं है। पुराणिक सृष्टि-वर्णन में जल अक्सर उस आदिम, अव्यक्त और अनिर्धारित अवस्था का प्रतीक भी बनता है, जिसमें सृष्टि के स्थूल रूप अभी प्रकट नहीं हुए हैं। इस दृष्टि से सृष्टि की शुरुआत एक ऐसी अवस्था से होती है, जहाँ से क्रमशः नाम, रूप, तत्त्व और जीव-जगत का विस्तार होता है।

ब्रह्मा की भूमिका: सृष्टि-रचना का क्रम कैसे आगे बढ़ता है?
बृह्माण्ड पुराण में ब्रह्मा को सृष्टि-रचना से जुड़े प्रमुख देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सृष्टि के आरंभिक प्रसंगों में ब्रह्मा की उपस्थिति, उनके द्वारा लोकों और प्रजाओं की रचना तथा विभिन्न सर्गों का वर्णन मिलता है। यह प्रक्रिया एक ही क्षण में सब कुछ बन जाने की सरल कथा नहीं है, बल्कि अनेक चरणों में होने वाली रचना के रूप में प्रस्तुत की गई है।
पुराणिक परंपरा में सृष्टि के विभिन्न स्तरों का वर्णन मिलता है। इनमें प्राथमिक या तात्त्विक सृष्टि, देवताओं और ऋषियों की उत्पत्ति, जीव-जगत की रचना तथा आगे मनुष्यों और अन्य प्राणियों का विस्तार शामिल है। बृह्माण्ड पुराण के सृष्टि-वर्णन में भी इस प्रकार की बहुस्तरीय रचना का संकेत मिलता है।
इस वर्णन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सृष्टि केवल भौतिक पदार्थों का निर्माण नहीं है। इसमें चेतना, प्राणी, प्रकृति, काल और कर्म से जुड़े तत्व भी शामिल हैं। पुराणिक दृष्टि में संसार का निर्माण एक ऐसी व्यवस्था के रूप में होता है, जिसमें प्रत्येक प्राणी और प्रत्येक लोक का अपना स्थान है।

महत्, प्रकृति और तत्त्वों की भूमिका: क्या सृष्टि केवल मिट्टी और जल से बनी?
बृह्माण्ड पुराण के सृष्टि-वर्णन में प्रकृति और उसके तत्त्वों से जुड़े दार्शनिक विचार भी मिलते हैं। पुराणिक सांख्य-परंपरा में प्रकृति, महत्, अहंकार और पंचमहाभूत जैसे तत्त्वों को सृष्टि के क्रमिक विकास से जोड़ा जाता है। यह वर्णन आधुनिक रसायन विज्ञान या भौतिकी के तत्वों की सूची नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन की तत्त्वमीमांसा का हिस्सा है।
इस दृष्टि में सृष्टि का विकास अव्यक्त से व्यक्त की ओर होता है। पहले सूक्ष्म और तात्त्विक स्तरों का वर्णन आता है, फिर स्थूल जगत, प्राणी और विभिन्न लोकों की रचना का क्रम बताया जाता है। यही कारण है कि पुराणों में सृष्टि-वर्णन को केवल पृथ्वी की उत्पत्ति की कथा नहीं, बल्कि समूचे अस्तित्व की रचना का विवेचन माना जाता है।

सृष्टि की रचना के बाद क्या हुआ? लोकों और पर्वतों का विभाजन
बृह्माण्ड पुराण के अनुसार सृष्टि-रचना के क्रम में लोकों, समुद्रों और पर्वतों का विभाजन किया गया। एक प्रसंग में विश्वकर्मा द्वारा लोकों, समुद्रों और पर्वतों को व्यवस्थित करने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद सात द्वीपों, समुद्रों और पर्वतों से युक्त पृथ्वी की रचना का वर्णन आता है।
यहाँ ‘विभाजन’ का अर्थ आधुनिक भूगोल की तरह महाद्वीपों की वैज्ञानिक खोज नहीं है। यह पुराणिक विश्व-रचना में पृथ्वी और उसके आसपास के क्षेत्रों को एक क्रमबद्ध रूप देने की कल्पना है। इस व्यवस्था में भूमि, जल, पर्वत, लोक और जीव-जगत एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

सात लोकों की ऊर्ध्व व्यवस्था: पृथ्वी से सत्यलोक तक
बृह्माण्ड पुराण में ब्रह्माण्ड की ऊर्ध्व संरचना का वर्णन भी मिलता है। पुराणिक परंपरा में सात ऊर्ध्व लोकों का उल्लेख किया जाता है—भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक। इन्हें सृष्टि के विभिन्न स्तरों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
भूलोक को मनुष्यों और स्थूल जगत के निवास से जोड़ा जाता है। इसके ऊपर भुवर्लोक और स्वर्लोक का वर्णन आता है। आगे महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक स्थित माने गए हैं। पुराणिक दृष्टि में इन लोकों का संबंध केवल ऊँचाई से नहीं, बल्कि विभिन्न प्रकार के अस्तित्व, तप, ज्ञान और दिव्य जीवन से भी जोड़ा जाता है।
इन लोकों का वर्णन यह दर्शाता है कि पुराणिक ब्रह्माण्ड-विचार में संसार को एक ही स्तर पर सीमित नहीं माना गया। इसके विपरीत, सृष्टि को अनेक लोकों और अस्तित्व के विभिन्न आयामों से युक्त माना गया है।

सात पाताल लोक: ब्रह्माण्ड की अधोमुखी संरचना
ऊर्ध्व लोकों के साथ-साथ पुराणिक साहित्य में सात पातालों का भी वर्णन मिलता है। इनके नाम हैं—अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। बृह्माण्ड पुराण की लोक-रचना परंपरा में इन अधोलोकों का उल्लेख मिलता है।
पातालों का वर्णन यह संकेत देता है कि पुराणिक ब्रह्माण्ड-विचार केवल आकाश या ऊपर की दिशा तक सीमित नहीं है। इसमें ऊपर और नीचे, दोनों दिशाओं में विस्तृत लोकों की कल्पना की गई है। इस प्रकार ब्रह्माण्ड को एक बहुस्तरीय व्यवस्था के रूप में देखा गया है, जिसमें विभिन्न लोकों का अपना-अपना स्थान और स्वरूप है।

पृथ्वी के केंद्र में जम्बूद्वीप: सात द्वीपों की शुरुआत
बृह्माण्ड पुराण में पृथ्वी के विस्तार का वर्णन सप्तद्वीप के माध्यम से किया गया है। पुराणिक भूगोल में जम्बूद्वीप को केंद्रीय द्वीप माना गया है। इसके चारों ओर अन्य द्वीप और समुद्र क्रमशः स्थित बताए गए हैं।
सात द्वीपों के नाम हैं—जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप। इन द्वीपों को एक-दूसरे के चारों ओर स्थित भू-भागों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पुराणिक भूगोल पर प्रकाशित अध्ययनों में यह भी बताया गया है कि ‘द्वीप’ शब्द का अर्थ हमेशा आधुनिक अर्थ में छोटे समुद्री द्वीप से नहीं लिया जाना चाहिए। यह बड़े भू-भाग या जल से विभाजित क्षेत्र के लिए भी प्रयुक्त हो सकता है। इसलिए सप्तद्वीपों को आधुनिक विश्व मानचित्र के सात महाद्वीपों के साथ सीधे-सीधे समान मानना उचित नहीं होगा।

जम्बूद्वीप और मेरु पर्वत: पुराणिक विश्व-रचना का केंद्र
जम्बूद्वीप के भीतर मेरु पर्वत का वर्णन मिलता है। पुराणिक ब्रह्माण्ड-विचार में मेरु को केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि ब्रह्माण्डीय केंद्र या अक्ष के रूप में भी समझा जाता है। इसके आसपास विभिन्न वर्ष, पर्वत और नदियों का वर्णन किया गया है।
जम्बूद्वीप के भीतर भारतवर्ष का उल्लेख भी मिलता है। पुराणिक संदर्भ में भारतवर्ष केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि कर्म, धर्म और आध्यात्मिक साधना से जुड़ा महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। इसीलिए पुराणिक भूगोल में भारतवर्ष को विशेष स्थान दिया गया है।

सात समुद्रों का वर्णन: क्या ये केवल जलराशियाँ हैं?
बृह्माण्ड पुराण की सप्तद्वीप व्यवस्था में सात समुद्रों का उल्लेख मिलता है। इन समुद्रों के नाम और उनके द्रव्य का वर्णन पुराणिक भूगोल की प्रमुख विशेषता है। सामान्यतः यह क्रम इस प्रकार बताया जाता है—लवण समुद्र, इक्षुरस समुद्र, सुरा समुद्र, सर्पि समुद्र, दधि समुद्र, दुग्ध समुद्र और जल समुद्र।
इन समुद्रों का वर्णन आधुनिक समुद्रों की भौतिक संरचना से अलग है। पुराणिक भूगोल में प्रत्येक समुद्र को एक विशिष्ट द्रव्य से जोड़ा गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य सृष्टि के विभिन्न क्षेत्रों को एक क्रमबद्ध ब्रह्माण्डीय रूप में प्रस्तुत करना है।

लवण से दुग्ध तक: सात समुद्रों का क्रम क्या है?
पुराणिक वर्णन के अनुसार जम्बूद्वीप के चारों ओर लवण समुद्र स्थित है। इसके बाद प्लक्षद्वीप और इक्षुरस समुद्र का क्रम आता है। आगे शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप के साथ क्रमशः अन्य समुद्रों का वर्णन किया गया है।
सात समुद्रों का सामान्य क्रम इस प्रकार समझा जा सकता है—
क्रम
समुद्र
पुराणिक वर्णन

1
लवण समुद्र
नमकीन जल
2
इक्षुरस समुद्र
गन्ने का रस
3
सुरा समुद्र
सुरा या मदिरा
4
सर्पि समुद्र
घी
5
दधि समुद्र
दही
6
दुग्ध समुद्र
दूध
7
जल समुद्र
शुद्ध या मीठा जल
यह क्रम पुराणिक भूगोल की सामान्य परंपरा में मिलता है। हालांकि, विभिन्न पुराणों में कुछ नामों, क्रमों और विवरणों में अंतर पाया जा सकता है। इसलिए किसी एक सूची को सभी पुराणों का बिल्कुल समान और अंतिम विवरण मानना उचित नहीं होगा।

क्या सात द्वीप और सात समुद्र एक-दूसरे के चारों ओर हैं?
पुराणिक भूगोल में सात द्वीपों और सात समुद्रों को एक-दूसरे के चारों ओर क्रमशः स्थित बताया गया है। इस व्यवस्था में प्रत्येक द्वीप के बाद एक समुद्र और फिर अगला द्वीप आता है। इस प्रकार पृथ्वी का विस्तार एक केंद्र से बाहर की ओर बढ़ती हुई संरचना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह आधुनिक पृथ्वी का वैज्ञानिक मानचित्र नहीं है। पुराणिक भूगोल में द्वीपों और समुद्रों का वर्णन धार्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से किया गया है। इसे आधुनिक महाद्वीपों और महासागरों के साथ सीधे जोड़ना ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से सावधानी की मांग करता है।

लोकालोक पर्वत: प्रकाश और अंधकार की सीमा
सप्तद्वीपों और समुद्रों के बाहर लोकालोक पर्वत का वर्णन मिलता है। यह पर्वत पुराणिक ब्रह्माण्ड की बाहरी सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण तत्वों में से एक है। इसके नाम में ही ‘लोक’ और ‘अलोक’ अर्थात प्रकाशयुक्त संसार और प्रकाश से परे क्षेत्र का संकेत मिलता है।
पुराणिक वर्णन में लोकालोक पर्वत को प्रकाश और अंधकार के बीच सीमा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह व्यवस्था ब्रह्माण्ड के ज्ञात और अज्ञात, प्रकाश और अंधकार तथा संसार और उसके बाहरी क्षेत्र के बीच एक प्रतीकात्मक सीमा का संकेत देती है।
यहाँ भी यह समझना आवश्यक है कि लोकालोक पर्वत को आधुनिक खगोल विज्ञान के किसी वास्तविक पर्वत या ग्रह-सीमा के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह पुराणिक ब्रह्माण्ड की धार्मिक और दार्शनिक संरचना का हिस्सा है।

ब्रह्माण्ड के बाहरी आवरण: क्या सृष्टि की भी कोई सीमा है?
पुराणिक ब्रह्माण्ड-विचार में ब्रह्माण्ड को एक सीमित संरचना के भीतर स्थित माना गया है। इसके चारों ओर विभिन्न आवरणों का वर्णन मिलता है। इन आवरणों का संबंध प्रकृति, महत् और अन्य दार्शनिक तत्त्वों से जोड़ा जाता है।
यह वर्णन केवल भौतिक सीमा का नहीं, बल्कि सृष्टि के मूल तत्त्वों और उनके क्रमिक विस्तार का भी संकेत देता है। पुराणिक दृष्टि में ब्रह्माण्ड केवल पृथ्वी, आकाश और समुद्रों का समूह नहीं, बल्कि प्रकृति, चेतना, समय और जीवों से जुड़ी एक व्यापक व्यवस्था है।

क्या बृह्माण्ड पुराण का ब्रह्माण्ड आधुनिक विज्ञान से मेल खाता है?
बृह्माण्ड पुराण में वर्णित लोक, द्वीप और समुद्र भारतीय धार्मिक साहित्य की एक विशिष्ट ब्रह्माण्डीय परंपरा का हिस्सा हैं। आधुनिक विज्ञान में ब्रह्माण्ड का अध्ययन खगोल भौतिकी, गणित, प्रेक्षण और वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर किया जाता है। इसलिए दोनों को एक ही प्रकार का वैज्ञानिक मॉडल मानना उचित नहीं होगा।
हालांकि, पुराणिक वर्णन यह अवश्य दर्शाते हैं कि प्राचीन भारतीय चिंतन में ब्रह्माण्ड को व्यापक, बहुस्तरीय और क्रमबद्ध व्यवस्था के रूप में समझने की परंपरा थी। लोकों, द्वीपों, समुद्रों और बाहरी आवरणों का वर्णन इस चिंतन की जटिलता को सामने लाता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि सभी पुराणों में ब्रह्माण्ड की संरचना एक जैसी नहीं है। विभिन्न ग्रंथों में द्वीपों के क्रम, समुद्रों के नाम और कुछ मापों में अंतर मिलता है। इसलिए किसी एक पुराण के वर्णन को पूरे पुराणिक साहित्य का एकमात्र और अंतिम वैज्ञानिक मानचित्र मानना उचित नहीं होगा।

बृह्माण्ड पुराण का सृष्टि-वर्णन क्या बताता है?
बृह्माण्ड पुराण में सृष्टि की उत्पत्ति को एक व्यापक और बहुस्तरीय प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आरंभिक जलराशि और अव्यक्त अवस्था से लेकर ब्रह्मा की सृष्टि-रचना, लोकों का विभाजन, सप्तद्वीपों और सात समुद्रों की व्यवस्था तथा लोकालोक पर्वत तक, यह वर्णन पुराणिक ब्रह्माण्ड-विचार की प्रमुख विशेषताओं को सामने लाता है।
इस वर्णन का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि इसमें ब्रह्माण्ड का एक विशिष्ट रूप प्रस्तुत किया गया है, बल्कि इस बात में भी है कि यह भारतीय धार्मिक साहित्य में सृष्टि को समझने की एक व्यापक दृष्टि को सामने लाता है। बृह्माण्ड पुराण का ब्रह्माण्ड-वर्णन हमें यह समझने का अवसर देता है कि प्राचीन भारतीय चिंतन में संसार को केवल मनुष्य के निवास-स्थान के रूप में नहीं, बल्कि एक विराट और बहुस्तरीय सृष्टि के रूप में देखा गया था।

Geeta Singh
Geeta Singh

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