
संवाद 24 नई दिल्ली। देश भर में प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और नीट (NEET) पेपर लीक विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार अपनी चुप्पी तोड़ दी है। पद छोड़ने के कई दिनों बाद दिए गए अपने एक विस्तृत बयान में उन्होंने स्पष्ट किया है कि उन्होंने इस्तीफा किन परिस्थितियों में और क्यों दिया। धर्मेंद्र प्रधान ने साफ तौर पर कहा कि उनका फैसला किसी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या दबाव का परिणाम नहीं था, बल्कि राष्ट्रहित और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से लिया गया एक नैतिक निर्णय था।
“जनरेशन जी (Gen Z) हमारे अपने बच्चे हैं”: युवाओं को गुमराह करने का आरोप
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने ताजा वक्तव्य में देश की युवा पीढ़ी और छात्रों का जिक्र करते हुए कहा, “जनरेशन जी (Gen Z) हमारे ही बच्चे हैं। उनके मन में जो असंतोष या गुस्सा था, वह स्वाभाविक था, लेकिन कुछ असामाजिक और देशविरोधी तत्वों ने इस पूरे घटनाक्रम का फायदा उठाकर देश के युवाओं को गुमराह करने की साजिश रची।” उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे छात्र आंदोलनों को कुछ ताकतें अपने राजनीतिक लाभ के लिए भड़काने का काम कर रही थीं। पूर्व शिक्षा मंत्री के अनुसार, जब उन्हें यह आभास हुआ कि देश का युवा भ्रम के जाल में उलझ सकता है और असामाजिक तत्व छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर राष्ट्र की अखंडता को नुकसान पहुंचा सकते हैं, तब उन्होंने पद छोड़ने का मन बना लिया।
“किसी एक छात्र का भविष्य कानूनी दांव-पेच में न फंसे”
इस्तीफे के पीछे का मुख्य कारण बताते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसे मामलों में छात्र जब सड़कों पर उतरते हैं, तो पुलिसिया कार्रवाई या कानूनी पचड़ों के कारण उनका करियर बर्बाद होने का खतरा बना रहता है। उन्होंने स्पष्ट किया, “मेरा हमेशा से यह प्रयास रहा कि देश के किसी भी मेधावी छात्र का नुकसान न हो। परीक्षा माफिया और धांधली में शामिल अपराधियों के खिलाफ सख्त से सख्त कदम उठाए जाने चाहिए, लेकिन आंदोलन में शामिल किसी भी निर्दोष छात्र का भविष्य कानूनी उलझनों में न फंसे, इसलिए मैंने खुद पद त्यागकर स्थिति को शांत करने का रास्ता चुना।”
जंतर-मंतर पर एक महीने तक चला था भारी विरोध-प्रदर्शन
उल्लेखनीय है कि देश में नीट-यूजी परीक्षा और अन्य राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में हुई कथित अनियमितताओं को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों और युवा संगठनों द्वारा एक महीने से अधिक समय तक तीव्र विरोध-प्रदर्शन किया गया था। इस दौरान छात्र संगठनों और विपक्षी दलों की प्रमुख मांग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की ही थी। जब सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत गतिरोध में फंसी हुई थी, तब धर्मेंद्र प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंपा था। उनके इस्तीफे के तुरंत बाद ही केंद्र सरकार और छात्र संगठनों के बीच बातचीत का रास्ता साफ हुआ और कई मांगों पर सहमति बनने के बाद प्रदर्शन खत्म हुआ था।
छात्र राजनीति से केंद्रीय मंत्री पद तक का सफर
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे के बाद अपनी जड़ों को याद करते हुए कहा कि वे खुद छात्र राजनीति की उपज हैं। उन्होंने 1990 के दशक में भुवनेश्वर की सड़कों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के छात्र नेता के रूप में परीक्षा धांधली और छात्रों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी थी।
उन्होंने कहा, “मैं छात्रों की संवेदनाओं और उनकी मांगों की गहराई को समझता हूं। चार दशकों से अधिक समय तक मैंने छात्रों, शिक्षकों और शिक्षा सुधारों के लिए काम किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में देश की शिक्षा नीति में ऐतिहासिक बदलाव लाने का अवसर मिलना मेरे लिए गर्व की बात रही है।”
सरकार की प्रतिबद्धता: परीक्षा प्रणाली में बड़े सुधार जारी रहेंगे
अपने बयान के अंत में उन्होंने भरोसा जताया कि केंद्र सरकार देश की परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी, सुरक्षित और तकनीक-आधारित बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। परीक्षा में किसी भी स्तर पर होने वाली सेंधमारी को रोकने के लिए उच्चस्तरीय कार्यबल का गठन किया गया है जो व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाएगा। धर्मेंद्र प्रधान के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि उनका यह फैसला न केवल युवाओं के प्रति उनकी जवाबदेही को दर्शाता है, बल्कि एक जिम्मेदार राजनेता के रूप में आंदोलन को समाप्त कराने और स्थिति को नियंत्रण में लाने का एक रणनीतिक कदम भी था।






