किताबों की जगह सन्नाटा और चौखटों पर ताले: बंगाल में 933 सरकारी स्कूल बंद

संवाद 24 पश्चिम बंगाल। स्कूली शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक चौंकाने वाला और चिंताजनक सच सामने आया है। राज्य के सरकारी सहायता प्राप्त 933 स्कूलों में छात्रों की संख्या घटकर ‘शून्य’ हो जाने के बाद अंततः उनके गेट पर ताले लटका दिए गए हैं। प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के इन विद्यालयों में एक भी बच्चे का दाखिला न होने के कारण यह कठोर प्रशासनिक निर्णय लेना पड़ा है। सालों से वीरान पड़े इन परिसरों में अब घंटी की आवाज नहीं गूंजती, जिसके बाद ममता बनर्जी सरकार ने इनके भौतिक सत्यापन (Physical Verification) और पुनरुद्धार की व्यापक कवायद तेज कर दी है।

20 वर्षों से जारी था संकट, पिछले 5 सालों में और बिगड़े हालात
राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए बताया कि छात्रों के न आने की यह समस्या अचानक नहीं उपजी है। बीते करीब दो दशकों से कई क्षेत्रों के स्कूलों में छात्र संख्या लगातार घट रही थी, लेकिन पिछले पांच वर्षों में यह संकट बेहद गहरा गया। कई ऐसे स्कूल रहे जहां शिक्षक और बुनियादी ढांचा तो उपलब्ध था, परंतु कक्षाओं में बैठने के लिए एक भी विद्यार्थी नहीं था। सरकार अब इन बंद पड़े 933 स्कूलों में तैनात रहे शिक्षकों और कर्मचारियों की वास्तविक स्थिति का भी गहन मूल्यांकन कर रही है। शिक्षा विभाग की योजना के तहत शिक्षक स्थानांतरण नीति के जरिए इन अध्यापकों को उन स्कूलों में समायोजित किया जा रहा है, जहां शिक्षकों की भारी कमी है। इससे उन चालू विद्यालयों की पढ़ाई सुचारू हो सकेगी जो स्टाफ के अभाव से जूझ रहे हैं।

जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में विशेष समितियों का गठन
स्कूल शिक्षा विभाग ने 16 सितंबर को एक आधिकारिक निर्देश जारी करते हुए सभी जिलाधिकारियों (DM) को जांच और मूल्यांकन का जिम्मा सौंपा है। जिलाधिकारियों की अगुवाई में गठित इन विशेष जांच समितियों में जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) और जिला विद्यालय निरीक्षक (DI of Schools) को महत्वपूर्ण सदस्य बनाया गया है। यह समिति प्रत्येक शून्य नामांकन वाले स्कूल का मौके पर जाकर भौतिक निरीक्षण करेगी। समिति स्कूल भवनों की वर्तमान हालत, कक्षाओं की मजबूती, खेल के मैदानों, संबंधित जमीन की स्थिति, संपत्ति के मालिकाना हक, पानी-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं और मार्ग की सुगमता का विस्तृत खाका तैयार करेगी। साथ ही, यह रिपोर्ट भी बनेगी कि कौन-सा ढांचा पूरी तरह अनुपयोगी हो चुका है और किसे मरम्मत के बाद तुरंत काम में लाया जा सकता है।

क्या स्कूल फिर खुलेंगे या बदलेगा इस्तेमाल का स्वरूप?
राज्य सरकार ने जिला प्रशासनों को 30 दिनों के भीतर अपनी समग्र रिपोर्ट और सिफारिशें सौंपने की सख्त समय-सीमा तय की है। सरकार मुख्य रूप से दोहरे विकल्प पर काम कर रही है:
पुनर्जीवन की गुंजाइश: जिन क्षेत्रों में जनसांख्यिकी या स्थानीय परिस्थितियों में सुधार की संभावना है, वहां स्कूलों का पुनर्गठन कर उन्हें दोबारा शुरू करने की व्यवहार्यता जांची जाएगी। समितियों को यह कड़ा निर्देश दिया गया है कि किसी भी हाल में ग्रामीण अथवा पिछड़े वर्ग के बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित न होना पड़े।
वैकल्पिक जनोपयोगी उपयोग: यदि किसी स्कूल को पुनः चलाना संभव नहीं पाया जाता है, तो जनता के पैसे से खड़े किए गए उन बड़े परिसरों और जमीनों को व्यर्थ नहीं जाने दिया जाएगा। उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), उप-स्वास्थ्य केंद्र, कौशल विकास व प्रशिक्षण केंद्र, कृषि एवं ग्रामीण विकास विस्तार केंद्र, अथवा पंचायत और सामुदायिक भवनों के रूप में परिवर्तित करने पर विचार किया जा रहा है। शिक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया है कि इन संपत्तियों को किसी निजी हाथों में नहीं सौंपा जाएगा, बल्कि इन्हें अन्य सरकारी विभागों को हस्तांतरित कर विशुद्ध रूप से जनहितैषी सेवाओं के लिए उपयोग में लाया जाएगा।
बंगाल के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में खाली पड़े इन विशाल भवनों का भविष्य अब आगामी एक महीने में आने वाली जिला समितियों की रिपोर्ट पर टिका हुआ है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *