ईरान की मदद करने पर भारत और तुर्किए की कंपनियों पर अमेरिका का बड़ा प्रहार

संवाद 24 नई दिल्ली। भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पन्नों पर प्रतिबंधों का दौर एक बार फिर बेहद आक्रामक रूप में लौट आया है। ईरान के खिलाफ अमेरिका द्वारा छेड़े गए आर्थिक शिकंजे के दायरे में अब भारत और तुर्किए की कंपनियां भी आ गई हैं। अमेरिकी वित्त मंत्रालय (US Department of the Treasury) ने एक व्यापक जांच के बाद भारत और तुर्किए के कई कारोबारियों और कॉर्पोरेट संस्थाओं पर बेहद कड़े आर्थिक प्रतिबंध थोप दिए हैं। वाशिंगटन का सीधा आरोप है कि यह नेटवर्क फर्जी समुद्री पहचान और कागजी खेल के जरिए ईरान के ‘शैडो फ्लीट’ (Shadow Fleet) को प्रतिबंधित तेल बेचने और प्रतिबंधों से बचने में गुप्त मदद मुहैया करा रहा था।

​चंडीगढ़ से जुड़ा ‘फर्जी फ्लैग’ नेटवर्क
​अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के आधिकारिक बयानों के मुताबिक, इस कार्रवाई के केंद्र में भारत के चंडीगढ़ में सक्रिय एक बड़ा सिंडिकेट चिन्हित किया गया है। भारतीय कारोबारी सुनील कुमार शर्मा और उनकी पत्नी जसप्रीत प्रीति शाहिद पर आरोप है कि उन्होंने कई ऐसी फर्जी संस्थाएं और वेबसाइटें तैयार की थीं, जो खुद को विदेशी सरकारों के समुद्री प्राधिकरण (Maritime Authorities) के रूप में पेश करती थीं। ​अमेरिकी जांच एजेंसियों का दावा है कि इस नेटवर्क ने गुयाना, इस्वातिनी और लाओस जैसे देशों के फर्जी प्रतिनिधि बनकर प्रतिबंधित जहाजों को समुद्री लाइसेंस, फर्जी झंडे और झूठे सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी किए। इन फर्जी दस्तावेजों के सहारे ईरानी सैन्य प्रतिष्ठानों और सरकारी एजेंसियों से जुड़े तेल टैंकर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सुरक्षा जांचों से बचकर बेखौफ घूम रहे थे। ​इस नेटवर्क से जुड़े दो अन्य भारतीय नागरिकों – अश्विनी कुमार धीमान और इशविंदर सिंह – के अलावा सुनील कुमार शर्मा से संबद्ध 9 व्यावसायिक कंपनियों को भी प्रतिबंध सूची (OFAC Blocklist) में डाला गया है।

​तुर्किए की एविएशन फर्म भी लपेटे में
​कार्रवाई सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि आसमान में भी इसका दायरा दिखा। अमेरिका ने तुर्किए की प्रमुख ग्राउंड सर्विसेज फर्म ‘फुगो ग्राउंड सर्विसेज इंक’ (Fugo Ground Services Inc.) पर भी कड़ा एक्शन लिया है। आरोप है कि यह तुर्की कंपनी ईरान की ब्लैकलिस्टेड विमानन कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के दौरान ग्राउंड हैंडलिंग, ईंधन और लॉजिस्टिक सुविधाएं मुहैया करा रही थी।
​अमेरिकी अधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि ईरान पर लगे प्रतिबंध तब तक प्रभावी नहीं हो सकते, जब तक कि उसे परोक्ष रूप से जीवनदान देने वाले लॉजिस्टिक साझेदारों पर नकेल न कसी जाए।

​’ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’: या तो हमारे साथ, या खिलाफ
​अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट (Scott Bessent) ने इस कार्रवाई को वाशिंगटन के बहुचर्चित ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ का अहम पड़ाव करार दिया। उन्होंने सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा कि जो कोई भी जमीन, समुद्र या हवाई मार्ग से ईरानी शासन की आर्थिक मदद करेगा, उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। ​ट्रेजरी प्रमुख के मुताबिक, ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने और उसके तेल राजस्व के स्रोतों को पूरी तरह काटने के लिए यह अभियान चलाया जा रहा है। प्रतिबंधों के तहत, इन तमाम व्यक्तियों और फर्मों की अमेरिकी क्षेत्राधिकार में मौजूद संपत्तियों को फ्रीज कर दिया गया है। साथ ही, किसी भी अमेरिकी नागरिक या अंतरराष्ट्रीय बैंक को इन संस्थाओं के साथ लेन-देन करने पर कानूनी रोक लगा दी गई है। 50 फीसदी या उससे अधिक हिस्सेदारी वाली सहायक कंपनियां भी स्वतः ही इस प्रतिबंध के दायरे में आ गई हैं।

​भारत-अमेरिका व्यापार और कूटनीतिक असर
​यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच द्विपक्षीय व्यापार और सामरिक संबंध मजबूत हो रहे हैं। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने साफ किया है कि यह कार्रवाई भारत सरकार या उसके आधिकारिक तंत्र के खिलाफ नहीं, बल्कि अवैध समुद्री नेटवर्क चलाने वाले निजी सिंडिकेट के खिलाफ है। ​फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय कंपनियों के नाम इस तरह की उच्च-स्तरीय अमेरिकी प्रतिबंध सूची में आने से समुद्री शिपिंग, इंश्योरेंस और अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों पर भारतीय कार्गो ऑपरेशंस की जांच और सख्त हो सकती है। वैश्विक शक्तियों की इस आर्थिक जंग में अब निजी कारोबारी और फर्जी समुद्री नेटवर्क सीधे रडार पर आ चुके हैं।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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