नवरात्रि का छठा दिन आज, मां कात्यायनी को क्यों चढ़ाया जाता है शहद? जानिए पूजा विधि, मंत्र, भोग और पौराणिक कथा

संवाद 24 डेस्क। शारदीय नवरात्रि का छठा दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की आराधना को समर्पित है। वर्ष 2026 में यह दिन शुक्रवार, 16 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी शक्ति, साहस, धर्म की रक्षा और अन्याय पर विजय की प्रतीक हैं। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर भक्त विधि-विधान से देवी की पूजा करते हैं और सुख-समृद्धि, पारिवारिक सुख तथा जीवन की बाधाओं से मुक्ति की कामना करते हैं। मां कात्यायनी की पूजा विवाह संबंधी मनोकामनाओं के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है। आइए जानते हैं नवरात्रि के छठे दिन का धार्मिक महत्व, मां कात्यायनी की पौराणिक कथा, पूजा विधि, मंत्र, प्रिय भोग और पूजा के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें।

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा क्यों होती है?
नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है। इन नौ स्वरूपों में छठा स्वरूप मां कात्यायनी का है। देवी के इस स्वरूप को शक्ति, पराक्रम और दुष्ट शक्तियों के विनाश से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक परंपरा में मां कात्यायनी को ऐसी देवी माना गया है, जो अपने भक्तों को साहस प्रदान करती हैं और उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा देती हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब संसार में दानवों का अत्याचार बढ़ने लगा और देवता संकट में पड़ गए, तब दैवी शक्ति ने दुष्ट शक्तियों के विनाश के लिए युद्ध रूप धारण किया। मां कात्यायनी इसी दिव्य शक्ति का प्रभावशाली स्वरूप मानी जाती हैं। उनका पूजन भक्तों को यह संदेश देता है कि अन्याय के सामने झुकने के बजाय सत्य, धर्म और साहस का साथ देना चाहिए।
नवरात्रि के छठे दिन श्रद्धालु अपने घरों और मंदिरों में देवी की पूजा करते हैं। कई स्थानों पर विशेष पूजन, भजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ और आरती का आयोजन किया जाता है। हालांकि पूजा की विधि और कुछ परंपराएं क्षेत्र, परिवार तथा स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।

कब है मां कात्यायनी की पूजा? जानें तिथि और शुभ रंग
वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि का छठा दिन 16 अक्टूबर, शुक्रवार को है। इस दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के अवसर पर मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। पंचांग के अनुसार, तिथि का समय सूर्योदय और स्थानीय गणना के आधार पर पूजा की योजना बनाने में महत्वपूर्ण होता है। इसलिए किसी विशेष मुहूर्त में पूजा करने वाले श्रद्धालुओं को अपने शहर के पंचांग के अनुसार समय देखना चाहिए।
नवरात्रि के छठे दिन के लिए हरा रंग विशेष रूप से प्रचलित है। हरे रंग को प्रकृति, नई ऊर्जा, विकास और जीवन में सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। इस दिन कई श्रद्धालु हरे रंग के वस्त्र धारण करते हैं या पूजा स्थल को हरे रंग के फूलों और सजावटी सामग्री से सजाते हैं। हालांकि, देवी की पूजा में किसी विशेष रंग के वस्त्र पहनना अनिवार्य नहीं है। श्रद्धा, स्वच्छता और मन की एकाग्रता को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

कौन हैं मां कात्यायनी? जानें देवी के स्वरूप का रहस्य
मां कात्यायनी का नाम महर्षि कात्यायन से जुड़ा हुआ है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने देवी भगवती की कठोर तपस्या की थी और उनसे प्रार्थना की थी कि वे उनकी पुत्री के रूप में जन्म लें। देवी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उनके यहां प्रकट हुईं। इसी कारण उनका नाम कात्यायनी पड़ा।
मां कात्यायनी का स्वरूप तेजस्वी, प्रभावशाली और शौर्य से परिपूर्ण बताया गया है। उन्हें सामान्यतः चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उनके हाथों में अस्त्र और कमल जैसे प्रतीक दिखाई देते हैं तथा उनका वाहन सिंह माना जाता है। सिंह शक्ति, निर्भीकता और सामर्थ्य का प्रतीक है। देवी का यह स्वरूप बताता है कि शक्ति का उपयोग धर्म की रक्षा और अन्याय के प्रतिरोध के लिए किया जाना चाहिए।
धार्मिक मान्यताओं में मां कात्यायनी को भक्तों की रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। उनकी आराधना का उद्देश्य केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि मन में साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प का विकास करना भी माना जाता है।

मां कात्यायनी की पौराणिक कथा: महिषासुर के अत्याचार से कैसे मिला मुक्ति का मार्ग?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में महिषासुर नामक असुर ने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं और ऋषियों को परेशान करना शुरू कर दिया था। उसके अत्याचारों से तीनों लोकों में भय का वातावरण बन गया। देवता उसके आतंक से मुक्ति पाने के लिए चिंतित हुए और उन्होंने दैवी शक्ति की आराधना की। इसके बाद देवी के दिव्य स्वरूप का प्राकट्य हुआ, जिन्हें महिषासुर का अंत करने वाली शक्ति के रूप में जाना जाता है।
देवी से जुड़ी परंपराओं में महर्षि कात्यायन का नाम विशेष रूप से आता है। मान्यता है कि उनके आश्रम में देवी ने प्रकट होकर महिषासुर के विरुद्ध युद्ध किया। लंबे संघर्ष के बाद देवी ने महिषासुर का वध किया और संसार को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया। इसी कारण मां कात्यायनी को दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाली और धर्म की रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।
यह कथा केवल एक पौराणिक युद्ध का वर्णन नहीं करती, बल्कि इसके भीतर एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी छिपा है। महिषासुर को अहंकार, अन्याय और नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतीक माना जा सकता है, जबकि देवी की शक्ति सत्य, साहस और धर्म का प्रतिनिधित्व करती है। नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना करते समय भक्त अपने भीतर मौजूद भय, क्रोध, अहंकार और कमजोरियों पर विजय पाने का संकल्प भी ले सकते हैं।

मां कात्यायनी की पूजा विधि: सुबह से आरती तक अपनाएं ये परंपराएं
नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा घर पर भी श्रद्धापूर्वक की जा सकती है। पूजा के लिए विशेष आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। स्वच्छता, श्रद्धा और एकाग्रता को प्रमुख माना जाता है। भक्त अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा की विधि अपना सकते हैं।
सबसे पहले सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की सफाई करें और वहां मां दुर्गा या मां कात्यायनी की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें। यदि नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की गई है, तो उसकी नियमित पूजा भी करें। इसके बाद दीपक जलाकर देवी का ध्यान करें और पूजा का संकल्प लें।
मां कात्यायनी को पुष्प अर्पित करें। परंपरा के अनुसार, लाल या पीले फूल चढ़ाए जा सकते हैं। इसके बाद रोली, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। देवी को शहद का भोग लगाने की विशेष परंपरा है। पूजा के दौरान मां कात्यायनी के मंत्र का जाप करें और श्रद्धानुसार दुर्गा सप्तशती अथवा दुर्गा स्तुति का पाठ करें।
पूजा के अंत में मां की आरती करें और परिवार की सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना करें। यदि संभव हो, तो जरूरतमंद लोगों को भोजन या अन्य आवश्यक सामग्री दान करें। धार्मिक दृष्टि से सेवा, दया और परोपकार को भी पूजा का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है।
ध्यान रखें कि पूजा के सभी चरण प्रत्येक परिवार में एक समान नहीं होते। यदि किसी सामग्री की व्यवस्था न हो, तो पूजा को लेकर चिंता करने के बजाय उपलब्ध सामग्री से श्रद्धापूर्वक आराधना की जा सकती है।

मां कात्यायनी के शक्तिशाली मंत्र, जिनका किया जाता है जाप
मां कात्यायनी की उपासना में उनके सरल नाम मंत्र और ध्यान मंत्र का पाठ किया जाता है। मंत्रों का जाप करते समय उच्चारण को यथासंभव शुद्ध रखने और मन को एकाग्र करने का प्रयास करना चाहिए।
मां कात्यायनी का नाम मंत्र:
“ॐ देवी कात्यायन्यै नमः।
इस मंत्र का अर्थ है कि महर्षि कात्यायन की पुत्री तथा देवी कात्यायनी के दिव्य स्वरूप को नमन है। श्रद्धालु पूजा के समय अपनी सुविधानुसार 11, 21 या 108 बार मंत्र का जाप कर सकते हैं।
मां कात्यायनी का ध्यान मंत्र:
“चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

इस मंत्र में मां के तेजस्वी स्वरूप, उनके सिंह वाहन और दानवों का संहार करने वाली शक्ति का वर्णन है। भक्त इस मंत्र के माध्यम से देवी का ध्यान करते हुए अपने जीवन में शुभता और साहस की कामना करते हैं।
मंत्र जाप के दौरान किसी निश्चित संख्या को लेकर अनावश्यक दबाव नहीं लेना चाहिए। अपनी श्रद्धा और समय के अनुसार शांत मन से जाप करना भी उपासना का एक सरल तरीका है।

मां कात्यायनी को क्या भोग लगाएं? शहद का है विशेष महत्व
नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी को शहद अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है। धार्मिक मान्यताओं में शहद को मधुरता और शुभता से जोड़ा जाता है। देवी को शहद का भोग लगाने के बाद इसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जा सकता है।
इसके अलावा श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार फल, मिठाई और अन्य सात्त्विक खाद्य पदार्थ भी अर्पित कर सकते हैं। कुछ स्थानों पर पीले रंग की मिठाइयां और मौसमी फल चढ़ाने की परंपरा भी मिलती है। भोग बनाते समय स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए और सामग्री ताजी होनी चाहिए।
यदि घर में व्रत रखा गया है, तो प्रसाद और भोजन का चयन अपनी स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं के अनुसार करना उचित है। उपवास के दौरान पर्याप्त पानी पीना और शरीर की जरूरतों का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है। किसी भी धार्मिक परंपरा में भोग की सामग्री को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हो सकती हैं, इसलिए अपने परिवार की परंपरा का पालन किया जा सकता है।

विवाह संबंधी मनोकामनाओं के लिए क्यों की जाती है मां कात्यायनी की पूजा?
मां कात्यायनी की आराधना विवाह संबंधी मनोकामनाओं के लिए भी प्रसिद्ध है। हिंदू धार्मिक परंपरा में ब्रज की गोपियों से जुड़ी एक कथा का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति के रूप में प्राप्त करने की कामना से यमुना तट पर मां कात्यायनी की पूजा की थी।
इस प्रसंग का उल्लेख श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में गोपी-कात्यायनी व्रत के वर्णन के संदर्भ में मिलता है। इस कारण मां कात्यायनी की पूजा को विवाह की इच्छा रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व प्राप्त हुआ। अनेक भक्त विवाह में आने वाली बाधाओं के दूर होने और योग्य जीवनसाथी की कामना से देवी की आराधना करते हैं।
हालांकि, ये धार्मिक आस्थाएं और परंपरागत विश्वास हैं। पूजा को किसी निश्चित परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं देखना चाहिए। विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों में आपसी समझ, सहमति, स्वभाव, जिम्मेदारी और पारिवारिक अनुकूलता भी उतने ही आवश्यक हैं।

मां कात्यायनी की पूजा से जुड़ी मान्यताएं और आध्यात्मिक संदेश
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की उपासना से भक्तों को साहस, आत्मविश्वास और मानसिक दृढ़ता की प्रेरणा मिलती है। देवी का सिंह पर सवार होना निर्भीकता का प्रतीक माना जाता है, जबकि उनके हाथों में मौजूद अस्त्र अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश देते हैं।
नवरात्रि के छठे दिन भक्त अपने जीवन की चुनौतियों पर विचार कर सकते हैं और उन्हें दूर करने के लिए सकारात्मक कदम उठाने का संकल्प ले सकते हैं। कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना, सही निर्णय लेना और दूसरों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना भी देवी की आराधना से जुड़े मूल्यों के अनुरूप है।
पूजा का आध्यात्मिक महत्व केवल मंत्रों के उच्चारण या भोग अर्पित करने तक सीमित नहीं है। अपने आचरण में विनम्रता, करुणा और साहस को स्थान देना भी इस पर्व की भावना को सार्थक बनाता है।

नवरात्रि के छठे दिन इन बातों का रखें ध्यान
मां कात्यायनी की पूजा करते समय पूजा स्थल की स्वच्छता बनाए रखें और श्रद्धापूर्वक आराधना करें। भोग में ऐसी सामग्री का उपयोग करें जो स्वच्छ और खाने योग्य हो। यदि व्रत रखा है, तो अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार नियमों का पालन करें। अस्वस्थता होने पर कठोर उपवास करने के बजाय स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।
पूजा के दौरान परिवार की प्रचलित परंपराओं का सम्मान करें और किसी दूसरे व्यक्ति की पूजा विधि को गलत ठहराने से बचें। धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य मन में श्रद्धा, संयम और सकारात्मकता विकसित करना है। पूजा के बाद जरूरतमंदों की सहायता करना, पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील रहना और परिवार के सदस्यों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करना भी अच्छे संकल्प हो सकते हैं।

मां कात्यायनी की आराधना का संदेश: शक्ति के साथ विवेक भी जरूरी
शारदीय नवरात्रि का छठा दिन हमें याद दिलाता है कि जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए साहस के साथ विवेक और धैर्य भी जरूरी हैं। मां कात्यायनी का स्वरूप अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, अपने कर्तव्यों का पालन करने और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
वर्ष 2026 में 16 अक्टूबर को मनाए जा रहे नवरात्रि के इस पावन दिन पर श्रद्धालु मां कात्यायनी की पूजा, मंत्र जाप और आरती के माध्यम से अपने जीवन में सुख-शांति और सकारात्मकता की कामना कर सकते हैं। देवी को शहद का भोग अर्पित करने और श्रद्धापूर्वक उनकी आराधना करने की परंपरा इस दिन को विशेष बनाती है।
मां कात्यायनी की कथा का सार यही है कि शक्ति का वास्तविक उद्देश्य दूसरों पर प्रभुत्व जमाना नहीं, बल्कि अन्याय का सामना करना, कमजोरों की रक्षा करना और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ना है। यही संदेश नवरात्रि की साधना को दैनिक जीवन से जोड़ता है और भक्तों को अपने भीतर साहस, करुणा तथा आत्मविश्वास विकसित करने की प्रेरणा देता है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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