आज है मातृ नवमी,मातृ नवमी पर क्यों किया जाता है दिवंगत माताओं और महिला पूर्वजों का श्राद्ध? जाने श्राद्ध और तर्पण करने का सही मुहूर्त

संवाद 24 डेस्क। पितृ पक्ष केवल एक धार्मिक अवधि नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी माना जाता है। इसी पितृ पक्ष में आने वाली नवमी तिथि को मातृ नवमी के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2026 में मातृ नवमी 4 अक्टूबर, रविवार को पड़ रही है। धार्मिक परंपरा के अनुसार यह दिन विशेष रूप से दिवंगत माता, दादी, नानी तथा परिवार की अन्य दिवंगत महिला पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि नवमी तिथि को जिन अन्य परिजनों का निधन हुआ हो, उनका श्राद्ध भी इसी तिथि पर किया जा सकता है।

2026 में कब है मातृ नवमी, कितनी देर रहेगी नवमी तिथि?
पंचांग गणना के अनुसार 4 अक्टूबर 2026 को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि रहेगी। दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग के अनुसार नवमी तिथि 4 अक्टूबर की सुबह लगभग 5:51 बजे शुरू होकर 5 अक्टूबर की तड़के लगभग 3:53 बजे तक रहेगी। इसी वजह से 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध और मातृ नवमी मनाई जा रही है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और स्थानीय गणना के कारण समय में कुछ अंतर संभव है, इसलिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।
पितृ पक्ष में श्राद्ध सामान्य पूजा की तरह किसी भी समय करने के बजाय विशेष काल में करने की परंपरा है। उपलब्ध पंचांग गणनाओं में दिल्ली के लिए 4 अक्टूबर को कुतुप मुहूर्त सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक, रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:33 बजे से 1:20 बजे तक और अपराह्न काल 1:20 बजे से लगभग 3:42 बजे तक बताया गया है। श्राद्ध कर्म के लिए इन्हीं अवधियों को विशेष महत्व दिया जाता है।

मातृ नवमी सिर्फ मां के लिए है या दूसरी महिला पूर्वजों का भी किया जा सकता है श्राद्ध?
मातृ नवमी को लेकर सबसे आम सवाल यही होता है कि इस दिन केवल दिवंगत माता का ही श्राद्ध किया जाता है या परिवार की दूसरी महिलाओं का भी। धार्मिक परंपरा में नवमी श्राद्ध को विशेष रूप से महिला पितरों से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए इस दिन दिवंगत माता के अलावा दादी, नानी, बहन अथवा परिवार की अन्य दिवंगत महिला सदस्यों के निमित्त भी श्राद्ध किया जा सकता है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। मातृ नवमी का संबंध केवल महिला होने से नहीं, बल्कि मृत्यु तिथि से भी जुड़ा है। यदि किसी परिजन की मृत्यु आश्विन कृष्ण नवमी या संबंधित नवमी तिथि को हुई थी, तो उनके लिए नवमी श्राद्ध किया जाता है। इसलिए किसी महिला पूर्वज की मृत्यु तिथि यदि ज्ञात है, तो श्राद्ध उसी तिथि के अनुसार करना अधिक उचित माना जाता है।

‘मातृ नवमी’ नाम के पीछे छिपा भाव क्या है?
भारतीय परंपरा में माता को केवल जन्म देने वाली महिला के रूप में नहीं, बल्कि परिवार की प्रथम संस्कारदाता माना गया है। इसलिए दिवंगत माताओं और महिला पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए नवमी तिथि को विशेष स्थान दिया गया है। इस दिन किया जाने वाला श्राद्ध मूल रूप से स्मरण, श्रद्धा और कृतज्ञता का कर्म है।
श्राद्ध शब्द ही ‘श्रद्धा’ से बना माना जाता है। इसका मूल भाव किसी दिवंगत व्यक्ति को याद करके उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना है। पितृ पक्ष की परंपरा में भोजन, जल, तिल, पिंड और दान आदि के माध्यम से पितरों का स्मरण किया जाता है। इस दृष्टि से मातृ नवमी परिवार की उन महिलाओं को याद करने का अवसर है, जिनका योगदान अगली पीढ़ियों के जीवन में रहा है।

श्राद्ध और तर्पण में क्या अंतर है?
अक्सर श्राद्ध और तर्पण को एक ही समझ लिया जाता है, जबकि दोनों के अर्थ और कर्मकांड में अंतर है। श्राद्ध एक व्यापक धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें संकल्प, पिंडदान, पितरों के निमित्त भोजन और दान आदि परंपराएं शामिल हो सकती हैं। वहीं तर्पण का अर्थ जल आदि अर्पित करके पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है।
पितृ पक्ष के पार्वण श्राद्ध में कुतुप और रौहिण जैसे मुहूर्तों को विशेष माना जाता है और श्राद्ध कर्म के अंत में तर्पण करने की परंपरा बताई गई है। इसलिए मातृ नवमी पर परिवार अपनी परंपरा और स्थानीय पुरोहित के मार्गदर्शन के अनुसार श्राद्ध और तर्पण दोनों कर सकता है।

मातृ नवमी पर श्राद्ध की सामान्य विधि क्या है?
श्राद्ध की विधि अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में कुछ भिन्न हो सकती है, लेकिन सामान्य रूप से इस दिन प्रातः स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद पितरों का स्मरण करते हुए संकल्प लिया जाता है। जिस दिवंगत माता या महिला पूर्वज के निमित्त श्राद्ध किया जा रहा है, उनका नाम और परिवार की परंपरा के अनुसार अन्य विवरण लेकर कर्म किया जाता है।
इसके बाद पिंडदान, तर्पण और अन्य निर्धारित कर्म किए जा सकते हैं। कई परंपराओं में तिल, कुश और जल का प्रयोग किया जाता है। श्राद्ध कर्म के बाद ब्राह्मण भोजन कराने तथा जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या वस्त्र आदि दान करने की परंपरा भी अनेक परिवारों में है।
यहां यह समझना आवश्यक है कि श्राद्ध की विधि में क्षेत्रीय और पारिवारिक भिन्नताएं होती हैं। इसलिए इंटरनेट पर उपलब्ध किसी एक विधि को हर परिवार के लिए अनिवार्य मानना उचित नहीं होगा। परिवार की परंपरा और स्थानीय विद्वान या पुरोहित के मार्गदर्शन के अनुसार कर्म करना बेहतर है।

तर्पण करते समय किन बातों का रखें ध्यान?
पितृ तर्पण में जल के साथ तिल और कुश के प्रयोग की परंपरा अनेक स्थानों पर प्रचलित है। तर्पण करते समय पितरों का स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा का भाव सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। पितृ कर्म के दौरान सामान्य पूजा और पितृ कर्म की विधियों को अलग-अलग रखने की परंपरा भी कई परिवारों में देखी जाती है।
तर्पण के संबंध में ‘पितृतीर्थ’ की अवधारणा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। परंपरागत विधि में जल अर्पित करने की विशेष मुद्रा बताई जाती है। हालांकि इसके तरीके में क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अंतर हो सकता है, इसलिए विधि को लेकर संदेह होने पर स्थानीय आचार्य से पुष्टि करना उचित है।

श्राद्ध का सही समय कौन-सा है?
मातृ नवमी पर श्राद्ध करने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात समय है। दिल्ली के 2026 पंचांग के अनुसार कुतुप मुहूर्त 11:46 बजे से 12:33 बजे, रौहिण मुहूर्त 12:33 बजे से 1:20 बजे और इसके बाद अपराह्न काल 1:20 बजे से लगभग 3:42 बजे तक है।
पितृ पक्ष के श्राद्ध कर्म में अपराह्न काल को विशेष महत्व दिया जाता है। उपलब्ध पंचांग परंपरा के अनुसार श्राद्ध कर्म अपराह्न काल समाप्त होने से पहले पूरा करना उचित माना जाता है। इसलिए परिवार को अनुष्ठान की तैयारी पहले से कर लेनी चाहिए, ताकि मुख्य कर्म निर्धारित समय में शांतिपूर्वक संपन्न हो सके।
ध्यान रहे कि मुहूर्त शहर के अनुसार बदलता है। उदाहरण के लिए अलग-अलग स्थानों के पंचांगों में कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल में कुछ मिनट का अंतर दिखाई देता है। इसलिए दिल्ली-एनसीआर से बाहर रहने वाले पाठक अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार समय निर्धारित करें।

अगर मृत्यु तिथि मालूम न हो तो क्या करें?
कई परिवारों के सामने यह समस्या होती है कि किसी पूर्वज की मृत्यु की सही हिंदू तिथि उन्हें ज्ञात नहीं होती। ऐसी स्थिति में पितृ पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है। 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को होगी।
परंपरा के अनुसार यदि किसी पितर की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो सर्वपितृ अमावस्या पर उनके निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है। वहीं यदि मृत्यु तिथि स्पष्ट रूप से ज्ञात है, तो संबंधित तिथि पर श्राद्ध करने की परंपरा अधिक प्रचलित है।

मातृ नवमी पर क्या दान किया जा सकता है?
पितृ पक्ष में दान का उद्देश्य केवल धार्मिक पुण्य अर्जित करना नहीं, बल्कि जरूरतमंद की सहायता और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी माना जाता है। मातृ नवमी पर परिवार अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, फल, भोजन या आवश्यक वस्तुओं का दान कर सकता है।
कई परंपराओं में ब्राह्मण भोजन, गौ सेवा, जरूरतमंदों को भोजन तथा अन्नदान का उल्लेख मिलता है। लेकिन इसे किसी महंगे या दिखावटी आयोजन से जोड़ना आवश्यक नहीं है। श्राद्ध का मूल भाव श्रद्धा है, इसलिए सामर्थ्य के अनुसार किया गया सात्त्विक और विनम्र दान अधिक महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

मातृ नवमी पर किन बातों से बचना चाहिए?
पितृ पक्ष को परंपरागत रूप से संयम और स्मरण का समय माना जाता है। इस दौरान कई परिवार नए मांगलिक कार्य, विवाह, गृह प्रवेश आदि से परहेज करते हैं। हालांकि यह क्षेत्र और परिवार की धार्मिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है।
मातृ नवमी पर सबसे जरूरी बात यह है कि श्राद्ध कर्म को जल्दबाजी या दिखावे के बजाय श्रद्धा से किया जाए। अनावश्यक खर्च, विवाद और कर्मकांड को लेकर आपसी तनाव से बचना चाहिए। यदि किसी विधि को लेकर भ्रम हो, तो प्रमाणिक पंचांग या स्थानीय विद्वान से जानकारी लेना बेहतर है।

पितृ पक्ष 2026 में आगे कौन-सी महत्वपूर्ण तिथियां हैं?
मातृ नवमी के बाद पितृ पक्ष में दशमी श्राद्ध 5 अक्टूबर, एकादशी श्राद्ध 6 अक्टूबर, द्वादशी श्राद्ध 7 अक्टूबर, त्रयोदशी श्राद्ध 8 अक्टूबर, चतुर्दशी श्राद्ध 9 अक्टूबर और सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर 2026 को होगी। अलग-अलग पंचांगों में तिथि के आरंभ और समाप्ति के समय के कारण स्थानीय स्तर पर गणना में मामूली अंतर हो सकता है।
इसलिए जिन परिवारों ने अपने पूर्वजों के श्राद्ध के लिए तिथि निर्धारित कर रखी है, उन्हें केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख देखने के बजाय उस दिन की हिंदू तिथि की पुष्टि करनी चाहिए।

मातृ नवमी का असली संदेश क्या है?
मातृ नवमी का महत्व केवल किसी एक दिन किए जाने वाले धार्मिक कर्मकांड में नहीं है। इसके पीछे परिवार और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता की वह भावना है, जिसे भारतीय संस्कृति में पीढ़ियों से महत्व दिया गया है। मां, दादी, नानी और परिवार की दूसरी दिवंगत महिलाओं को याद करना उस विरासत को स्वीकार करना है, जिसने परिवार को संस्कार, परंपरा और जीवन-मूल्य दिए।
आज जब परिवारों का स्वरूप बदल रहा है और कई पीढ़ियां अलग-अलग शहरों में रहने लगी हैं, तब पितृ पक्ष जैसी परंपराएं अपने अतीत से जुड़ने का अवसर भी देती हैं। मातृ नवमी विशेष रूप से यह याद दिलाती है कि परिवार की कहानी केवल वर्तमान पीढ़ी से शुरू नहीं होती। उसके पीछे कई पीढ़ियों का त्याग, स्नेह और योगदान होता है।
4 अक्टूबर 2026 की मातृ नवमी दिवंगत माताओं और महिला पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष अवसर है। दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग के अनुसार श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त 11:46 बजे से 12:33 बजे, रौहिण मुहूर्त 12:33 बजे से 1:20 बजे और अपराह्न काल 1:20 बजे से लगभग 3:42 बजे तक है। फिर भी पाठकों को अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की अंतिम पुष्टि करनी चाहिए। पितरों के प्रति श्रद्धा, परिवार की परंपरा का सम्मान और सामर्थ्य के अनुसार दान—यही इस दिन की परंपरा का मूल भाव है।

Geeta Singh
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