
संवाद 24 डेस्क। राजस्थान के बीकानेर की पहचान सिर्फ किलों, हवेलियों और रेगिस्तानी संस्कृति से नहीं है। इस शहर ने भारत को एक ऐसा स्वाद भी दिया, जिसने स्थानीय बाजार की सीमाएं पार कर दुनिया के कई देशों तक अपनी जगह बनाई। यह स्वाद है बीकानेरी भुजिया और इसके साथ जुड़ा नाम है हल्दीराम। आज जिस ब्रांड को देश-विदेश में पैकेज्ड नमकीन, मिठाइयों, रेडी-टू-ईट फूड और रेस्तरां कारोबार के लिए जाना जाता है, उसकी शुरुआत 1937 में बीकानेर की एक छोटी नमकीन दुकान से हुई थी। कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट भी अपनी शुरुआत का वर्ष 1937 और संस्थापक के रूप में गंगा बिशन अग्रवाल, जिन्हें हल्दीराम जी के नाम से जाना गया, का उल्लेख करती है।
एक छोटी दुकान से शुरू हुई वह कहानी, जिसने स्वाद को बना दिया कारोबार
हल्दीराम की कहानी को समझने के लिए बीकानेर की उस पुरानी खाद्य परंपरा को समझना जरूरी है, जिसमें नमकीन और भुजिया केवल नाश्ता नहीं बल्कि स्थानीय खानपान की पहचान थी। गंगा बिशन अग्रवाल ने इसी परंपरा के बीच अपना कारोबार शुरू किया। शुरुआत छोटी थी, लेकिन सोच अलग थी—पारंपरिक उत्पाद को ऐसा स्वाद और पहचान देना, जिससे ग्राहक दोबारा उसी दुकान पर लौटे।
कंपनी के आधिकारिक विवरण के अनुसार, बीकानेर में शुरू हुई यह छोटी नमकीन दुकान धीरे-धीरे अपनी खास भुजिया के कारण लोकप्रिय होती गई। यही भुजिया आगे चलकर ब्रांड की पहचान बनी और फिर इसी पहचान ने पूरे कारोबार को विस्तार का आधार दिया।
आखिर भुजिया में ऐसा क्या बदला कि स्वाद बन गया पहचान?
हल्दीराम की सफलता की कहानी में सबसे दिलचस्प हिस्सा उस भुजिया से जुड़ा प्रयोग है, जिसे परिवार की कारोबारी विरासत का महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक गंगा बिशन अग्रवाल ने पारंपरिक भुजिया में प्रयोग करते हुए मोठ की दाल का इस्तेमाल किया। इससे भुजिया की बनावट, कुरकुरापन और स्वाद में बदलाव आया और वह ग्राहकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक अंतर समझना जरूरी है। आज बाजार में बिकने वाली हर बीकानेरी भुजिया को केवल इसी एक रेसिपी से जोड़ना सही नहीं होगा। भुजिया एक व्यापक पारंपरिक खाद्य उत्पाद है और बीकानेरी भुजिया को भौगोलिक पहचान भी प्राप्त है। भारत के भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्रेशन में Bikaneri Bhujia पंजीकृत है और इसका आवेदन Bikaner Bhujia Udhyog Sangh की ओर से किया गया था। इसका पंजीकरण 2010 में हुआ।
यानी हल्दीराम की कहानी किसी एक खाद्य पदार्थ को पैदा करने की नहीं, बल्कि एक पारंपरिक स्वाद को अलग पहचान, गुणवत्ता और कारोबारी पैमाने पर पहुंचाने की कहानी है।
1940 के दशक में ‘हल्दीराम’ नाम ने बनाई अपनी पहचान
परिवार और कारोबार से संबंधित उपलब्ध ऐतिहासिक तथा न्यायिक दस्तावेजों से पता चलता है कि गंगा बिशन अग्रवाल का कारोबार केवल एक दुकान तक सीमित नहीं रहा था। दिल्ली उच्च न्यायालय से जुड़े रिकॉर्ड में गंगा बिशन को ‘Haldiram Bhujiawala’ के नाम से कारोबार करने वाला व्यक्ति बताया गया है और उनके व्यवसाय में भुजिया, पापड़ तथा मिठाइयों जैसे उत्पाद शामिल थे।
यहीं से यह भी समझ आता है कि ‘हल्दीराम’ सिर्फ किसी दुकान का नाम नहीं रहा, बल्कि परिवार के कारोबार की पहचान बनता चला गया। बाद के वर्षों में परिवार की अलग-अलग शाखाओं के बीच इस नाम और ट्रेडमार्क को लेकर लंबा कानूनी विवाद भी चला। यह विवाद बताता है कि एक समय तक साधारण पारिवारिक कारोबार का नाम इतना मूल्यवान हो चुका था कि उसके अधिकार को लेकर अदालत तक मामला पहुंच गया।
बीकानेर से बाहर निकलने का फैसला बना सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट
किसी स्थानीय खाद्य उत्पाद को राष्ट्रीय ब्रांड बनाना आसान नहीं होता। स्वाद एक जगह लोकप्रिय हो सकता है, लेकिन उसे हजारों किलोमीटर दूर उसी गुणवत्ता के साथ बेचना अलग चुनौती है। हल्दीराम के इतिहास में यही चुनौती उसके विस्तार की वजह बनी।
कंपनी की एक आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, परिवार की अगली पीढ़ी में शिव किशन अग्रवाल ने कारोबार को बीकानेर से बाहर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 1970 में नागपुर का रुख किया और वहां उत्पादन क्षमता विकसित करने की दिशा में काम किया। इसके बाद भुजिया के साथ नमकीन, मिठाइयों और पेय पदार्थों का दायरा बढ़ाया गया।
लिवमिंट की एक विस्तृत प्रोफाइल के अनुसार, शिव किशन ने नागपुर में स्थानीय बाजार की संभावनाओं को पहचाना और वहां भुजिया के कारोबार को खड़ा किया। उन्होंने केवल पुराना उत्पाद बेचने के बजाय स्थानीय पसंद को समझते हुए नए खाद्य उत्पादों के साथ प्रयोग भी किए।
यही सोच आगे चलकर हल्दीराम के कारोबारी मॉडल की बड़ी ताकत बनी—एक लोकप्रिय पारंपरिक उत्पाद से शुरुआत और उसके आसपास पूरा फूड पोर्टफोलियो तैयार करना।
नागपुर ने दी रफ्तार, दिल्ली ने दिया राष्ट्रीय बाजार
नागपुर में विस्तार के बाद कारोबार का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव दिल्ली बना। 1980 के दशक में परिवार के कारोबार ने दिल्ली में अपनी मौजूदगी मजबूत की। हल्दीराम की आधिकारिक टाइमलाइन के मुताबिक परिवार ने 1983 में दिल्ली की ओर विस्तार किया।
लिवमिंट की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली में शुरुआती वर्षों में परिवार को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। 1984 की हिंसा में उनका एक कारखाना भी प्रभावित हुआ, लेकिन कारोबार बंद करने के बजाय परिवार ने दोबारा शुरुआत की और उत्पादन को आगे बढ़ाया।
यहीं से हल्दीराम की कहानी केवल ‘भुजिया बेचने वाली दुकान’ की नहीं रही। यह धीरे-धीरे मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग, वितरण और रिटेल पर आधारित खाद्य कारोबार में बदलने लगी।
पैकेट में बंद हुआ स्वाद और बदल गया पूरा बिजनेस मॉडल
हल्दीराम की सफलता का एक महत्वपूर्ण कारण यह रहा कि उसने पारंपरिक नमकीन को आधुनिक पैकेजिंग और वितरण प्रणाली के साथ जोड़ा। इसका मतलब था कि ग्राहक को वही स्वाद बीकानेर की दुकान पर ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे शहरों में भी मिलने लगा।
यह बदलाव भारतीय खाद्य कारोबार के लिए भी महत्वपूर्ण था। पहले नमकीन मुख्यतः स्थानीय दुकानों पर खुले रूप में बिकती थी। लेकिन पैकेज्ड फूड मॉडल ने उत्पाद की शेल्फ लाइफ, ब्रांड पहचान और दूर-दराज के बाजारों तक पहुंच को बढ़ाया।
कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट आज भी अपनी यात्रा को पारंपरिक रेसिपी से आधुनिक R&D, गुणवत्ता प्रयोगशालाओं और ऑटोमेटेड मैन्युफैक्चरिंग तक पहुंचने की कहानी के रूप में प्रस्तुत करती है।
1993 में विदेश पहुंची भुजिया, फिर बीकानेर का स्वाद बना ग्लोबल
राष्ट्रीय बाजार में पहचान मजबूत होने के बाद अगली बड़ी चुनौती अंतरराष्ट्रीय बाजार थी। हल्दीराम के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, 1993 में कंपनी ने अमेरिका से निर्यात की शुरुआत की। आगे चलकर भारतीय प्रवासी समुदाय वाले कई देशों में इसके उत्पाद पहुंचने लगे।
रॉयटर्स के अनुसार, हल्दीराम के उत्पाद जापान, रूस, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजारों तक पहुंचे हैं। कंपनी ने बाद में ब्रिटेन में अपनी विदेशी उत्पादन क्षमता भी विकसित की।
यहां हल्दीराम के कारोबार की असली रणनीति दिखाई देती है। उसने भारतीय स्वाद को बदलने के बजाय उसे पैकेज करके दुनिया के सामने रखा। यानी जिस भुजिया को कभी बीकानेर की गलियों में स्थानीय ग्राहक खाते थे, वही उत्पाद भारतीय भोजन और संस्कृति की पहचान बनकर विदेशों तक पहुंचा।
भुजिया से नमकीन, मिठाई से रेस्तरां तक—कारोबार का हुआ विस्तार
अगर हल्दीराम केवल भुजिया तक सीमित रहता तो शायद उसकी कहानी इतनी बड़ी नहीं होती। कंपनी ने समय के साथ नमकीन की अनेक श्रेणियों, मिठाइयों, पेय पदार्थों और बाद में रेडी-टू-ईट तथा फ्रोजन फूड जैसे क्षेत्रों में विस्तार किया।
रेस्तरां कारोबार भी इसी विस्तार का हिस्सा बना। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी ने देशभर में बड़ी संख्या में रेस्तरां विकसित किए और पैकेज्ड स्नैक्स के अलावा तैयार भोजन और फ्रोजन उत्पादों के बाजार में भी प्रवेश किया।
यानी हल्दीराम ने ग्राहक की जरूरत को केवल ‘नाश्ते’ तक सीमित नहीं रखा। उसने धीरे-धीरे घर, यात्रा, त्योहार, उपहार और बाहर खाने—इन सभी अवसरों के लिए उत्पाद और सेवाएं विकसित कीं।
परिवार के भीतर बंटा कारोबार, लेकिन ब्रांड की ताकत बनी रही
हल्दीराम की कहानी का एक कम चर्चित पक्ष परिवार के भीतर कारोबार का विभाजन और उससे जुड़े कानूनी विवाद हैं। गंगा बिशन अग्रवाल के परिवार की अलग-अलग शाखाओं ने अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार विकसित किया। ट्रेडमार्क और ‘Haldiram Bhujiawala’ नाम को लेकर दिल्ली और कोलकाता से जुड़ी शाखाओं के बीच लंबे समय तक विवाद चला।
2013 के दिल्ली उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में इस विवाद और परिवार की अलग-अलग शाखाओं के दावों का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
इसके बावजूद बाजार में ‘हल्दीराम’ नाम की पहचान बनी रही। यही किसी ब्रांड की वास्तविक ताकत होती है—परिवार या कॉरपोरेट ढांचे में बदलाव के बावजूद ग्राहक के मन में नाम और उत्पाद की विश्वसनीयता कायम रहना।
आज अरबों डॉलर की वैल्यू तक कैसे पहुंचा हल्दीराम?
हल्दीराम की आर्थिक यात्रा का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अब यह केवल पारिवारिक नमकीन कारोबार नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की नजर में एक बड़ा भारतीय कंज्यूमर ब्रांड है।
मार्च 2025 में रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि सिंगापुर की निवेश कंपनी Temasek ने हल्दीराम के स्नैक्स कारोबार में करीब 10 प्रतिशत हिस्सेदारी लगभग 1 अरब डॉलर में खरीदी। इस सौदे के आधार पर कंपनी का मूल्यांकन करीब 10 अरब डॉलर आंका गया था।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 10 अरब डॉलर का आंकड़ा उस निवेश सौदे से निकला अनुमानित मूल्यांकन था, न कि कंपनी के पास मौजूद नकद संपत्ति। इसी तरह अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में कंपनी की वैल्यू और राजस्व के आंकड़े अलग हो सकते हैं। इसलिए ‘अरबों का साम्राज्य’ कहने का आधार कंपनी की कारोबारी वैल्यू और बाजार स्थिति है, न कि किसी एक परिवार के निजी बैंक खाते में मौजूद रकम।
रॉयटर्स ने Euromonitor के आंकड़ों के हवाले से यह भी बताया कि भारत के लगभग 6.2 अरब डॉलर के savory snacks बाजार में हल्दीराम की हिस्सेदारी करीब 13 प्रतिशत आंकी गई थी।
एक नुस्खे से ज्यादा महत्वपूर्ण थी सोच
हल्दीराम की सफलता को सिर्फ भुजिया की रेसिपी से जोड़ना इस कहानी को छोटा कर देना होगा। असली बदलाव तीन स्तरों पर हुआ—उत्पाद में प्रयोग, गुणवत्ता में निरंतरता और बाजार का विस्तार।
गंगा बिशन अग्रवाल ने स्थानीय स्वाद को कारोबार का आधार बनाया। अगली पीढ़ी ने उसे दूसरे शहरों तक पहुंचाया। फिर पैकेजिंग और उत्पादन ने इसे बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराया। इसके बाद निर्यात और आधुनिक रिटेल ने इसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड में बदल दिया।
यही कारण है कि आज हल्दीराम की कहानी भारतीय उद्यमिता के उदाहरण के रूप में देखी जाती है। इसमें कोई अचानक मिला खजाना नहीं था। इसके पीछे कई दशकों तक लगातार काम, परिवार की अगली पीढ़ियों का योगदान, बाजार को समझने की क्षमता और पारंपरिक स्वाद को आधुनिक कारोबारी मॉडल से जोड़ने की रणनीति थी।
बीकानेर की भुजिया से दुनिया की मेज तक पहुंची कहानी
हल्दीराम की यात्रा को अगर एक वाक्य में समेटना हो तो कहा जा सकता है—यह उस भारतीय कारोबारी सोच की कहानी है जिसने स्थानीय स्वाद को वैश्विक उत्पाद बना दिया।
1937 में बीकानेर की छोटी दुकान से शुरू हुई यात्रा आज आधुनिक उत्पादन, पैकेज्ड फूड, मिठाइयों, रेस्तरां और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच चुकी है। कंपनी की अपनी वेबसाइट भी आज इस विरासत को बीकानेर से शुरू होकर दुनिया तक पहुंचने वाली यात्रा के रूप में प्रस्तुत करती है।
बीकानेरी भुजिया की कुरकुरी पतली सेव में इसलिए सिर्फ मसालों का स्वाद नहीं है। उसके पीछे एक शहर की खाद्य परंपरा, एक परिवार की कारोबारी यात्रा और भारतीय उद्यमिता की कई पीढ़ियों की कहानी छिपी है। शायद यही वजह है कि हल्दीराम का सबसे बड़ा सबक उसकी अरबों डॉलर की वैल्यू नहीं, बल्कि यह है कि सही उत्पाद, सही गुणवत्ता और लंबी अवधि की सोच किसी छोटी दुकान को भी दुनिया के नक्शे पर ला सकती है।
हल्दीराम का इतिहास यह बताता है कि बड़े कारोबार हमेशा बड़े निवेश से शुरू नहीं होते। कई बार उनकी शुरुआत एक छोटी दुकान, सीमित संसाधनों और किसी साधारण उत्पाद को बेहतर बनाने की जिद से होती है। बीकानेर की भुजिया इसका एक उल्लेखनीय भारतीय उदाहरण है।






