अक्तूबर में दो प्रदोष व्रत का संयोग, 8 को गुरु और 23 को शुक्र प्रदोष, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

संवाद 24 डेस्क। हिंदू धर्म में भगवान शिव की आराधना के लिए प्रदोष व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। प्रत्येक चंद्र मास की कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस व्रत की खासियत यह है कि इसकी पूजा केवल त्रयोदशी तिथि पर निर्भर नहीं होती, बल्कि प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के आसपास का समय भी महत्वपूर्ण माना जाता है। अक्तूबर 2026 में शिव भक्तों को दो बार प्रदोष व्रत रखने का अवसर मिलेगा। पहला प्रदोष व्रत 8 अक्तूबर, गुरुवार को और दूसरा 23 अक्तूबर, शुक्रवार को रखा जाएगा। गुरुवार को पड़ने के कारण पहला गुरु प्रदोष और शुक्रवार को पड़ने के कारण दूसरा शुक्र प्रदोष कहलाएगा।

दो प्रदोष, दो वार और शिव आराधना के दो विशेष अवसर
अक्तूबर का पहला प्रदोष व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर होगा। पंचांग गणना के अनुसार त्रयोदशी तिथि 7 अक्तूबर की रात 11 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर 8 अक्तूबर की रात 10 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। चूंकि 8 अक्तूबर को प्रदोष काल के दौरान त्रयोदशी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए इसी दिन व्रत रखा जाएगा। दूसरा प्रदोष आश्विन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी पर होगा। यह तिथि 23 अक्तूबर को दोपहर 2 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 24 अक्तूबर को दोपहर 1 बजकर 36 मिनट तक रहेगी। इस कारण 23 अक्तूबर को शुक्र प्रदोष व्रत रखा जाएगा।

8 अक्तूबर को गुरु प्रदोष, जानें पूजा का समय
पहला प्रदोष व्रत गुरुवार, 8 अक्तूबर 2026 को है। गुरुवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष को गुरु प्रदोष या बृहस्पति प्रदोष कहा जाता है। गाजियाबाद के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार इस दिन प्रदोष पूजा का समय लगभग शाम 5 बजकर 58 मिनट से रात 8 बजकर 26 मिनट तक रहेगा। दूसरे स्रोतों में आसपास के स्थानों के अनुसार समय में एक-दो मिनट का अंतर दिखाई देता है, जो सूर्यास्त के स्थानीय समय के कारण स्वाभाविक है। इस अवधि में भगवान शिव का जलाभिषेक, पंचामृत अभिषेक, बेलपत्र अर्पित करना, धूप-दीप जलाना और शिव मंत्रों का जाप किया जा सकता है। धार्मिक परंपरा में प्रदोष काल को शिव आराधना के लिए विशेष माना गया है। इसलिए पूजा के लिए पूरे दिन में किसी भी समय की अपेक्षा प्रदोष काल को प्राथमिकता देने की परंपरा है।

गुरु प्रदोष को क्यों माना जाता है विशेष?
प्रदोष व्रत जब गुरुवार को आता है तो उसे गुरु प्रदोष कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में गुरुवार का संबंध देवगुरु बृहस्पति से माना जाता है। इसी कारण गुरु प्रदोष को ज्ञान, धर्म, शिक्षा, सद्बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की कामना से जोड़कर देखा जाता है। यह मान्यता धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित परिणाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। शिव भक्त इस दिन भगवान शिव के साथ माता पार्वती और नंदी की पूजा करते हैं। कई परिवारों में बृहस्पति देव का स्मरण भी किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक गुरु प्रदोष का व्रत करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति अपने जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि की कामना कर सकता है।

23 अक्तूबर को आएगा शुक्र प्रदोष
अक्तूबर का दूसरा प्रदोष व्रत शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2026 को रखा जाएगा। शुक्रवार को आने के कारण इसे शुक्र प्रदोष कहा जाता है। गाजियाबाद के लिए उपलब्ध पंचांग के अनुसार इस दिन प्रदोष पूजा का समय लगभग शाम 5 बजकर 43 मिनट से रात 8 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। अलग-अलग शहरों में सूर्यास्त का समय बदलने के कारण प्रदोष काल भी कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। इस दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि दोपहर से शुरू होगी और अगले दिन दोपहर तक रहेगी। चूंकि 23 अक्तूबर की शाम प्रदोष काल में त्रयोदशी विद्यमान होगी, इसलिए उसी दिन व्रत और शिव पूजा की जाएगी।

शुक्र प्रदोष का धार्मिक महत्व क्या है?
शुक्रवार का संबंध हिंदू परंपरा में शुक्र ग्रह और देवी लक्ष्मी से भी जोड़ा जाता है। इसी कारण शुक्र प्रदोष को गृहस्थ जीवन, दांपत्य सुख, सौंदर्य, समृद्धि और पारिवारिक सुख-शांति की कामना से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि इन मान्यताओं का आधार धार्मिक परंपराएं और ज्योतिषीय धारणाएं हैं, इसलिए इन्हें निश्चित भविष्यफल के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। शिव भक्त इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं। गृहस्थ लोग पारिवारिक सुख और वैवाहिक जीवन में सौहार्द की कामना करते हुए व्रत रख सकते हैं। अविवाहित लोग भी अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार अच्छे जीवनसाथी और सुखी भविष्य की कामना से यह व्रत करते हैं।

आखिर प्रदोष काल क्या होता है?
प्रदोष शब्द का सामान्य अर्थ दिन के ढलने और रात के आरंभ होने के आसपास की अवधि से जुड़ा है। प्रदोष व्रत में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल में विद्यमान हो। इसी आधार पर व्रत का दिन निर्धारित किया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद का समय है और जब इस अवधि में त्रयोदशी तिथि का संयोग होता है, तब वह समय शिव पूजा के लिए विशेष माना जाता है। यही कारण है कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि त्रयोदशी तिथि किस तारीख को शुरू और समाप्त हो रही है। व्रत के निर्धारण में स्थानीय सूर्यास्त और प्रदोष काल का भी महत्व होता है। अलग-अलग शहरों में सूर्यास्त अलग समय पर होने के कारण पूजा के समय में अंतर आ सकता है।

प्रदोष व्रत में क्या करें?
प्रदोष व्रत रखने वाले श्रद्धालु प्रातः स्नान करके भगवान शिव का ध्यान कर व्रत का संकल्प ले सकते हैं। इसके बाद अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार उपवास रखा जाता है। कुछ लोग पूरे दिन निर्जल या फलाहार करते हैं, जबकि कई लोग फल, दूध या सात्त्विक भोजन लेकर व्रत करते हैं। उपवास की पद्धति परिवार और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। शाम को प्रदोष काल में स्नान या हाथ-पैर धोकर पूजा स्थल को स्वच्छ किया जाता है। भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग के सामने दीपक जलाकर पूजा शुरू की जा सकती है। जल, दूध, दही, घी, शहद आदि से अभिषेक करने की परंपरा कई स्थानों पर है। इसके बाद बेलपत्र, पुष्प और धूप-दीप अर्पित किए जाते हैं।

बेलपत्र और शिव पूजा का क्या संबंध है?
भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र को विशेष स्थान प्राप्त है। सामान्यतः तीन पत्तियों वाले बेलपत्र को शिवलिंग पर अर्पित किया जाता है। धार्मिक परंपरा में बेलपत्र को पवित्र माना गया है और शिव आराधना में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है। बेलपत्र अर्पित करते समय श्रद्धालु भगवान शिव का ध्यान कर सकते हैं और “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप कर सकते हैं। पूजा में मंत्रों की संख्या से अधिक श्रद्धा और एकाग्रता को महत्व दिया जाता है।

क्या प्रदोष व्रत में शिव परिवार की पूजा भी होती है?
भगवान शिव की पूजा के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और नंदी का स्मरण करने की परंपरा भी अनेक घरों और मंदिरों में है। शिव परिवार की सामूहिक पूजा को परिवार में सुख-शांति और मंगल की कामना से जोड़ा जाता है। प्रदोष के अवसर पर शिव मंदिरों में विशेष आरती और पूजा भी आयोजित की जाती है। कुछ मंदिरों में प्रदोष काल में शिवलिंग का विशेष श्रृंगार किया जाता है और भक्त सामूहिक रूप से शिव मंत्रों का जाप करते हैं।

व्रत रखने वाले क्या खा सकते हैं?
प्रदोष व्रत में भोजन को लेकर पूरे देश में एक जैसी परंपरा नहीं है। कुछ श्रद्धालु निर्जल उपवास करते हैं, कुछ केवल पानी या फल लेते हैं और कुछ लोग फलाहार करते हैं। इसलिए किसी एक भोजन पद्धति को सभी के लिए अनिवार्य बताना उचित नहीं होगा। जो लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्या से जूझ रहे हों, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग या नियमित दवाएं लेने वाले लोग बिना चिकित्सकीय सलाह के कठोर उपवास न करें। धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य की सुरक्षा भी जरूरी है। ऐसे लोग अपनी क्षमता के अनुसार सात्त्विक भोजन लेकर भी पूजा-अर्चना कर सकते हैं।

प्रदोष व्रत में किन बातों से बचना चाहिए?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत के दिन सात्त्विकता, संयम और सकारात्मक सोच बनाए रखने पर जोर दिया जाता है। क्रोध, विवाद और अनावश्यक तनाव से बचने की सलाह दी जाती है। कई परिवारों में प्याज-लहसुन, मांसाहार और नशीले पदार्थों से दूरी रखी जाती है। पूजा के दौरान शिव मंत्र का जाप, शिव स्तुति या शिव चालीसा का पाठ किया जा सकता है। कुछ भक्त शिव पुराण या भगवान शिव से संबंधित धार्मिक कथाओं का श्रवण भी करते हैं।

प्रदोष व्रत का पारण कब करें?
प्रदोष व्रत का पारण अलग-अलग परंपराओं में अलग तरीके से किया जाता है। सामान्यतः श्रद्धालु प्रदोष काल की पूजा पूरी करने के बाद व्रत खोलते हैं, जबकि कुछ परंपराओं में अगले दिन पारण किया जाता है। इसलिए अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण करना उचित है। विशेष रूप से निर्जल व्रत करने वालों को स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। लंबे समय तक बिना पानी या भोजन के रहने के बाद अचानक भारी भोजन करने के बजाय हल्का और सुपाच्य भोजन लेना बेहतर रहता है।

मंदिर जाना जरूरी है या घर पर भी कर सकते हैं पूजा?
प्रदोष व्रत के लिए मंदिर जाना अनिवार्य नहीं है। श्रद्धालु अपने घर में भी भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं। यदि घर में शिवलिंग या शिव परिवार की प्रतिमा है तो उसके सामने दीपक जलाकर पूजा की जा सकती है। शिव मंदिर में जाकर दर्शन करना धार्मिक आस्था का विषय है। घर पर पूजा करते समय साफ-सफाई, शांत वातावरण और श्रद्धा का ध्यान रखना पर्याप्त है। सबसे महत्वपूर्ण प्रदोष काल में शिव का स्मरण और पूजा करना है।

अक्टूबर के दोनों प्रदोष की एक नजर में पूरी जानकारी
प्रदोष
तिथि
पक्ष
वार
स्थानीय प्रदोष पूजा समय*
गुरु प्रदोष
8 अक्तूबर 2026
कृष्ण पक्ष
गुरुवार
शाम 5:58 से रात 8:26 बजे तक
शुक्र प्रदोष
23 अक्तूबर 2026
शुक्ल पक्ष
शुक्रवार
शाम 5:43 से रात 8:16 बजे तक
*ये समय गाजियाबाद क्षेत्र की पंचांग गणना के आधार पर हैं। दूसरे शहरों में सूर्यास्त के अंतर के कारण समय बदल सकता है।

क्यों खास है अक्तूबर का यह प्रदोष संयोग?
अक्तूबर में पड़ने वाले दोनों प्रदोष अलग-अलग पक्षों की त्रयोदशी पर हैं और दोनों अलग-अलग वारों पर पड़ रहे हैं। पहला कृष्ण पक्ष में और गुरुवार को होने के कारण गुरु प्रदोष है, जबकि दूसरा शुक्ल पक्ष में और शुक्रवार को होने के कारण शुक्र प्रदोष है। इस तरह महीने में शिव आराधना के दो अवसर मिलते हैं, जिनके साथ अलग-अलग वार की धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं। धार्मिक दृष्टि से देखें तो प्रदोष व्रत केवल उपवास का नाम नहीं है। यह आत्मसंयम, ध्यान, शिव आराधना और संध्या के शांत समय में आध्यात्मिक साधना से जुड़ी परंपरा है। भागदौड़ भरे जीवन में ऐसे व्रत व्यक्ति को कुछ समय स्वयं के भीतर झांकने और मन को शांत करने का अवसर भी दे सकते हैं।

स्थान के अनुसार मुहूर्त में अंतर को न करें नजरअंदाज
प्रदोष व्रत की तिथि को लेकर समाचारों में सामान्य तौर पर एक ही समय प्रकाशित किया जाता है, लेकिन वास्तविक प्रदोष काल शहर के अनुसार बदल सकता है। पंचांग गणना में स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त को महत्व दिया जाता है। द्रिक पंचांग भी स्पष्ट करता है कि अलग-अलग शहरों में प्रदोष व्रत का दिन या पूजा समय अलग हो सकता है, क्योंकि सूर्यास्त का समय स्थान के अनुसार बदलता है। इसलिए दिल्ली, गाजियाबाद, लखनऊ, जयपुर, मुंबई या किसी अन्य शहर में रहने वाले श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का अंतिम समय देखना चाहिए। यहां दिए गए समय को विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर के आसपास के क्षेत्र के लिए उपयोगी माना जा सकता है।

श्रद्धा, संयम और शिव आराधना का पर्व
अक्तूबर 2026 का प्रदोष व्रत शिव भक्तों के लिए दो महत्वपूर्ण अवसर लेकर आ रहा है। 8 अक्तूबर का गुरु प्रदोष और 23 अक्तूबर का शुक्र प्रदोष दोनों ही आश्विन मास की त्रयोदशी तिथियों पर पड़ेंगे। पहले दिन कृष्ण पक्ष और दूसरे दिन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी होगी। दोनों अवसरों पर प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा विशेष रूप से की जा सकती है।
प्रदोष व्रत का महत्व केवल धार्मिक फल की कामना तक सीमित नहीं है। भारतीय परंपरा में व्रत आत्मसंयम, नियमितता और ईश्वर के प्रति समर्पण का माध्यम भी रहा है। इसलिए इस अवसर को दिखावे के बजाय श्रद्धा, सेवा, संयम और आत्मचिंतन के साथ मनाना अधिक सार्थक हो सकता है। पूजा की विधि और उपवास की कठोरता से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति अपनी आस्था और स्वास्थ्य—दोनों का सम्मान करते हुए इस परंपरा का पालन करे।
ध्यान रखें: प्रदोष पूजा के समय स्थान के अनुसार बदलते हैं। ऊपर दिए गए समय गाजियाबाद क्षेत्र की उपलब्ध पंचांग गणना पर आधारित हैं; अन्य शहरों के श्रद्धालु स्थानीय पंचांग से समय अवश्य जांचें।

Geeta Singh
Geeta Singh

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