
संवाद 24 नई दिल्ली। इक्कीसवीं सदी का वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य एक अभूतपूर्व मोड़ पर खड़ा है। शीत युद्ध के बाद जिस एकध्रुवीय विश्व और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की कल्पना की गई थी, उसकी नींव अब हिलती नजर आ रही है। म्यूनिख में आयोजित उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने वैश्विक शक्ति संतुलन, अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं और रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर जो बातें कहीं, उसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। जयशंकर ने साफ शब्दों में रेखांकित किया कि मौजूदा दौर केवल पुरानी व्यवस्थाओं के बिखरने का नहीं, बल्कि नए रणनीतिक विकल्पों और व्यावहारिक कूटनीति के उभार का दौर है।
महाशक्ति की अपनी पसंद और डगमगाती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था
विदेश मंत्री ने वैश्विक व्यवस्था पर खुलकर बात करते हुए कहा कि अमेरिका ने लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अपनी आर्थिक, सामरिक और संस्थागत ताकत से संभाले रखा था। लेकिन अब उसने स्वयं चुनिंदा मुद्दों पर अकेली ताकत (Sole Power) बने रहने का रास्ता चुना है। जब सबसे बड़ी महाशक्ति के रुख और प्राथमिकताओं में बदलाव आता है, तो उसका सीधा असर दशकों पुरानी बहुपक्षीय व्यवस्थाओं की स्थिरता पर पड़ता है। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती भू-राजनीतिक व आर्थिक खींचतान का भी उल्लेख किया। जयशंकर के मुताबिक, दो महाशक्तियों के बीच की यह तीखी प्रतिस्पर्धा अब केवल द्विपक्षीय मसला नहीं रही, बल्कि इसने हर छोटे-बड़े राष्ट्र की रणनीतिक स्वायत्तता, व्यापारिक समीकरण और वैश्विक प्रभाव को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया है। दुनिया अब किसी एक ध्रुव के इशारे पर चलने के बजाय एक जटिल और बहुध्रुवीय हकीकत की ओर बढ़ चुकी है।
केवल सलाह नहीं, अब ठोस एक्शन: शांति की तलाश में भारत का बढ़ता दायरा
रूस और यूक्रेन के बीच जारी भीषण युद्ध पर भारत की भूमिका को स्पष्ट करते हुए विदेश मंत्री ने एक बेहद अहम और निर्णायक संकेत दिया। उन्होंने कहा कि भारत अब केवल दूर बैठकर शांति की अपील करने या सिर्फ वकालत करने की औपचारिकता तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ महीनों के दौरान भारत ने इस जंग को समाप्त कराने के लिए सक्रिय कूटनीति और व्यावहारिक मध्यस्थता की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। भारत का मानना है कि बंदूकों की गड़गड़ाहट और सैन्य तनाव के बीच बातचीत और कूटनीति ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प हैं। इसी सोच के तहत नई दिल्ली इस समय मॉस्को और कीव दोनों के शीर्ष नेतृत्व से लगातार संपर्क बनाए हुए है। यह वार्तालाप केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि जमीनी संकटों के समाधान पर केंद्रित है – जैसे काला सागर में मालवाहक जहाजों की निर्बाध सुरक्षा, वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज की आपूर्ति, ऊर्जा निर्यात की निरंतरता और दोनों देशों की तात्कालिक सामरिक चिंताओं को संतुलित करना।
मॉस्को से कीव तक: दोनों पक्षों को क्यों भाया भारत का फॉर्मूला?
वैश्विक स्तर पर जारी इस संघर्ष में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जहां अधिकांश पश्चिमी देश एकतरफा रुख के कारण अपना कूटनीतिक प्रभाव खो चुके हैं, वहीं भारत दोनों पक्षों के लिए एक विश्वसनीय संवाद सेतु बनकर उभरा है। इस तथ्य की पुष्टि खुद दोनों विरोधी खेमों के बयानों से होती है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास शांति और सुलह को लेकर बेहद व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण है। वहीं दूसरी ओर, यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने भी इस बात को माना है कि अमेरिका समेत दुनिया भर से मिले विभिन्न शांति प्रस्तावों में से भारत द्वारा पेश किया गया खाका सबसे समग्र, संतुलित और व्यापक है। यह वैश्विक विश्वास भारत की गुटनिरपेक्ष और स्वतंत्र विदेश नीति की बड़ी रणनीतिक जीत माना जा रहा है।
भविष्य की दिशा: क्या युद्ध विराम की राह दिखाएगा भारत?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रूसी राष्ट्रपति पुतिन और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ सीधी मुलाकातों में यह स्पष्ट संदेश दिया गया था कि “यह युग युद्ध का नहीं है।” इस मूल मंत्र को जमीन पर उतारने के लिए भारतीय कूटनीति अब दोनों देशों के बीच न्यूनतम सहमति वाले बिंदुओं पर काम कर रही है।
जयशंकर के संबोधन ने यह साफ कर दिया है कि भारत आने वाले समय में विश्व मंच पर मूक दर्शक बनकर नहीं रहेगा। जब पुरानी महाशक्तियां अपनी सीमाओं में सिमट रही हों और दुनिया क्षेत्रीय संघर्षों की आग में झुलस रही हो, तब भारत का शांति दूत बनकर उभरना न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए राहत भरा संकेत है, बल्कि यह भविष्य के बहुध्रुवीय विश्व में भारत के निर्णायक नेतृत्व का भी स्पष्ट ऐलान है।






