
संवाद 24 नई दिल्ली। किसी गंभीर बीमारी या दुर्घटना के समय अस्पताल पहुंचे मरीज और उसके तीमारदारों की पहली प्राथमिकता केवल जान बचाना होती है। लेकिन जब मरीज के डिस्चार्ज होने का समय आता है, तो हाथ में थमाए गए बिल के आंकड़े कई बार होश उड़ा देते हैं। दवाइयों, सर्जिकल उपकरणों और सामान्य मेडिकल कंज्यूमेबल्स (उपभोग्य सामग्रियों) पर वास्तविक लागत से कई गुना अधिक वसूली का यह नेटवर्क अब केंद्र सरकार के सीधे रडार पर आ चुका है। अस्पतालों द्वारा मरीजों से की जा रही इस अत्यधिक वसूली और मनमाने बिलिंग तंत्र को लेकर केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने एक देशव्यापी विस्तृत समीक्षा शुरू कर दी है। मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्रों के मुताबिक, सरकार का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि अस्पताल किसी जीवनरक्षक दवा, इंजेक्शन या उपकरण को निर्माता से किस थोक भाव पर खरीदते हैं और वही सामग्री मरीज के अंतिम बिल में किस कीमत पर जोड़ी जाती है। जांच में सामने आया भारी अंतर यह साबित करने के लिए काफी है कि स्वास्थ्य सेवा की आड़ में मरीजों की जेब पर किस कदर डाका डाला जा रहा है।
वास्तविक लागत बनाम मरीज का बिल: चौंकाने वाले आंकड़े
सरकार द्वारा कराई जा रही प्रारंभिक पड़ताल में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद विचलित करने वाले हैं। जांच में पाया गया कि जिस डिस्पोजेबल सिरिंज को अस्पताल थोक में मात्र 7 रुपये के आसपास खरीदते हैं, उसे मरीज के बिल में 57 रुपये तक चार्ज किया जा रहा है। इसी तरह, लगभग 29 रुपये में खरीदे जाने वाले कैथेटर के लिए तीमारदारों से 310 रुपये तक वसूले गए। हैरानी की बात यह है कि रेस्पिरेटरी केयर में काम आने वाले नेबुलाइजर और सामान्य ऑक्सीजन मास्क, जिनकी थोक खरीद लागत मुश्किल से 40 से 45 रुपये बैठती है, उन्हें बिल में 650 रुपये से लेकर 715 रुपये तक दर्शाया गया। यानी सामान्य कंज्यूमेबल्स पर भी 1000 से 1500 प्रतिशत तक का मुनाफा कमाया जा रहा है।
मरीज की लाचारी और ‘इन-हाउस’ फार्मेसी का शिकंजा
अस्पताल में भर्ती किसी भी मरीज के लिए यह संभव नहीं होता कि वह डॉक्टर द्वारा लिखी गई सिरिंज, आईवी सेट, कॉटन, कैनुला, ग्लव्स या कैथेटर की बाजार में जाकर कीमतें मिलाए। अधिकांश निजी अस्पतालों में सख्त नियम बना दिए जाते हैं कि दवा और मेडिकल सामान केवल अस्पताल के अंदर स्थित इन-हाउस मेडिकल स्टोर से ही खरीदे जाएंगे।
बाहर से दवाई या सर्जिकल आइटम लाने पर रोक या डॉक्टरों द्वारा उन्हें स्वीकार न करने की नीति मरीज और उसके परिजनों को पूरी तरह लाचार बना देती है। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर अस्पताल उन उत्पादों पर अत्यधिक मुनाफा कमाते हैं, जो किसी सरकारी मूल्य नियंत्रण सूची में शामिल नहीं हैं।
एमआरपी नहीं, ‘वास्तविक खरीद मूल्य’ बनेगा कसौटी
सूत्रों के अनुसार, सरकार इस बार केवल उत्पाद पर छपी ‘अधिकतम खुदरा कीमत’ (एमआरपी) को मानक नहीं मानने जा रही है। दरअसल, अस्पताल अक्सर निर्माताओं से मिलीभगत करके पैकेजिंग पर कृत्रिम रूप से अत्यधिक एमआरपी छपवा लेते हैं, ताकि कानूनन इसे सही ठहराया जा सके। यही वजह है कि मंत्रालय अब अस्पतालों के वास्तविक खरीद इनवॉइस और मरीज को दिए जाने वाले बिल के बीच के अंतर को जांच का मुख्य आधार बना रहा है। इस अंतर का वैज्ञानिक व वित्तीय मूल्यांकन कर यह तय किया जाएगा कि ‘ट्रेड मार्जिन’ की सीमा क्या होनी चाहिए, जिससे मुनाफाखोरी पर स्थायी लगाम कसी जा सके।
अस्पतालों की दलील और सरकार का रुख
दूसरी ओर, अस्पताल संघों और निजी स्वास्थ्य सेवा संचालकों का तर्क है कि खरीद मूल्य और बिलिंग के बीच के अंतर को शुद्ध मुनाफा नहीं कहा जा सकता। उनका कहना है कि अस्पतालों को 24 घंटे बिजली, वातानुकूलन, स्टरलाइजेशन, बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन, संक्रमण नियंत्रण, विशेष कोल्ड-चेन स्टोरेज और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ का भारी खर्च उठाना पड़ता है, जिसका भार इन सेवाओं पर पड़ता है।
हालांकि, सरकार का स्पष्ट मानना है कि परिचालन लागत के नाम पर बुनियादी जीवनरक्षक सामानों पर 800 से 1500 फीसदी तक का मुनाफा किसी भी सूरत में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
ट्रेड मार्जिन युक्तिकरण (TMR) से मिलेगी आम जनता को राहत
महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में सामने आई शिकायतों के बाद केंद्र सरकार अब सभी प्रमुख हितधारकों, चिकित्सा विशेषज्ञों और नियामक संस्थाओं के साथ परामर्श प्रक्रिया तेज कर चुकी है। उम्मीद की जा रही है कि इस समीक्षा के निष्कर्षों के आधार पर सरकार मेडिकल डिवाइसेज और सभी प्रकार के कंज्यूमेबल्स पर ट्रेड मार्जिन की अधिकतम सीमा तय करने के लिए सख्त गाइडलाइंस जारी करेगी। यदि यह नीति लागू होती है, तो निजी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के कुल मेडिकल खर्च में 30 से 40 फीसदी तक की सीधी कमी आ सकती है।






