
संवाद 24 नई दिल्ली। देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के बड़े टेक हब तेजी से विस्तार कर रहे हैं। हालांकि, इस बुनियादी ढांचे के विस्तार को अब स्थानीय स्तर पर कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र के ठाणे और आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम (विजाग) में प्रस्तावित नए डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स के खिलाफ स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इन अति-आधुनिक परियोजनाओं से क्षेत्र में पानी, बिजली और भूमि संसाधनों पर भारी दबाव पड़ेगा।
प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और पर्यावरणीय प्रभाव पर उठीं उंगलियां
ठाणे और विशाखापत्तनम में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान नागरिकों ने चिंता जताई है कि डेटा सेंटरों को चौबीसों घंटे चालू रखने और उनके सर्वरों को ठंडा (कूलिंग) रखने के लिए भारी मात्रा में पानी और बिजली की आवश्यकता होती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि पहले से ही कई इलाकों में पीने के पानी और बिजली की किल्लत बनी रहती है, ऐसे में अगर विशालकाय डेटा सेंटर स्थापित किए गए तो आम जनता को बुनियादी सुविधाओं के संकट का सामना करना पड़ेगा। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी चेतावनी दी है कि भूमि के अंधाधुंध उपयोग और अत्यधिक ऊर्जा खपत से स्थानीय पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) पर गंभीर असर पड़ेगा।
कंपनियों का दावा: उन्नत कूलिंग तकनीकों से कम होगा संसाधनों का उपयोग
दूसरी ओर, परियोजना से जुड़ी टेक कंपनियों का तर्क है कि इन चिंताओं को ध्यान में रखते हुए आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल डिजाइन तैयार किए गए हैं। कंपनियों के अनुसार, सर्वरों को ठंडा रखने के लिए पारंपरिक तरीकों के बजाय उन्नत कूलिंग तकनीकों (जैसे लिक्विड कूलिंग और क्लोज्ड-लूप वॉटर सिस्टम) का उपयोग किया जाएगा। टेक कंपनियों ने दावा किया है कि ये तकनीकें जल और बिजली की खपत को न्यूनतम स्तर पर ले आएंगी और स्थानीय संसाधनों पर इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, कंपनियों के इन आश्वासनों के बावजूद स्थानीय नागरिक परियोजनाओं के निर्माण पर पूरी तरह से रोक लगाने या उन्हें रिहायशी क्षेत्रों से दूर स्थानांतरित करने की मांग पर अड़े हुए हैं।






