
संवाद 24 नई दिल्ली । बच्चों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए ऑस्ट्रेलिया द्वारा लागू किया गया 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका है। सरकार का कहना है कि कई बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां नियमों का प्रभावी ढंग से पालन नहीं कर रही हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में बच्चे अब भी विभिन्न मंचों का उपयोग कर रहे हैं। इस स्थिति के बाद सरकार ने कंपनियों के खिलाफ और कड़े कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है।
कानून लागू, लेकिन असर सीमित
ऑस्ट्रेलिया ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त नियम लागू किए थे। हालांकि हालिया अध्ययनों और सरकारी समीक्षा में सामने आया कि अधिकांश किशोर गलत आयु दर्ज कर या अन्य तकनीकी तरीकों से इन प्रतिबंधों को पार कर रहे हैं। इससे कानून की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।
सरकार ने टेक कंपनियों को ठहराया जिम्मेदार
प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ की सरकार का कहना है कि सोशल मीडिया कंपनियां आयु सत्यापन को लेकर पर्याप्त प्रयास नहीं कर रही हैं। सरकार के अनुसार कई मंचों पर नाबालिगों के खाते अब भी सक्रिय हैं। इसी वजह से कंपनियों पर लगने वाले अधिकतम जुर्माने को दोगुना करने और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत बनाने का निर्णय लिया गया है।
जांच एजेंसी को मिले अधिक अधिकार
सरकार ने ऑनलाइन सुरक्षा आयुक्त को अतिरिक्त अधिकार देने की भी घोषणा की है। अब आवश्यकता पड़ने पर सोशल मीडिया कंपनियों से आयु सत्यापन से जुड़े दस्तावेज और रिकॉर्ड मांगे जा सकेंगे। यदि किसी कंपनी की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई और भारी आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।
दुनिया की नजर ऑस्ट्रेलिया के मॉडल पर
ऑस्ट्रेलिया का यह कानून दुनिया के कई देशों के लिए एक उदाहरण माना जा रहा है। हालांकि शुरुआती अनुभव यह बता रहे हैं कि केवल प्रतिबंध लगाना पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रभावी आयु सत्यापन तकनीक, डिजिटल शिक्षा और अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी के बिना बच्चों को ऑनलाइन जोखिमों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं किया जा सकता।
सरकार का संदेश साफ
ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने स्पष्ट किया है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। यदि सोशल मीडिया कंपनियां नियमों का पालन नहीं करतीं तो उनके खिलाफ और सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सरकार का मानना है कि तकनीकी कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना इस कानून का उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सकता।






