
संवाद 24 बिहार । सियासत में अक्सर ऐसे मोड़ आते हैं जो न केवल चर्चा का विषय बनते हैं, बल्कि भविष्य की राजनीति की नई इबारत भी लिखते हैं। हाल ही में बिहार विधानसभा के गलियारों में एक ऐसा ही दुर्लभ दृश्य देखने को मिला, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता दोनों को चौंकने पर मजबूर कर दिया। राज्यसभा की छह खाली सीटों के लिए हो रहे नामांकन के दौरान सूबे की तीन बड़ी पार्टियों के क्षत्रपों ने एक साथ पहुंचकर लोकतंत्र की उस तस्वीर को पेश किया, जहाँ वैचारिक मतभेदों के बावजूद संसदीय प्रक्रियाओं का सम्मान सर्वोपरि होता है।
एक मंच, तीन दिग्गज और भविष्य की बिसात
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की जेडीयू, भाजपा और विपक्षी खेमे की कांग्रेस व आरजेडी के बीच तलवारें खिंची रहती हैं। लेकिन इस बार राज्यसभा नामांकन के दौरान नजारा कुछ अलग था। जेडीयू की ओर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाने वाले संजय झा, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह और आरजेडी के रणनीतिकार मनोज झा ने लगभग एक ही समय में अपने नामांकन पत्र दाखिल किए। इस दौरान सदन का माहौल किसी चुनावी रणक्षेत्र जैसा नहीं, बल्कि एक औपचारिक और गरिमामयी मिलन जैसा दिखाई दिया।
संजय झा: नीतीश के भरोसेमंद सिपाही का नया पड़ाव
संजय झा का राज्यसभा जाना जेडीयू के लिए एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। संजय झा न केवल मुख्यमंत्री के संकटमोचक रहे हैं, बल्कि दिल्ली और पटना के बीच सेतु का काम भी करते रहे हैं। उनके नामांकन के समय खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मौजूद रहे, जो यह दर्शाता है कि पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर अपनी आवाज को और बुलंद करना चाहती है।
विपक्ष की एकजुटता और मनोज झा की धार
वहीं दूसरी ओर, आरजेडी ने एक बार फिर अपने प्रखर वक्ता मनोज झा पर भरोसा जताया है। मनोज झा ने सदन में हमेशा अपनी बौद्धिक और तीखी बयानबाजी से सत्ता पक्ष को घेरा है। उनके साथ ही तेजस्वी यादव के करीबी सलाहकार संजय यादव का राज्यसभा जाना यह संकेत देता है कि लालू प्रसाद यादव अब पार्टी में नई ऊर्जा और तकनीकी समझ रखने वाले युवाओं को तरजीह दे रहे हैं। नामांकन के दौरान तेजस्वी यादव और राबड़ी देवी की मौजूदगी ने कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया।
कांग्रेस का ‘अखिलेश’ कार्ड
कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह को दोबारा मौका देकर यह साफ कर दिया है कि वह बिहार में अपने पुराने और मंझे हुए चेहरों पर ही दांव खेलना चाहती है। अखिलेश सिंह का एनडीए और महागठबंधन दोनों तरफ के नेताओं के साथ व्यक्तिगत तालमेल पार्टी के लिए भविष्य की राहें आसान बना सकता है।
सियासी मायने: दोस्ती या मजबूरी?
इस नामांकन प्रक्रिया की सबसे खास बात यह रही कि तीनों ही गठबंधन – एनडीए और महागठबंधन – ने अपने-अपने समीकरणों को साधने की कोशिश की है। जहाँ भाजपा ने भीम सिंह और धर्मशिला गुप्ता के जरिए पिछड़ा और अति-पिछड़ा कार्ड खेला है, वहीं आरजेडी ने यादव और ब्राह्मण (मनोज झा) के कॉम्बो से ‘ए टू जेड’ वाली छवि को मजबूत किया है। बिहार विधानसभा के सचिव के समक्ष जब ये दिग्गज अपनी फाइलें लेकर पहुंचे, तो बाहर समर्थकों का हुजूम ‘जिंदाबाद’ के नारों से आसमान गुंजा रहा था। यह चुनाव भले ही निर्विरोध होने की ओर बढ़ रहा हो, लेकिन इसके संदेश दूरगामी हैं। संवाद 24 के विश्लेषण के अनुसार, राज्यसभा जाने वाले ये छह चेहरे आगामी 2024 के लोकसभा चुनाव और फिर 2025 के विधानसभा चुनाव में अपनी-अपनी पार्टियों के लिए ‘थिंक टैंक’ की भूमिका निभाएंगे।






