
संवाद 24 डेस्क। सावन का महीना भगवान शिव की आराधना, जलाभिषेक और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष माना जाता है। इसी पवित्र महीने में आने वाली शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि नाग पंचमी के रूप में मनाई जाती है। नाग पंचमी केवल सर्पों की पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि भारतीय धार्मिक परंपरा में यह मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंध, जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान और पौराणिक स्मृतियों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पर्व है। वर्ष 2026 में नाग पंचमी 17 अगस्त को मनाई जा रही है। पंचांग परंपरा के अनुसार श्रावण शुक्ल पंचमी को नाग देवताओं की आराधना की जाती है।
नाग पंचमी से जुड़ी मान्यताएं भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग रूपों में दिखाई देती हैं। कहीं नाग देवता की प्रतिमा या चित्र की पूजा होती है, कहीं शिव मंदिर में नाग का पूजन किया जाता है और कहीं नागों को परिवार, कृषि तथा वर्षा की समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। इस विविधता के बावजूद पर्व का मूल भाव नागों के प्रति श्रद्धा, भय के स्थान पर सम्मान और प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व की भावना से जुड़ा हुआ है।
नाग पंचमी का सावन से क्या संबंध है?
सावन वर्षा ऋतु का महीना है। इस समय खेतों और आसपास के प्राकृतिक आवासों में पानी भरने के कारण सांपों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं और वे अपने बिलों से बाहर दिखाई दे सकते हैं। भारतीय कृषि समाज में सांपों का संबंध खेतों और अनाज की सुरक्षा से भी रहा है, क्योंकि अनेक सर्प प्रजातियां चूहों और अन्य छोटे जीवों की संख्या को नियंत्रित करने में भूमिका निभाती हैं। इस प्राकृतिक परिस्थिति और धार्मिक विश्वासों के मेल ने सावन में नाग पूजा की परंपरा को व्यापक सामाजिक आधार दिया।
धार्मिक दृष्टि से सावन भगवान शिव का प्रिय महीना माना जाता है और शिव की प्रतिमाओं में नाग का विशेष स्थान है। भगवान शिव के गले में वासुकि नाग का चित्रण भारतीय धार्मिक कला में अत्यंत प्रसिद्ध है। इस कारण सावन की शिव आराधना और नाग पूजा के बीच एक स्वाभाविक धार्मिक संबंध विकसित हुआ। नाग पंचमी इसी व्यापक शिव परंपरा का महत्वपूर्ण पर्व बन गई।
नाग केवल सर्प नहीं, भारतीय धार्मिक प्रतीक भी हैं
भारतीय परंपरा में नागों का उल्लेख केवल वास्तविक सर्पों के रूप में नहीं मिलता। नाग एक धार्मिक और पौराणिक प्रतीक भी हैं। शेषनाग को भगवान विष्णु की शय्या के रूप में और वासुकि को समुद्र मंथन से जुड़े नागराज के रूप में स्मरण किया जाता है। तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म आदि नागों का भी विभिन्न पौराणिक आख्यानों में उल्लेख मिलता है।
भगवद्गीता के दसवें अध्याय के 29वें श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं—“नागों में मैं अनंत हूं।” इस श्लोक में अनंत का उल्लेख भगवान की विभूतियों में किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि नाग भारतीय धार्मिक चिंतन में केवल भय या विष के प्रतीक नहीं रहे, बल्कि दिव्यता और ब्रह्मांडीय शक्ति के प्रतीक के रूप में भी देखे गए।
नाग पंचमी की सबसे प्रसिद्ध कथा: आस्तिक मुनि ने बचाया नागवंश
नाग पंचमी से जुड़ी प्रमुख पौराणिक परंपराओं में राजा जनमेजय के सर्पसत्र और आस्तिक मुनि की कथा विशेष महत्व रखती है। इसका विस्तृत वर्णन महाभारत के आदिपर्व के आस्तीक पर्व में मिलता है।
महाभारत के अनुसार राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई थी। अपने पिता की मृत्यु से दुखी राजा जनमेजय ने तक्षक सहित नागों के विनाश के उद्देश्य से सर्पसत्र का आयोजन किया। यज्ञ में मंत्रों के प्रभाव से अनेक नाग अग्नि में गिरने लगे। नागवंश के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया।
इसी समय आस्तिक मुनि वहां पहुंचे। उन्होंने राजा जनमेजय से वर मांगा और नागों की रक्षा की। महाभारत के आस्तीक पर्व में वर्णित कथा के अनुसार आस्तिक के हस्तक्षेप से नागों का विनाश रुक गया और तक्षक भी बच गया।
इसी कथा को नाग पूजा की परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है। कथा का सांस्कृतिक संदेश भी महत्वपूर्ण है—प्रतिशोध और विनाश के स्थान पर संतुलन, करुणा और जीवन की रक्षा। यही वजह है कि नाग पंचमी को केवल पूजा-पाठ की तिथि न मानकर जीवों के प्रति सह-अस्तित्व की भारतीय अवधारणा से भी जोड़कर देखा जा सकता है।
श्रीकृष्ण और कालिया नाग की कथा से भी जुड़ी है नाग आराधना
नाग पंचमी से जुड़ी दूसरी लोकप्रिय परंपरा श्रीकृष्ण और कालिया नाग की कथा है। भागवत परंपरा में वर्णित कथा के अनुसार यमुना नदी के एक हिस्से में कालिया नाग का प्रभाव था। उसके विष के कारण वहां का जल और वातावरण दूषित माना गया। बाल कृष्ण ने कालिया के फनों पर नृत्य करके उसके अहंकार का दमन किया और उसे यमुना छोड़कर दूसरे स्थान पर जाने का निर्देश दिया।
इस कथा में नाग का विनाश ही अंतिम उद्देश्य नहीं है। कालिया को जीवनदान मिलता है और उसे अपने लिए उपयुक्त स्थान पर जाने का आदेश दिया जाता है। इस दृष्टि से कथा को प्रकृति के संतुलन और मनुष्य तथा जीव-जगत के बीच सीमा और सह-अस्तित्व के प्रतीक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। नाग पंचमी की लोकपरंपराओं में कृष्ण और कालिया प्रसंग का उल्लेख इसी कारण महत्वपूर्ण माना जाता है। नाग पंचमी के साथ कालिया दमन की परंपरा का संबंध विभिन्न भारतीय क्षेत्रों में लंबे समय से बताया जाता रहा है।
भगवान शिव और नागों का संबंध इतना गहरा क्यों है?
नाग पंचमी का सबसे मजबूत धार्मिक संबंध भगवान शिव से दिखाई देता है। शिव के गले में नाग का होना भारतीय धार्मिक प्रतीकवाद का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। शिव के लिए नाग केवल आभूषण नहीं, बल्कि भय पर नियंत्रण, मृत्यु पर विजय और प्रकृति की शक्तियों को स्वीकार करने का प्रतीक भी माना जाता है।
सर्प का विष विनाशकारी हो सकता है, लेकिन वही सर्प प्रकृति की खाद्य-श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। शिव के गले में विषधर का होना इस विरोधाभास को एक आध्यात्मिक प्रतीक में बदल देता है—विनाशकारी शक्ति भी संयम और नियंत्रण के अधीन हो सकती है। सावन में शिव पूजा के साथ नाग पंचमी का पड़ना इसी सांस्कृतिक प्रतीकवाद को और मजबूत करता है।
नाग पंचमी पर किन नागों की पूजा की जाती है?
नाग पंचमी की पूजा में विभिन्न परंपराओं के अनुसार नाग देवताओं के अलग-अलग नाम लिए जाते हैं। अनंत, वासुकि, शेष, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखपाल और कालिय जैसे नाम धार्मिक परंपराओं में मिलते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की सूची और विधि अलग हो सकती है, इसलिए किसी एक सूची को पूरे भारत में समान मानना उचित नहीं होगा।
पंचांग परंपरा में नाग पंचमी के दिन कई स्थानों पर बारह नाग देवताओं की पूजा का उल्लेख मिलता है। इसका उद्देश्य किसी एक वास्तविक सर्प प्रजाति की पूजा से अधिक नाग-तत्व या नाग देवताओं के प्रति श्रद्धा प्रकट करना है।
घर के द्वार पर नाग का चित्र बनाने की परंपरा
भारत के कई क्षेत्रों में नाग पंचमी पर घर की दीवार, दरवाजे या पूजा स्थल पर नाग की आकृति बनाने की परंपरा रही है। कहीं हल्दी, गेरू या चंदन से नाग का चित्र बनाया जाता है तो कहीं धातु, लकड़ी या मिट्टी की नाग प्रतिमा का पूजन किया जाता है।
इस परंपरा का एक अर्थ घर और परिवार की सुरक्षा से जुड़ा है। लोकविश्वास में नाग देवता को प्रसन्न करने से सर्प भय और अनिष्ट से रक्षा की कामना की जाती है। दूसरी ओर, सांस्कृतिक दृष्टि से यह परंपरा मनुष्य को अपने आसपास मौजूद जीव-जगत की उपस्थिति का स्मरण भी कराती है।
नाग पंचमी पर दूध चढ़ाने की परंपरा और जरूरी सावधानी
नाग पंचमी के साथ दूध अर्पित करने की परंपरा कई क्षेत्रों में लोकप्रिय है। धार्मिक अनुष्ठानों में नाग देवता की प्रतिमा या चित्र पर दूध, जल, फूल, अक्षत और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। कुछ स्थानों पर जीवित सांपों को दूध पिलाने की परंपरा भी देखने को मिलती है। हालांकि यहां धार्मिक आस्था और वन्यजीव संरक्षण के बीच अंतर समझना जरूरी है।
वैज्ञानिक दृष्टि से सांपों को दूध पिलाना उचित नहीं माना जाता। सांप स्तनधारी नहीं हैं और दूध उनका प्राकृतिक आहार नहीं है। वन्यजीव विशेषज्ञों ने नाग पंचमी के अवसर पर जीवित सांपों को दूध पिलाने की प्रथा से होने वाले नुकसान के बारे में चेतावनी दी है। कुछ मामलों में सांपों को पहले भूखा या निर्जलित रखा जाता है, जिससे वे दूध पीते हुए दिखाई दे सकते हैं। इससे उनके स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है।
इसलिए धार्मिक भावना को बनाए रखते हुए नाग देवता की प्रतिमा, चित्र या शिवलिंग पर प्रतीकात्मक रूप से दूध और जल अर्पित करना अधिक सुरक्षित विकल्प है। जीवित सांपों को पकड़ना, उनके साथ प्रदर्शन करना या उन्हें जबरन कुछ खिलाना धार्मिक पर्व की भावना के अनुरूप भी नहीं माना जाना चाहिए।
क्या नाग पंचमी का संबंध प्रकृति संरक्षण से भी है?
नाग पंचमी की सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक व्याख्याओं में से एक इसका प्रकृति संरक्षण से संबंध है। भारतीय समाज ने लंबे समय से कई जीवों को धार्मिक प्रतीकों के रूप में सम्मान दिया है। नाग पूजा इसी परंपरा का एक उदाहरण है। जब किसी जीव को देवता या धार्मिक प्रतीक का दर्जा मिलता है, तो उसके प्रति समाज में भय के साथ-साथ संरक्षण की भावना भी पैदा हो सकती है।
सांप पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई सर्प प्रजातियां चूहों और अन्य कृंतकों की संख्या को नियंत्रित करती हैं। कृषि क्षेत्रों में यह भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। इसलिए सांपों के प्रति अंधभय कम करना और उनके प्राकृतिक महत्व को समझना पर्यावरणीय दृष्टि से उपयोगी है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि हर सांप को पकड़कर घर में पूजा जाए। वास्तविक संरक्षण का अर्थ है उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहने देना और मानव-सर्प संघर्ष की स्थिति में प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम या वन विभाग की सहायता लेना।
नाग पंचमी पर सांप पकड़ना क्यों नहीं होना चाहिए?
नाग पंचमी के आसपास कुछ क्षेत्रों में सपेरों द्वारा सांपों को पकड़कर सार्वजनिक प्रदर्शन करने की घटनाएं सामने आती रही हैं। वन्यजीव अधिकारियों और संरक्षण समूहों ने ऐसे मामलों में सांपों को कैद में रखने, उनके साथ क्रूर व्यवहार करने और उन्हें जबरन दूध पिलाने जैसी गतिविधियों पर चिंता जताई है। 2026 में भी नाग पंचमी से पहले हैदराबाद में वन्यजीव अधिकारियों द्वारा सपेरों से सांपों को बचाने की कार्रवाई की खबर सामने आई।
भारत में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 लागू है। कानून की विभिन्न अनुसूचियों में कई सर्प प्रजातियों को संरक्षण प्राप्त है। आधिकारिक India Code में भारतीय कोबरा, किंग कोबरा, अजगर और कई अन्य सर्प समूहों का उल्लेख संरक्षित वन्यजीवों की सूची में किया गया है।
इसलिए नाग पंचमी पर आस्था के नाम पर किसी जंगली सांप को पकड़ना या उसके साथ प्रदर्शन करना उचित नहीं है। पर्व का मूल संदेश जीव की पूजा और सम्मान है, उसका शोषण नहीं।
नाग पंचमी पर पूजा कैसे की जाती है?
नाग पंचमी की पूजा विधि क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। सामान्य रूप से श्रद्धालु स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूजा स्थल पर नाग देवता की प्रतिमा, चित्र या प्रतीक स्थापित करते हैं। इसके बाद जल, दूध, अक्षत, रोली, पुष्प और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। भगवान शिव की पूजा के साथ नाग देवता का स्मरण भी किया जाता है।
कई परिवार इस दिन व्रत या संयम का पालन करते हैं। कुछ क्षेत्रों में महिलाएं परिवार, विशेषकर भाइयों और संतान की सुख-समृद्धि तथा सुरक्षा की कामना से पूजा करती हैं। पूजा के बाद नाग देवता से परिवार की रक्षा और सभी जीवों के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि पूजा की कोई एक विधि पूरे भारत में अनिवार्य नहीं है। स्थानीय परंपराओं, कुलाचार और क्षेत्रीय रीति के अनुसार विधि में अंतर स्वाभाविक है।
नाग पंचमी पर क्या नहीं करना चाहिए?
नाग पंचमी की धार्मिक भावना को देखते हुए कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना उपयोगी है। जीवित सांपों को पकड़कर पूजा करने या उनके साथ फोटो और प्रदर्शन के लिए छेड़छाड़ करने से बचना चाहिए। सांप को दूध या अन्य मानव खाद्य पदार्थ जबरन नहीं देना चाहिए। किसी भी सर्प को मारना या घायल करना उचित नहीं है।
यदि घर में सांप दिखाई दे तो उसे घेरने या मारने के बजाय स्थानीय वन विभाग अथवा प्रशिक्षित सर्प-रक्षक की सहायता लेना बेहतर है। सांपों के बारे में फैली हर लोकमान्यता को वैज्ञानिक तथ्य मान लेना भी उचित नहीं है। धार्मिक आस्था के साथ वैज्ञानिक जागरूकता का संतुलन ही इस पर्व को अधिक सार्थक बना सकता है।
नाग पंचमी और खेती-किसानी का पुराना रिश्ता
भारतीय ग्रामीण जीवन में नाग पूजा का संबंध कृषि से भी जोड़ा जाता है। वर्षा ऋतु में खेतों में सर्पों की मौजूदगी बढ़ सकती है और किसान उनके व्यवहार से परिचित रहे हैं। खेतों में पाए जाने वाले कई सांप मनुष्यों के लिए हानिकारक नहीं होते और वे चूहों की संख्या को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
इसीलिए नाग को केवल विष और भय का प्रतीक मानना अधूरा दृष्टिकोण है। ग्रामीण समाज में सांप प्रकृति के एक ऐसे जीव के रूप में भी देखे गए जिनका अपना स्थान है। नाग पंचमी की धार्मिक परंपरा इस व्यापक लोकज्ञान की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में भी समझी जा सकती है।
नाग पंचमी का आध्यात्मिक संदेश क्या है?
नाग पंचमी का आध्यात्मिक संदेश केवल नाग देवता को प्रसन्न करने तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य को अपने भीतर मौजूद भय, क्रोध और अहंकार पर नियंत्रण की प्रेरणा भी देता है। सर्प भारतीय प्रतीकवाद में शक्ति, रहस्य, ऊर्जा और परिवर्तन से जुड़ा रहा है।
योग परंपरा में कुंडलिनी को सर्पाकार ऊर्जा के रूप में चित्रित किया जाता है। हालांकि कुंडलिनी की अवधारणा को नाग पंचमी के धार्मिक अनुष्ठान का वैज्ञानिक तथ्य मानना उचित नहीं होगा, लेकिन सांस्कृतिक स्तर पर दोनों में सर्प के माध्यम से ऊर्जा और चेतना का प्रतीकात्मक संबंध दिखाई देता है।
इस दृष्टि से नाग पंचमी बाहरी पूजा के साथ आंतरिक अनुशासन का भी पर्व बन सकती है—भय को समझने, प्रकृति का सम्मान करने और जीवन के प्रति संवेदनशील बनने का अवसर।
बदलते समय में नाग पंचमी का नया अर्थ
आज नाग पंचमी ऐसे समय में आती है जब वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता को लेकर जागरूकता पहले से अधिक जरूरी है। शहरों के विस्तार, प्राकृतिक आवासों में बदलाव और मानव-सर्प संघर्ष के कारण सांपों के संरक्षण की आवश्यकता बढ़ी है।
ऐसे में नाग पंचमी को केवल परंपरागत पूजा तक सीमित रखने के बजाय इसे सर्प संरक्षण और प्रकृति सम्मान से जोड़ना समय की जरूरत है। मंदिरों और धार्मिक संस्थानों के स्तर पर भी लोगों को यह संदेश दिया जा सकता है कि नाग देवता की पूजा का अर्थ जीवित सांप को पकड़ना नहीं है। सांप को उसके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहने देना भी एक तरह से प्रकृति की पूजा है।
आस्था और विज्ञान का संतुलन ही पर्व की सार्थकता
नाग पंचमी भारतीय संस्कृति की उन परंपराओं में से है जिनमें धार्मिक आस्था, पौराणिक कथा, लोकजीवन और प्रकृति एक साथ दिखाई देते हैं। महाभारत में आस्तिक द्वारा नागों की रक्षा की कथा हो, भगवान कृष्ण और कालिया का प्रसंग हो या भगवान शिव के गले में नाग का प्रतीक—इन सभी परंपराओं में नाग का स्थान केवल भय पैदा करने वाले जीव का नहीं है।
आधुनिक समय में इस पर्व की सबसे सकारात्मक व्याख्या यही हो सकती है कि श्रद्धा के साथ विवेक भी जुड़ा रहे। नाग देवता की पूजा की जाए, लेकिन जीवित सांपों को नुकसान न पहुंचाया जाए। दूध और अन्य पूजन सामग्री का प्रतीकात्मक उपयोग किया जाए, लेकिन सांपों को जबरन दूध न पिलाया जाए। धार्मिक कथा को सम्मान दिया जाए, लेकिन उसे वैज्ञानिक तथ्य से अलग पहचानने की समझ भी विकसित की जाए।
नाग पंचमी सिर्फ पूजा नहीं, प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी
सावन की नाग पंचमी भारतीय संस्कृति में प्रकृति और आध्यात्मिकता के बीच बने उस पुराने संबंध की याद दिलाती है, जिसमें पेड़-पौधे, नदियां, पर्वत और जीव-जंतु केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन-व्यवस्था के हिस्से माने गए। नाग देवता की पूजा इसी सांस्कृतिक दृष्टि का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
नाग पंचमी की कथाओं में संरक्षण का संदेश स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकता है। महाभारत की आस्तिक कथा में नागों को विनाश से बचाया जाता है और आधुनिक पर्यावरणीय दृष्टि भी यही कहती है कि सर्प पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। इसलिए आज नाग पंचमी का वास्तविक महत्व इस बात में भी है कि हम नागों के प्रति अंधभय के बजाय जागरूकता पैदा करें और उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहने दें।
श्रद्धा से नाग देवता की पूजा कीजिए, भगवान शिव का स्मरण कीजिए और परिवार के मंगल की कामना कीजिए, लेकिन साथ ही यह संकल्प भी लें कि किसी जीव को केवल धार्मिक परंपरा के नाम पर कष्ट नहीं पहुंचाएंगे। यही सावन की नाग पंचमी को परंपरा से आधुनिक संवेदनशीलता तक जोड़ने वाला सबसे सार्थक संदेश हो सकता है।






