9 मंजिला गोपुरम और छत पर अद्भुत चित्रकारी, तुंगभद्रा किनारे बसे इस प्राचीन मंदिर की कहानी है बेहद खास

संवाद 24 डेस्क। कर्नाटक के हम्पी में तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी तट पर स्थित श्री विरूपाक्ष मंदिर भारतीय स्थापत्य, धर्म, कला और इतिहास का ऐसा संगम है, जहां पत्थरों में सदियों पुरानी सभ्यता आज भी जीवित दिखाई देती है। दूर से दिखाई देने वाला करीब 50 से 52 मीटर ऊंचा नौ-मंजिला पूर्वी गोपुरम इस मंदिर की सबसे पहचानने योग्य विशेषताओं में शामिल है। लेकिन मंदिर की वास्तविक कहानी केवल इस विशाल प्रवेश द्वार तक सीमित नहीं है। इसके भीतर बने मंडप, पत्थर के स्तंभ, शिल्प, उप-मंदिर और विशेष रूप से मंडप की छत पर दिखाई देने वाले भित्तिचित्र इसे भारतीय कला इतिहास की महत्वपूर्ण धरोहर बनाते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार मंदिर परिसर का विस्तार कई ऐतिहासिक चरणों में हुआ और विजयनगर काल में इसका स्वरूप अत्यंत भव्य हो गया।

तुंगभद्रा के किनारे क्यों बसा है यह मंदिर?
विरूपाक्ष मंदिर हम्पी के उस पवित्र भू-दृश्य का हिस्सा है जिसमें तुंगभद्रा नदी, हेमकूट पहाड़ी और प्राचीन मंदिरों का समूह एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। यह मंदिर तुंगभद्रा के दक्षिणी तट पर, हेमकूट पहाड़ी के निकट स्थित है। प्राचीन परंपरा में इस क्षेत्र का संबंध पम्पा से जोड़ा जाता है और विरूपाक्ष को पम्पापति यानी पम्पा के पति के रूप में पूजा जाता है। कर्नाटक पर्यटन के अनुसार यहां भगवान शिव के विरूपाक्ष रूप की आराधना होती है और मंदिर परिसर में पम्पा तथा अन्य देवी-देवताओं से जुड़े धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं।
हम्पी की पहचान आज भले ही विजयनगर साम्राज्य के खंडहरों से होती हो, लेकिन विरूपाक्ष मंदिर की धार्मिक परंपरा उस साम्राज्य से भी पुरानी है। यही कारण है कि हम्पी के अनेक स्मारकों के विपरीत यह मंदिर केवल पुरातात्विक अवशेष नहीं है, बल्कि आज भी सक्रिय पूजा का केंद्र है। यूनेस्को से संबंधित संरक्षण दस्तावेजों में भी विरूपाक्ष को विजयनगर राजाओं के आराध्य देवता से जुड़े मंदिर के रूप में दर्ज किया गया है।

नौ मंजिला गोपुरम देखकर ठहर जाती है नजर
मंदिर में प्रवेश करते ही सबसे पहले जिस स्थापत्य चमत्कार पर नजर जाती है, वह इसका विशाल पूर्वी गोपुरम है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के हम्पी सर्किल के अनुसार यह पूर्वी गोपुरम नौ मंजिला है और इसकी ऊंचाई करीब 52 मीटर है। इसकी निचली संरचना पत्थर की है, जबकि ऊपरी भाग ईंट और अन्य निर्माण सामग्री से बना है। कर्नाटक पर्यटन इसकी ऊंचाई लगभग 50 मीटर बताता है। इस मामूली अंतर का कारण अलग-अलग माप या स्रोतों की गणना हो सकती है, लेकिन दोनों स्रोत इसकी विशालता और नौ-स्तरीय संरचना की पुष्टि करते हैं।
गोपुरम केवल मंदिर का प्रवेश द्वार नहीं है। दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला में यह धार्मिक परिसर की भव्य पहचान और दूर से दिखाई देने वाला स्थापत्य संकेत भी रहा है। विरूपाक्ष मंदिर का पूर्वी गोपुरम इसी परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी विभिन्न मंजिलों पर देवी-देवताओं और अन्य अलंकरणात्मक आकृतियों का विस्तृत शिल्प दिखाई देता है। समय के साथ कई हिस्सों को संरक्षण और मरम्मत की आवश्यकता पड़ी, लेकिन इसकी मूल स्थापत्य भव्यता आज भी हम्पी के परिदृश्य पर हावी दिखाई देती है।

क्या गोपुरम कृष्णदेवराय ने बनवाया था?
विरूपाक्ष मंदिर के इतिहास में कृष्णदेवराय का नाम विशेष महत्व रखता है, लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य को समझना जरूरी है। लोकप्रिय विवरणों में कभी-कभी पूरे विशाल पूर्वी गोपुरम को कृष्णदेवराय की रचना बताया जाता है, जबकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के विवरण में इसके निर्माण और मरम्मत को अधिक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में दर्ज किया गया है।
एएसआई के अनुसार बड़े पूर्वी गोपुरम के निर्माण का संबंध देव राय द्वितीय के काल से जोड़ा जा सकता है और बाद में कृष्णदेवराय ने 1510 ईस्वी के आसपास इसकी मरम्मत कराई। यानी कृष्णदेवराय ने मंदिर के इस महत्वपूर्ण हिस्से के विकास में योगदान दिया, लेकिन इसे पूरी तरह उनके द्वारा पहली बार निर्मित संरचना कहना ऐतिहासिक रूप से अधिक सरल व्याख्या होगी।
यही इतिहास की खूबसूरती है—एक स्मारक किसी एक राजा या एक काल की देन नहीं होता। विरूपाक्ष मंदिर कई शताब्दियों में विकसित हुआ और अलग-अलग शासकों, कलाकारों तथा धार्मिक परंपराओं ने इसे वर्तमान रूप देने में योगदान दिया।

मंदिर की असली खूबसूरती भीतर छिपी है
गोपुरम जितना प्रभावशाली है, मंदिर का अंदरूनी परिसर उससे कम अद्भुत नहीं। एएसआई के अनुसार मंदिर परिसर लंबाकार घेरे में विभाजित है और इसमें बाहरी तथा आंतरिक प्रांगण हैं। मुख्य पूर्वी गोपुरम से बाहरी प्रांगण में प्रवेश होता है, जबकि एक छोटा आंतरिक पूर्वी गोपुरम मुख्य मंदिर वाले हिस्से तक ले जाता है। इस परिसर में अनेक छोटे मंदिर, मंडप और स्तंभयुक्त गलियारे मौजूद हैं।
मुख्य गर्भगृह में विरूपाक्ष शिवलिंग प्रतिष्ठित है। इसके सामने अंतराल, अर्धमंडप और विशाल रंगमंडप का क्रम मिलता है। यही रंगमंडप मंदिर की कला और स्थापत्य का ऐसा हिस्सा है जहां स्तंभों की जटिल शिल्पकारी और छत की चित्रकला विशेष ध्यान आकर्षित करती है। एएसआई के अनुसार यह अत्यंत अलंकृत मंडप विजयनगर स्थापत्य की महत्वपूर्ण कृति है और कृष्णदेवराय के समय लगभग 1510 ईस्वी में इसका निर्माण कराया गया था।

कृष्णदेवराय और 1510 का वह दौर
विजयनगर साम्राज्य के इतिहास में कृष्णदेवराय का शासन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और विरूपाक्ष मंदिर में उनके संरक्षण की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। मंदिर के रंगमंडप का निर्माण लगभग 1510 ईस्वी में उनके आदेश से कराया गया था। एएसआई के विवरण में इसे पांच-खंडीय मंडप बताया गया है, जिसमें विभिन्न प्रकार के संयुक्त स्तंभ हैं। इन स्तंभों पर याली, मकर और सवारों जैसी आकृतियों का शिल्प दिखाई देता है।
मंडप केवल पूजा के लिए नहीं थे। विजयनगर मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ संगीत, नृत्य, नाट्य और देवताओं के विवाह जैसे समारोहों के लिए भी मंडपों का उपयोग होता था। विरूपाक्ष मंदिर का विशाल रंगमंडप इसी बहुआयामी मंदिर संस्कृति की याद दिलाता है, जहां वास्तुकला धार्मिक जीवन और राजकीय संरक्षण के साथ जुड़ी हुई थी।

छत पर ऐसी चित्रकारी कि नजर हटाना मुश्किल
विरूपाक्ष मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण कलात्मक विशेषताओं में से एक इसके मंडप की छत पर मौजूद चित्र हैं। यहां एक जरूरी तथ्य स्पष्ट करना चाहिए—इन चित्रों को मंदिर की बाहरी छत पर बनी चित्रकारी समझना सही नहीं होगा। ये मुख्य रूप से रंगमंडप/महामंडप की आंतरिक छत पर बने भित्तिचित्र हैं। यूनेस्को के संरक्षण दस्तावेज में भी रंगमंडप की छत पर मौजूद विजयनगर कालीन चित्रों को मंदिर परिसर की प्रमुख विशेषताओं में शामिल किया गया है।
इन चित्रों में धार्मिक कथाओं और देवी-देवताओं से जुड़े प्रसंगों को चित्रित किया गया है। Google Arts & Culture में संरक्षित विवरण के अनुसार रंगमंडप की छत के चित्रों में विद्यारण्य की शोभायात्रा, अर्जुन द्वारा मत्स्य-वेध, दशावतार, दिक्पाल और शिव से जुड़े विभिन्न रूपों जैसे विषय दिखाई देते हैं। इन चित्रों को विजयनगर चित्रकला परंपरा के महत्वपूर्ण अवशेषों में गिना जाता है।

शिव-पार्वती विवाह की कहानी भी चित्रों में
मंदिर के चित्रों में शिव और पम्पा के विवाह से जुड़ा प्रसंग विशेष आकर्षण का विषय है। इसे कई स्रोतों में ‘गिरिजा कल्याण’ या पम्पा-विरूपाक्ष विवाह के रूप में संदर्भित किया गया है। डिजिटल हम्पी के शोध दस्तावेज में रंगमंडप की छत पर मौजूद ‘गिरिजा कल्याण’ चित्र का विस्तृत अध्ययन किया गया है। इसमें पम्पा या पम्पाम्बिका और विरूपाक्ष के विवाह की धार्मिक कथा को चित्रित किया गया है।
हालांकि यहां इतिहास और लोकप्रिय धारणा के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। लंबे समय तक इन चित्रों को कृष्णदेवराय द्वारा बनवाए गए मंडप के समय यानी 15वीं-16वीं शताब्दी से जोड़कर देखा जाता रहा। बाद के कला-ऐतिहासिक अध्ययनों ने चित्रों की तिथि पर पुनर्विचार किया है। डिजिटल हम्पी के शोध में ए.एल. डालापिचोला के अध्ययन का उल्लेख करते हुए चित्रों को बाद की अवधि, विशेषकर 18वीं-19वीं शताब्दी के संदर्भ में रखने का मत भी दर्ज है। इसलिए इन चित्रों की तारीख को लेकर विद्वानों में पूर्ण एकराय मान लेना उचित नहीं होगा।

पत्थरों पर याली और मकर की जीवंत दुनिया
विरूपाक्ष मंदिर के रंगमंडप में केवल चित्र ही आकर्षण नहीं हैं। यहां के स्तंभ अपने आप में शिल्पकला की पाठशाला हैं। एएसआई के अनुसार केंद्रीय हिस्से के 16 स्तंभों पर उछलते हुए याली, उनके मुंह से लटकती जंजीरें, नीचे मकर और उनकी पीठ पर सवार जैसी आकृतियां दिखाई देती हैं।
दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला में याली एक काल्पनिक या पौराणिक प्राणी के रूप में बार-बार दिखाई देता है। कलाकारों ने इसे केवल सजावट के लिए नहीं, बल्कि स्तंभों को गतिशील और शक्तिशाली दृश्य प्रभाव देने के लिए भी इस्तेमाल किया। विरूपाक्ष मंदिर में इन आकृतियों की संरचना और पत्थर पर की गई बारीक कारीगरी विजयनगर शिल्प परंपरा की परिपक्वता को दर्शाती है।

मंदिर की दीवार पर दिखती है उल्टी छाया, क्या है रहस्य?
विरूपाक्ष मंदिर से जुड़ी एक और दिलचस्प विशेषता इसका प्रकाशीय प्रभाव है। कर्नाटक पर्यटन के अनुसार मुख्य गोपुरम की उल्टी छाया मंदिर के भीतर एक दीवार पर दिखाई देती है। इसे देखने के लिए उचित स्थान और परिस्थिति जानना जरूरी होता है।
यह प्रभाव आधुनिक कैमरा ऑब्स्क्यूरा के सिद्धांत से मिलता-जुलता है। किसी छोटे छिद्र से होकर बाहर से आने वाला प्रकाश सामने की सतह पर उल्टी छवि बना सकता है। इसे देखकर अक्सर यह सवाल उठता है कि प्राचीन वास्तुकारों को प्रकाश और ज्यामिति की कितनी गहरी समझ रही होगी। हालांकि किसी विशेष ऐतिहासिक दावे को प्रमाणित करने के लिए केवल इस प्रकाशीय प्रभाव को आधुनिक कैमरा तकनीक का सीधा पूर्वज कहना उचित नहीं होगा। इतना जरूर है कि मंदिर की वास्तु-रचना में प्रकाश और स्थान के संबंध का यह प्रभाव आज भी आगंतुकों को आकर्षित करता है।

तुंगभद्रा और पम्पा की कथा से जुड़ा धार्मिक संसार
विरूपाक्ष मंदिर को केवल स्थापत्य स्मारक मानना इसकी धार्मिक परंपरा को अधूरा समझना होगा। पम्पा और विरूपाक्ष की कथा हम्पी की धार्मिक पहचान के केंद्र में है। स्थानीय परंपरा में पम्पा का संबंध नदी और क्षेत्र की पवित्रता से जोड़ा जाता है, जबकि विरूपाक्ष को शिव के रूप में पूजा जाता है।
कर्नाटक पर्यटन के अनुसार विरूपाक्ष मंदिर के मुख्य देवता विरूपाक्ष हैं, जिन्हें पम्पापति भी कहा जाता है। मंदिर परिसर में पम्पा और अन्य देवी-देवताओं से जुड़े स्थल भी मौजूद हैं। इस तरह नदी, पहाड़ी और मंदिर एक साझा धार्मिक भूगोल का निर्माण करते हैं।

विजयनगर साम्राज्य से पहले भी था यहां धार्मिक केंद्र
विरूपाक्ष मंदिर का इतिहास विजयनगर साम्राज्य के उदय के साथ शुरू नहीं होता। कर्नाटक पर्यटन इसे सातवीं शताब्दी से जुड़ा मंदिर बताता है, जबकि एएसआई के विवरण और कला-इतिहास संबंधी अध्ययनों में इसके विकास के कई चरणों का उल्लेख मिलता है। उपलब्ध शिलालेखीय और स्थापत्य साक्ष्य बताते हैं कि यहां विरूपाक्ष-पम्पा परंपरा विजयनगर साम्राज्य से पहले मौजूद थी।
विजयनगर साम्राज्य के गठन के बाद इस छोटे धार्मिक केंद्र का बड़े मंदिर परिसर में विस्तार हुआ। नए मंडप, प्रांगण, उप-मंदिर, गलियारे और गोपुरम जोड़े गए। इसी दौर में विरूपाक्ष मंदिर विजयनगर की धार्मिक और राजकीय पहचान से गहराई से जुड़ गया। यूनेस्को के संरक्षण दस्तावेज में भी 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच मंदिर के विस्तार और विरूपाक्ष उपासना के बढ़ते महत्व का उल्लेख मिलता है।

1565 के बाद भी क्यों नहीं बुझी मंदिर की ज्योति?
1565 में तालीकोटा के युद्ध के बाद विजयनगर की राजधानी हम्पी को भारी विनाश का सामना करना पड़ा। आज हम्पी के विशाल क्षेत्र में फैले अधिकांश राजकीय और धार्मिक भवनों के खंडहर इसी ऐतिहासिक उथल-पुथल के बाद की स्थिति की कहानी कहते हैं। लेकिन विरूपाक्ष मंदिर की धार्मिक परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
यही इस मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। जहां आसपास के अनेक स्मारक अब पुरातात्विक संरचनाएं हैं, वहीं विरूपाक्ष आज भी सक्रिय मंदिर है। Google Arts & Culture के विवरण में इसे हम्पी का सबसे पवित्र मंदिर बताया गया है और इसके निरंतर धार्मिक महत्व को रेखांकित किया गया है।

मंदिर के आसपास था भव्य बाजार
विरूपाक्ष मंदिर का इतिहास केवल गर्भगृह और गोपुरम तक सीमित नहीं है। मंदिर के सामने फैला हम्पी बाजार भी इसके ऐतिहासिक स्वरूप का हिस्सा रहा है। Google Arts & Culture के अनुसार मंदिर का पूर्वी गोपुरम लंबे बाजार क्षेत्र की ओर खुलता है और उसके दोनों ओर प्राचीन मंडप तथा भवनों के अवशेष दिखाई देते हैं।
एएसआई के विवरण में भी मंदिर के पूर्वी हिस्से से जुड़ी लंबी बाजार सड़क और उसके किनारे बने मंडपों का उल्लेख है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि प्राचीन मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं थे। उनके आसपास बाजार, यात्रियों की गतिविधियां, धार्मिक उत्सव और सामाजिक जीवन भी विकसित होता था।

क्या है मंदिर का यूनेस्को से संबंध?
हम्पी के स्मारक समूह को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है। विरूपाक्ष मंदिर इसी व्यापक हम्पी स्मारक क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कर्नाटक पर्यटन भी हम्पी को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में प्रस्तुत करता है।
यह अंतरराष्ट्रीय मान्यता केवल किसी एक मंदिर की सुंदरता के कारण नहीं है। हम्पी में विजयनगर साम्राज्य की राजधानी से जुड़े मंदिर, राजकीय परिसर, बाजार, जल संरचनाएं, स्मारक और अन्य स्थापत्य अवशेष एक विशाल सांस्कृतिक परिदृश्य का निर्माण करते हैं। विरूपाक्ष मंदिर इस पूरे परिदृश्य में इसलिए अलग दिखाई देता है क्योंकि यहां ऐतिहासिक विरासत और जीवित धार्मिक परंपरा दोनों साथ-साथ मौजूद हैं।

गोपुरम से लेकर चित्रों तक, हर हिस्सा कहता है एक अलग कहानी
विरूपाक्ष मंदिर को यदि केवल नौ मंजिला गोपुरम के लिए देखा जाए तो इसकी आधी कहानी ही सामने आती है। गोपुरम विजयनगर स्थापत्य की भव्यता दिखाता है। पत्थर के स्तंभ उस दौर के शिल्पियों की तकनीकी और कलात्मक दक्षता बताते हैं। रंगमंडप राजकीय संरक्षण और धार्मिक समारोहों के संबंध को सामने लाता है। छत के भित्तिचित्र भारतीय चित्रकला की परंपरा और उसके लंबे विकास की कहानी कहते हैं। वहीं तुंगभद्रा का किनारा इस पूरे परिसर को प्राकृतिक और धार्मिक संदर्भ प्रदान करता है।
मंदिर की यही बहुस्तरीय पहचान इसे अन्य प्राचीन मंदिरों से अलग बनाती है। यहां इतिहास केवल किसी पुस्तक में दर्ज घटना नहीं है; वह वास्तुकला, शिल्प, चित्र, नदी, बाजार और आज भी जारी पूजा के रूप में सामने दिखाई देता है।

क्यों खास है विरूपाक्ष मंदिर?
विरूपाक्ष मंदिर की खासियत को कुछ बिंदुओं में समेटना हो तो सबसे पहले इसका जीवित धार्मिक स्वरूप सामने आता है। इसके बाद नौ-मंजिला विशाल पूर्वी गोपुरम, विजयनगर कालीन स्थापत्य, कृष्णदेवराय से जुड़े निर्माण और संरक्षण कार्य, अलंकृत रंगमंडप, स्तंभों की याली-मकर शिल्पकारी और छत के भित्तिचित्र महत्वपूर्ण हैं। इसके साथ ही तुंगभद्रा नदी और हेमकूट पहाड़ी से इसका भौगोलिक संबंध इस पूरे परिसर को विशिष्ट बनाता है।
इस मंदिर की कहानी हमें यह भी बताती है कि किसी विरासत स्थल का इतिहास हमेशा एक ही कालखंड में बंद नहीं होता। विरूपाक्ष मंदिर की परंपरा प्राचीन धार्मिक केंद्र से शुरू होकर विजयनगर साम्राज्य के भव्य संरक्षण तक पहुंचती है, फिर ऐतिहासिक विनाश के दौर से गुजरती है और आज भी पूजा-अर्चना के रूप में जीवित रहती है।

खंडहरों के बीच जीवित आस्था का अद्भुत प्रतीक
तुंगभद्रा के किनारे खड़ा विरूपाक्ष मंदिर हम्पी की सबसे महत्वपूर्ण विरासतों में से एक है। करीब 50-52 मीटर ऊंचा नौ-मंजिला गोपुरम इसकी बाहरी भव्यता का प्रतीक है, लेकिन मंदिर की असली गहराई उसके भीतर दिखाई देती है—जहां पत्थर के स्तंभ, मंडप, शिल्प, प्राचीन परंपराएं और छत पर बने भित्तिचित्र सदियों की सांस्कृतिक यात्रा को सामने रखते हैं।
कृष्णदेवराय के समय 1510 के आसपास बने या विकसित किए गए रंगमंडप ने मंदिर को विजयनगर कला की नई ऊंचाई दी। हालांकि छत के चित्रों की निश्चित तिथि को लेकर कला-इतिहासकारों में मतभेद हैं, यह निर्विवाद है कि ये चित्र विरूपाक्ष मंदिर की कलात्मक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
विरूपाक्ष मंदिर इसलिए भी खास है क्योंकि हम्पी के विशाल खंडहरों के बीच यह केवल अतीत की याद नहीं है। यहां आज भी धार्मिक जीवन जारी है। तुंगभद्रा की धारा, हेमकूट की पहाड़ी, विशाल गोपुरम और मंदिर के भीतर की चित्रित छत मिलकर ऐसा सांस्कृतिक दृश्य बनाते हैं जिसमें भारतीय इतिहास की कई परतें एक साथ दिखाई देती हैं। यही वजह है कि विरूपाक्ष मंदिर को देखना केवल एक प्राचीन इमारत देखना नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की धार्मिक, स्थापत्य और कलात्मक परंपराओं की एक लंबी यात्रा से गुजरना है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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