गया का विष्णुपद मंदिर: पितृ पक्ष में गया क्यों उमड़ते हैं लाखों श्रद्धालु? पितरों को मोक्ष दिलाने वाले इस पावन धाम की क्या है खासियत और मान्यता?

संवाद 24 डेस्क। भारतीय सनातन परंपरा में श्राद्ध और पितृ तर्पण को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम माना गया है। यही कारण है कि देश में अनेक ऐसे तीर्थ हैं, जहां पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की विशेष परंपरा रही है। इन तीर्थों में बिहार का गया धाम अपना विशिष्ट स्थान रखता है। फल्गु नदी के किनारे बसा गया सदियों से पितृ कर्म और पिंडदान की परंपरा से जुड़ा रहा है। यहां स्थित विष्णुपद मंदिर इस धार्मिक परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। बिहार पर्यटन विभाग भी विष्णुपद मंदिर को भगवान विष्णु के चरणचिह्न से जुड़ा प्राचीन मंदिर और पिंडदान का प्रमुख स्थल बताता है।
गया की विशेषता केवल इस मंदिर तक सीमित नहीं है। फल्गु नदी, अक्षयवट, सीता कुंड, रामशिला, प्रेतशिला और अनेक पिंडदान वेदियां मिलकर गया को एक विस्तृत पितृतीर्थ का स्वरूप देती हैं। बिहार पर्यटन के अनुसार गयाजी में पिंडदान के लिए 48 प्रमुख वेदियां मानी जाती हैं, जिनमें फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, पंचतीर्थ, सीता कुंड और गया शिरोमणि मंदिर प्रमुख हैं।

एक चरणचिह्न ने कैसे बना दिया गया को पितृतीर्थ?
विष्णुपद मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित वह पवित्र चरणचिह्न है, जिसे सनातन परंपरा में भगवान विष्णु का चरणचिह्न माना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में एक शिला पर लगभग 40 सेंटीमीटर लंबा पदचिह्न अंकित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यही वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ने गयासुर नामक असुर को अपने चरण से दबाकर स्थिर किया था। इसी चरणचिह्न के कारण मंदिर का नाम विष्णुपद पड़ा। गया जिला प्रशासन भी मंदिर के बारे में बताता है कि यहां बेसाल्ट की शिला में विष्णु के पदचिह्न अंकित माने जाते हैं और धार्मिक विश्वास के अनुसार भगवान विष्णु ने गयासुर की छाती पर अपना चरण रखकर उसे परास्त किया था।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि भगवान विष्णु का चरणचिह्न होना धार्मिक आस्था और पौराणिक परंपरा का विषय है, जबकि वर्तमान मंदिर की संरचना का इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा है। इसलिए विष्णुपद की चर्चा करते समय पौराणिक मान्यता और ऐतिहासिक तथ्य को अलग-अलग देखना अधिक उचित है।

कौन थे गयासुर, जिनके नाम पर पड़ा गया का नाम?
गया की धार्मिक पहचान से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा गयासुर की है। विभिन्न पुराणों और गया माहात्म्य की परंपरा में गयासुर को अत्यंत शक्तिशाली तपस्वी के रूप में वर्णित किया गया है। धार्मिक आख्यान के अनुसार उसकी तपस्या और शक्ति इतनी प्रभावशाली हो गई कि देवताओं ने भगवान विष्णु से उसे नियंत्रित करने का आग्रह किया।
कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने गयासुर को अपने चरण से दबाकर पृथ्वी पर स्थिर किया। गयासुर से जुड़ी इस कथा के अलग-अलग पाठ और स्थानीय रूप मिलते हैं, लेकिन मूल भाव यह है कि उसके शरीर को ही पवित्र तीर्थ क्षेत्र का आधार माना गया। विद्वानों ने भी गया की पौराणिक परंपरा को वायु पुराण और गया माहात्म्य जैसी परंपराओं से जोड़ा है।
धार्मिक मान्यता में यही कथा आगे पिंडदान से जुड़ती है। माना जाता है कि गयासुर को मिले वरदान के कारण गया में पिंडदान और श्राद्ध करने का विशेष महत्व है। इसीलिए गया केवल एक मंदिर या शहर नहीं, बल्कि पितृकर्म से जुड़ा विस्तृत तीर्थक्षेत्र माना जाता है।

विष्णुपद में भगवान की मूर्ति नहीं, चरणचिह्न है केंद्र
विष्णुपद मंदिर की एक विशेषता इसे भारत के अनेक पारंपरिक मंदिरों से अलग बनाती है। यहां गर्भगृह की धार्मिक पहचान किसी विशाल मूर्ति के बजाय भगवान विष्णु के माने जाने वाले चरणचिह्न से जुड़ी है।
यह चरणचिह्न जिस शिला पर अंकित है, उसे धार्मिक परंपरा में धर्मशिला कहा जाता है। इसके चारों ओर चांदी से बना आवरण या कुंड दिखाई देता है। मंदिर का प्रमुख आकर्षण यही चरणचिह्न है, जिसके दर्शन और पूजन के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। बिहार पर्यटन की आधिकारिक जानकारी भी मंदिर को इसी विष्णु पदचिह्न के लिए प्रसिद्ध बताती है।
सनातन परंपरा में चरणों का विशेष महत्व है। भगवान के चरणों को शरण, संरक्षण और मुक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसी भाव के कारण विष्णुपद में भगवान के चरणों का दर्शन और पितरों के निमित्त कर्म एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए दिखाई देते हैं।

वर्तमान मंदिर कब बना? अहिल्याबाई होलकर का क्या योगदान है?
विष्णुपद मंदिर की धार्मिक प्राचीनता और वर्तमान भवन के निर्माणकाल को एक ही बात मानना उचित नहीं होगा। उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार मंदिर का वर्तमान स्वरूप 18वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर के संरक्षण में पुनर्निर्मित हुआ। बिहार पर्यटन विभाग वर्तमान मंदिर के निर्माण को वर्ष 1787 से जोड़ता है।
महारानी अहिल्याबाई होलकर ने भारत के अनेक प्रमुख तीर्थस्थलों के पुनर्निर्माण और संरक्षण में योगदान दिया था। गया का विष्णुपद मंदिर भी उनके इसी मंदिर संरक्षण अभियान की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।
इस तरह मंदिर की कहानी में दो अलग-अलग कालखंड दिखाई देते हैं—एक ओर प्राचीन पौराणिक और तीर्थ परंपरा, दूसरी ओर 18वीं शताब्दी में निर्मित वर्तमान स्थापत्य स्वरूप। यही अंतर इस मंदिर को धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण बनाता है।

काले पत्थरों की भव्यता देखकर ठहर जाती है नजर
विष्णुपद मंदिर की स्थापत्य शैली भी इसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मंदिर फल्गु नदी के किनारे स्थित है और इसका निर्माण बड़े पत्थरों से किया गया है। मंदिर का शिखर दूर से ही दिखाई देता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार इसकी ऊंचाई लगभग 30 मीटर के आसपास है और मंदिर के निर्माण में बड़े ग्रे ग्रेनाइट पत्थरों का उपयोग हुआ है।
मंदिर के स्तंभों और पत्थरों पर की गई नक्काशी इसकी स्थापत्य सुंदरता को बढ़ाती है। अष्टकोणीय स्वरूप और ऊंचा शिखर इसे गया की धार्मिक पहचान में अलग स्थान देते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मंदिर की वास्तुकला को केवल सौंदर्य की दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं है। इसका पूरा स्थापत्य उस धार्मिक केंद्र की भूमिका को ध्यान में रखकर विकसित हुआ, जहां सदियों से देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले लोग पितरों के निमित्त कर्म करते रहे हैं।

पितृ पक्ष में क्यों बढ़ जाती है विष्णुपद की महिमा?
पितृ पक्ष वह अवधि है जिसे सनातन परंपरा में दिवंगत पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण के लिए समर्पित माना जाता है। इस दौरान गया में विशेष रूप से पिंडदान करने की परंपरा है। बिहार पर्यटन के अनुसार पितृ पक्ष में गया के फल्गु नदी तट और अन्य पवित्र स्थलों पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं तथा विष्णुपद मंदिर में विशेष पूजा की जाती है।
गया का पितृ पक्ष केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि एक बड़ा तीर्थ-समागम भी बन जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों से लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों के लिए श्राद्ध कर्म करने पहुंचते हैं। गयाजी में पिंडदान की अनेक वेदियां होने के कारण अनुष्ठान केवल विष्णुपद मंदिर परिसर तक सीमित नहीं रहता।
यही कारण है कि पितृ पक्ष के समय गया की धार्मिक गतिविधियां कई गुना बढ़ जाती हैं।

क्या भगवान राम ने भी गया में किया था पिंडदान?
गया की पौराणिक महत्ता को रामायण की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीराम अपने पिता महाराज दशरथ के निमित्त गया आए थे और यहां पिंडदान किया था। बिहार सरकार के पर्यटन विभाग और गया जिला प्रशासन की जानकारी में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है।
इसी कथा से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण परंपरा माता सीता के पिंडदान की है। गया में फल्गु नदी के दूसरी ओर स्थित सीता कुंड को उस स्थान के रूप में माना जाता है जहां माता सीता ने पिंडदान किया था। बिहार के सरकारी पर्यटन स्रोत भी सीता कुंड और सीता द्वारा पिंडदान की धार्मिक परंपरा का उल्लेख करते हैं।
यह प्रसंग विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि भारतीय श्राद्ध परंपरा में केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाओं की भूमिका से जुड़ी धार्मिक कथाएं भी मौजूद हैं।

फल्गु नदी और विष्णुपद का क्या संबंध है?
विष्णुपद मंदिर की धार्मिक यात्रा फल्गु नदी के बिना अधूरी मानी जाती है। मंदिर फल्गु नदी के किनारे स्थित है और पितृकर्म से जुड़े अनेक अनुष्ठान नदी तट पर किए जाते हैं।
फल्गु नदी के बारे में गया की स्थानीय धार्मिक परंपरा में कई कथाएं प्रचलित हैं। गया जिला प्रशासन के अनुसार वर्ष के अधिकांश समय नदी का तल ऊपर से सूखा दिखाई दे सकता है, जबकि मिट्टी के नीचे जल मिलने की बात स्थानीय परंपरा में कही जाती है। इसे माता सीता से जुड़ी कथा और उनके कथित शाप से जोड़ा जाता है।
श्राद्ध कर्म में नदी का महत्व भारतीय धार्मिक संस्कृति में व्यापक है। जल को जीवन और तर्पण का माध्यम माना गया है। इसलिए पितरों के निमित्त जल अर्पण और नदी तट पर कर्म करने की परंपरा धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण रही है।

अक्षयवट क्यों है गया यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा?
विष्णुपद मंदिर के आसपास स्थित अक्षयवट भी पितृकर्म से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। अक्षयवट का अर्थ ही ऐसे वटवृक्ष से है जिसे अक्षय या अविनाशी माना गया है। गया जिला प्रशासन इसे फल्गु नदी के किनारे स्थित पवित्र स्थल के रूप में वर्णित करता है।
धार्मिक परंपरा में वटवृक्ष दीर्घायु और स्थायित्व का प्रतीक माना जाता है। गया में अक्षयवट का महत्व पितृकर्म के साथ जुड़ गया है। इस कारण पिंडदान करने वाले अनेक श्रद्धालु विष्णुपद के साथ अक्षयवट और फल्गु तट की यात्रा भी करते हैं।
गया के पिंडदान की व्यापक परंपरा को समझने के लिए विष्णुपद, फल्गु और अक्षयवट को अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही तीर्थ परंपरा की कड़ियों के रूप में देखना अधिक उपयुक्त है।

पिंडदान में क्या किया जाता है?
पिंडदान का मूल भाव दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और अर्पण से जुड़ा है। सामान्यतः पिंड चावल, तिल, जल और अन्य निर्धारित सामग्री से बनाए जाते हैं। इसके साथ तर्पण और मंत्रोच्चार किया जाता है। अलग-अलग परंपराओं और पुरोहितीय विधियों के अनुसार सामग्री तथा अनुष्ठान के क्रम में अंतर हो सकता है।
गयाजी में पिंडदान के दौरान स्थानीय तीर्थ पुरोहितों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। बिहार पर्यटन की जानकारी में भी फल्गु नदी और अन्य पवित्र स्थलों पर तर्पण एवं पिंडदान के दौरान पुरोहितों के मार्गदर्शन का उल्लेख मिलता है।
इसलिए पहली बार गया जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह समझना जरूरी है कि पिंडदान कोई एक समान, हर परिवार पर लागू होने वाली छोटी-सी पूजा नहीं है। परिवार की परंपरा, मृतक की स्थिति और उपलब्ध समय के अनुसार कर्मकांड का स्वरूप अलग हो सकता है।

क्या गया में पिंडदान करने से सचमुच पितरों को मोक्ष मिलता है?
यह प्रश्न आस्था और तथ्य के बीच की सीमा को समझने की मांग करता है। सनातन धार्मिक मान्यता के अनुसार गया में श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी विश्वास के कारण देशभर से श्रद्धालु यहां आते हैं। बिहार पर्यटन भी गयाजी में पिंडदान को पूर्वजों की शांति और मुक्ति से जुड़ी धार्मिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत करता है।
लेकिन ‘मोक्ष’ धार्मिक और दार्शनिक अवधारणा है, जिसे वैज्ञानिक परीक्षण के जरिए उसी अर्थ में प्रमाणित या मापा नहीं जा सकता। इसलिए समाचार लेख में इसे तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि सनातन धार्मिक विश्वास और परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना अधिक तथ्यात्मक दृष्टिकोण है।
यही संतुलन किसी धार्मिक विषय को पेशेवर पत्रकारिता के अनुरूप बनाता है—आस्था का सम्मान भी रहे और मान्यता को ऐतिहासिक या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत भी न किया जाए।

गया में केवल विष्णुपद ही नहीं, ये स्थान भी हैं महत्वपूर्ण
गया में पितृकर्म का धार्मिक भूगोल काफी विस्तृत है। विष्णुपद मंदिर के अलावा फल्गु नदी, अक्षयवट, सीता कुंड, रामशिला, प्रेतशिला और अन्य वेदियों का भी महत्व है। बिहार पर्यटन के अनुसार गयाजी में 48 प्रमुख वेदियों की परंपरा बताई जाती है।
प्रेतशिला भी पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध स्थल है। बिहार पर्यटन इसे गया जिले का अत्यंत पवित्र स्थान बताते हुए यहां पितृकर्म की परंपरा का उल्लेख करता है।
इससे स्पष्ट होता है कि गया में पिंडदान को केवल एक मंदिर में जाकर पूजा कर लेने की प्रक्रिया के रूप में देखना इसकी व्यापक धार्मिक परंपरा को छोटा कर देना होगा। यहां अनेक तीर्थस्थल मिलकर पितृतीर्थ की पूरी अवधारणा बनाते हैं।

गया के पुरोहितों की परंपरा भी है खास
गया में श्राद्ध कर्म कराने वाले पारंपरिक तीर्थ पुरोहितों को आम तौर पर गयावाल पंडा कहा जाता है। पीढ़ियों से चली आ रही पुरोहित परंपरा गयाजी के धार्मिक जीवन का हिस्सा रही है। मंदिर और पिंडदान से जुड़े स्रोतों में गयावालों को यहां की तीर्थ पुरोहित परंपरा से जोड़ा गया है।
इन पुरोहितों की भूमिका केवल मंत्रोच्चार तक सीमित नहीं मानी जाती। वे विभिन्न वेदियों, स्थानीय परंपराओं और श्राद्ध कर्म के क्रम से परिचित होते हैं और श्रद्धालुओं को अनुष्ठान में मार्गदर्शन देते हैं।
हालांकि श्रद्धालुओं को किसी भी धार्मिक सेवा के लिए शुल्क या दक्षिणा तय करने से पहले स्पष्ट जानकारी लेना और अनावश्यक दबाव से बचना चाहिए। धार्मिक आस्था के साथ पारदर्शिता और विवेक भी आवश्यक है।

विष्णुपद मंदिर का एक और पहलू: गया की बहुधार्मिक विरासत
गया की पहचान केवल हिंदू तीर्थ के रूप में नहीं है। यह बौद्ध धर्म के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। बोधगया में महाबोधि मंदिर स्थित है, जहां बौद्ध परंपरा के अनुसार भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।
विष्णुपद के चरणचिह्न को लेकर धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग व्याख्याएं भी मिलती हैं। गया जिला प्रशासन के विवरण में उल्लेख है कि हिंदू परंपरा इसे भगवान विष्णु का पदचिह्न मानती है, जबकि बौद्ध परंपरा में पदचिह्न की अलग व्याख्या मिलती है।
इससे गया की सांस्कृतिक जटिलता सामने आती है। एक ही भौगोलिक क्षेत्र में हिंदू और बौद्ध दोनों की महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराएं विकसित हुई हैं।

क्यों खास है विष्णुपद मंदिर?
विष्णुपद मंदिर की खासियत को यदि कुछ प्रमुख बिंदुओं में समझें तो इसकी धार्मिक पहचान पांच महत्वपूर्ण आधारों पर टिकी दिखाई देती है—भगवान विष्णु का माना जाने वाला चरणचिह्न, गयासुर की पौराणिक कथा, पितृ श्राद्ध और पिंडदान की परंपरा, फल्गु नदी और अक्षयवट जैसे आसपास के तीर्थ तथा 18वीं शताब्दी का भव्य स्थापत्य।
इन सबके मेल ने विष्णुपद को केवल एक मंदिर नहीं रहने दिया, बल्कि उसे गयाजी की पितृतीर्थ परंपरा का केंद्रीय प्रतीक बना दिया है। बिहार पर्यटन भी इसे पिंडदान के प्रमुख केंद्र के रूप में रेखांकित करता है।

आज भी क्यों उमड़ते हैं श्रद्धालु?
आधुनिक जीवन में तकनीक और जीवनशैली भले ही तेजी से बदल गई हो, लेकिन पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता की भावना आज भी भारतीय परिवारों में गहरी है। पितृ पक्ष इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अपने माता-पिता और अन्य पूर्वजों के लिए श्राद्ध करने के उद्देश्य से लोग दूर-दूर से गया पहुंचते हैं।
गया प्रशासन और बिहार पर्यटन के स्रोतों के अनुसार पितृ पक्ष में यहां बड़े स्तर पर धार्मिक गतिविधियां होती हैं और श्रद्धालुओं के लिए प्रशासनिक व्यवस्थाएं भी की जाती हैं।
2026 के लिए गयाजी की आधिकारिक पिंडदान वेबसाइट ने पितृपक्ष मेला की तिथियां 26 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 बताई हैं। इसका अर्थ है कि इस अवधि में गया में पितृकर्म के लिए विशेष तीर्थ गतिविधियां चलती हैं।

श्रद्धा से जुड़ा तीर्थ, इतिहास से जुड़ा स्मारक
विष्णुपद मंदिर को केवल चमत्कारों और मान्यताओं के आधार पर समझना इसके ऐतिहासिक पक्ष को नजरअंदाज करना होगा, जबकि केवल स्थापत्य स्मारक मानना इसकी धार्मिक आत्मा को अनदेखा करना होगा। इसकी वास्तविक पहचान इन दोनों पक्षों के मेल में दिखाई देती है।
एक ओर यहां भगवान विष्णु के चरणचिह्न की धार्मिक आस्था है, गयासुर की पौराणिक कथा है, श्रीराम और माता सीता से जुड़ी परंपराएं हैं और पितरों के मोक्ष की मान्यता है। दूसरी ओर 1787 में महारानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा कराया गया पुनर्निर्माण और पत्थरों की भव्य वास्तुकला इसका ऐतिहासिक पक्ष सामने लाती है।

जहां पूर्वजों की स्मृति और विष्णु भक्ति एक साथ दिखाई देती है
गया का विष्णुपद मंदिर सनातन परंपरा में इसलिए विशेष है क्योंकि यहां भगवान विष्णु की आराधना और पितरों के प्रति श्रद्धा एक ही तीर्थ परंपरा में दिखाई देती है। फल्गु नदी के किनारे स्थित यह मंदिर धार्मिक विश्वास, पौराणिक आख्यान, तीर्थ परंपरा और स्थापत्य विरासत—इन सभी को एक साथ समेटे हुए है।
गयासुर की कथा बताती है कि कैसे एक पौराणिक आख्यान ने पूरे क्षेत्र को पवित्र तीर्थ का स्वरूप दिया। भगवान विष्णु का चरणचिह्न इस आस्था का केंद्रीय प्रतीक बना। श्रीराम और माता सीता से जुड़ी पिंडदान परंपराओं ने इसकी धार्मिक प्रतिष्ठा को और मजबूत किया। वहीं महारानी अहिल्याबाई होलकर के संरक्षण में 18वीं शताब्दी में निर्मित वर्तमान मंदिर ने इस तीर्थ की स्थापत्य पहचान को स्थायी रूप दिया।
आज भी जब पितृ पक्ष में श्रद्धालु गया पहुंचते हैं, तो उनके लिए यह यात्रा केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं होती। यह अपने परिवार की पिछली पीढ़ियों को स्मरण करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और अपनी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ने का अवसर भी होती है।
इसी कारण विष्णुपद मंदिर को गयाजी की आत्मा और पितृतीर्थ परंपरा का प्रमुख केंद्र कहा जाता है। धार्मिक आस्था में यहां किए गए पिंडदान को पितरों की शांति और मोक्ष से जोड़ा जाता है, जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से यह बिहार की महत्वपूर्ण धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। श्रद्धा और इतिहास के इसी संगम ने फल्गु के तट पर बसे गया को भारतीय तीर्थ परंपरा में एक अलग पहचान दी है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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