
संवाद 24 डेस्क। मुंबई के जुहू इलाके में करीब 711 करोड़ रुपये में एक पूरा रिहायशी टावर खरीदने की खबर ने कारोबारी जगत के साथ-साथ आम लोगों का भी ध्यान खींचा है। यह खरीद किसी फिल्मी सितारे या पारंपरिक रियल एस्टेट कारोबारी की नहीं, बल्कि एंजेल वन के संस्थापक, चेयरमैन और प्रबंध निदेशक दिनेश दरियानुमल ठक्कर की है। एम्बेसी डेवलपमेंट्स ने जुहू के अपने अल्ट्रा-लक्जरी प्रोजेक्ट Embassy Terrazza में एक पूरा G+7 रिहायशी टावर ठक्कर को बेचने के लिए समझौता किया है। कंपनी के अनुसार करीब 63,000 वर्ग फुट के RERA कार्पेट क्षेत्र वाले इस टावर की कुल लेनदेन कीमत लगभग 711 करोड़ रुपये है और इसे भारत का सबसे बड़ा एकल आवासीय इकाई लेनदेन बताया गया है। लेकिन इस सौदे की असली कहानी केवल 711 करोड़ रुपये की कीमत नहीं है। इसके पीछे उस कारोबारी की करीब तीन दशक लंबी यात्रा है, जिसने 12वीं कक्षा के बाद पारंपरिक शिक्षा का रास्ता छोड़ दिया, परिवार के कपड़ा कारोबार से अलग अपनी पहचान बनाने का फैसला किया, शेयर बाजार में कदम रखा, शुरुआती झटके झेले और फिर एक पारंपरिक ब्रोकिंग कारोबार को डिजिटल वित्तीय सेवा मंच में बदलने वाली यात्रा का नेतृत्व किया। दिनेश ठक्कर ने एक साक्षात्कार में बताया था कि परिवार की पूंजी के साथ जुड़े कारोबारी ढांचे से अलग होकर वे ‘फ्री बर्ड’ यानी आजाद होकर अपना रास्ता बनाना चाहते थे। उन्होंने करीब 2.5 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी से अपना स्वतंत्र सफर शुरू करने की बात कही है।
कौन हैं दिनेश दरियानुमल ठक्कर, जिनके एक फैसले ने बदल दी चर्चा?
दिनेश ठक्कर मुंबई के मुलुंड में एक कारोबारी परिवार में पले-बढ़े। उनका परिवार कपड़ा व्यापार से जुड़ा था। उन्होंने ठाणे के सेंट जॉन द बैपटिस्ट हाई स्कूल में पढ़ाई की और बाद में मुंबई के किशिनचंद चेलाराम कॉलेज में विज्ञान की पढ़ाई की। हालांकि उन्होंने 12वीं के बाद औपचारिक उच्च शिक्षा जारी नहीं रखी। उपलब्ध साक्षात्कारों में ठक्कर ने खुद इसे अपने जीवन के बड़े जोखिमों में से एक बताया है—उनका विश्वास था कि औपचारिक उच्च शिक्षा के बिना भी वे कारोबार खड़ा कर सकते हैं। शिक्षा छोड़ने के बाद उनका पहला पड़ाव परिवार का कपड़ा कारोबार था। लेकिन पारिवारिक कारोबार के अपने नियम और सीमाएं थीं। ठक्कर के अनुसार, जब कारोबारी पूंजी परिवार से आती है तो उसके साथ एक निश्चित ढांचा भी जुड़ा होता है। इसी कारण वे स्वतंत्र रूप से काम करना चाहते थे। ‘द इंडियन ड्रीम’ पॉडकास्ट में उन्होंने इसी सोच को ‘फ्री बर्ड’ बनने की इच्छा से जोड़ा और बताया कि उन्होंने अपेक्षाकृत छोटी पूंजी से स्वतंत्र शुरुआत की।
परिवार का कारोबार छोड़कर शेयर बाजार की ओर क्यों मुड़े?
ठक्कर की कारोबारी यात्रा का महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने शेयर बाजार की ओर रुख किया। शुरुआत में वे निवेशक के तौर पर बाजार में आए और बाद में स्टॉक ब्रोकिंग व्यवसाय की तरफ बढ़े। यह वह दौर था जब शेयर बाजार में कारोबार आज की तरह मोबाइल ऐप और कुछ सेकंड में होने वाले डिजिटल ऑर्डर के जरिए नहीं होता था। ब्रोकिंग का कारोबार काफी हद तक पारंपरिक नेटवर्क, टेलीफोन और भौतिक प्रक्रियाओं पर निर्भर था। ठक्कर ने ऐसे समय में बाजार को चुना जब उसमें अवसर के साथ जोखिम भी बहुत बड़ा था। शुरुआती वर्षों में उन्हें भारतीय पूंजी बाजार के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। 1992 के हर्षद मेहता प्रकरण ने बाजार में भारी उथल-पुथल पैदा की और ठक्कर के कारोबारी सफर पर भी इसका असर पड़ा। बाद के वर्षों में उन्होंने ब्रोकिंग व्यवसाय को आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया।
1996 में बनी Angel Broking, फिर बदला पूरा कारोबार
दिनेश ठक्कर की कारोबारी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 1996 रहा, जब एंजेल ब्रोकिंग की स्थापना हुई। एंजेल वन के आधिकारिक निवेशक संबंध पृष्ठ के अनुसार कंपनी का गठन 8 अगस्त 1996 को हुआ था और आज दिनेश ठक्कर इसके संस्थापक, चेयरमैन और प्रबंध निदेशक हैं। कंपनी 2020 में शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई।
शुरुआत में कारोबार पारंपरिक स्टॉक ब्रोकिंग पर केंद्रित था, लेकिन समय के साथ तकनीक ने वित्तीय क्षेत्र को बदलना शुरू किया। एंजेल वन के अनुसार कंपनी ने 2019 में डिजिटल यात्रा शुरू की और एंड-टू-एंड डिजिटल निवेश समाधान की दिशा में आगे बढ़ी। यही परिवर्तन आगे चलकर कंपनी के कारोबार की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
आज एंजेल वन को केवल पारंपरिक ब्रोकरेज कंपनी के रूप में नहीं देखा जाता। डिजिटल निवेश, ट्रेडिंग और वित्तीय सेवाओं के विस्तार ने इसके कारोबारी मॉडल को व्यापक बनाया है। इस परिवर्तन के केंद्र में ठक्कर लंबे समय से नेतृत्व की भूमिका में रहे हैं। कंपनी के आधिकारिक विवरण में भी उन्हें संस्थापक, चेयरमैन और प्रबंध निदेशक के रूप में दर्ज किया गया है।
वॉकie-टॉकी से डिजिटल ट्रेडिंग तक का दिलचस्प सफर
दिनेश ठक्कर के सफर का एक दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने उस दौर में ब्रोकिंग कारोबार शुरू किया था जब आज जैसी डिजिटल सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। शुरुआती दिनों के बारे में उपलब्ध रिपोर्टों में बताया गया है कि ग्राहकों को कारोबार की जानकारी और पुष्टि देने के लिए वॉकी-टॉकी जैसे साधनों का भी इस्तेमाल किया जाता था।
आज उसी कारोबारी यात्रा का एक बिल्कुल अलग रूप दिखाई देता है। मोबाइल फोन पर कुछ सेकंड में शेयर खरीदने-बेचने की सुविधा, डिजिटल खाता खोलना और ऑनलाइन निवेश जैसे बदलावों ने ब्रोकिंग उद्योग की तस्वीर बदल दी। एंजेल वन भी पारंपरिक ब्रोकिंग से डिजिटल वित्तीय सेवा मंच की ओर इसी बदलाव का हिस्सा बना।
डॉट-कॉम दौर में लगा बड़ा झटका, गंवाई थी करीब 80 फीसदी पूंजी
सफलता की इस कहानी में असफलता का अध्याय भी उतना ही महत्वपूर्ण है। दिनेश ठक्कर ने एक साक्षात्कार में बताया था कि करीब 2001 के आसपास इंटरनेट ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म में भारी निवेश किया गया था। डॉट-कॉम बुलबुला फूटने के बाद इस निवेश में उनकी लगभग 80 प्रतिशत पूंजी चली गई थी। यह उनके कारोबारी जीवन के बड़े झटकों में से एक था। इस अनुभव ने उनके कारोबार के प्रति नजरिये को भी प्रभावित किया। रिपोर्टों के अनुसार, बाद में एंजेल वन में ‘फेल्योर क्लब’ जैसी अवधारणा की बात सामने आई, जहां असफल परियोजनाओं पर चर्चा कर यह समझने की कोशिश की जाती थी कि गलती कहां हुई और उससे आगे कैसे सीखा जा सकता है। ठक्कर की कारोबारी सोच में लंबी अवधि, अनुशासन और निरंतरता को महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।
40 साल की उम्र तक क्यों किराये के घर में रहे?
दिनेश ठक्कर की वर्तमान 711 करोड़ रुपये की संपत्ति खरीद को इसलिए भी चर्चा मिल रही है क्योंकि उन्होंने अपने करियर के लंबे शुरुआती हिस्से में घर खरीदने के बजाय किराये पर रहना पसंद किया था। विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित रिपोर्टों के अनुसार वे लगभग 38 से 40 वर्ष की उम्र तक किराये के घर में रहे। उनका तर्क था कि शुरुआती दौर में कारोबार में पूंजी लगाना उनके लिए रियल एस्टेट खरीदने से ज्यादा महत्वपूर्ण था। वे मानते थे कि कारोबारी पूंजी को व्यवसाय में लगाकर उसे बढ़ाना ज्यादा उपयोगी हो सकता है। बाद में जब उनका करियर, परिवार और जीवन अपेक्षाकृत स्थिर हुआ, तब घर खरीदने का निर्णय लिया। यही कारण है कि आज का 711 करोड़ रुपये का जुहू सौदा उनके व्यक्तिगत जीवन में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। पहले जहां वे पूंजी को कारोबार में लगाने को प्राथमिकता देते थे, वहीं अब उन्होंने मुंबई के सबसे महंगे और प्रतिष्ठित इलाकों में से एक में पूरा रिहायशी टावर अपने परिवार के लिए लेने का निर्णय किया है।
711 करोड़ में आखिर क्या खरीदा है?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दिनेश ठक्कर ने कोई सामान्य लक्जरी फ्लैट नहीं खरीदा है। वे Embassy Terrazza परियोजना का पूरा एक G+7 रिहायशी टावर खरीद रहे हैं। इसका RERA कार्पेट क्षेत्र लगभग 63,000 वर्ग फुट बताया गया है। परियोजना जुहू तारा रोड पर दो एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैली है और इसमें पांच टावर तथा करीब 50 आवासीय इकाइयां प्रस्तावित हैं। पूरे प्रोजेक्ट का अनुमानित सकल विकास मूल्य 3,000 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह सौदा लगभग 1.13 लाख रुपये प्रति वर्ग फुट के स्तर पर बैठता है। हालांकि कुल 711 करोड़ रुपये की राशि में कर, स्टांप ड्यूटी, पंजीकरण और अन्य लेनदेन लागत शामिल होने की जानकारी भी दी गई है। इसलिए केवल कुल कीमत को कार्पेट क्षेत्र से विभाजित कर संपत्ति का मूल बिक्री मूल्य मानना पूरी तरह सही नहीं होगा।
‘Angelus’ होगा इस सपनों के घर का नाम
दिनेश ठक्कर ने इस नए पारिवारिक घर को ‘Angelus’ नाम दिया है। उनका कहना है कि घर तलाशते समय उनकी प्राथमिकताओं में गोपनीयता, पर्याप्त जगह, समुद्र का शानदार दृश्य और परिवार के लिए एक विशेष आवास शामिल था।
Embassy Developments के अनुसार यह परियोजना कम घनत्व वाले अल्ट्रा-लक्जरी आवासीय विकास के रूप में तैयार की जा रही है। पांच टावरों में प्रत्येक मंजिल पर एक आवास की योजना बताई गई है, जिससे निवासियों को अधिक निजी स्थान और समुद्र तथा शहर के विस्तृत दृश्य मिल सकें।
एम्बेसी के लिए भी क्यों खास है यह सौदा?
711 करोड़ रुपये का यह सौदा केवल खरीदार के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। एम्बेसी डेवलपमेंट्स ने इसे भारत का सबसे बड़ा एकल आवासीय इकाई लेनदेन बताया है। कंपनी के अनुसार यह सौदा मुंबई के अल्ट्रा-लक्जरी आवासीय बाजार में बड़े और सीमित संख्या वाले आवासों की मांग को भी दर्शाता है। मुंबई में जुहू, बांद्रा और वर्ली जैसे इलाकों में समुद्र के करीब बड़ी और निजी आवासीय संपत्तियों की उपलब्धता सीमित है। ऐसे में पूरा टावर खरीदना केवल आकार का मामला नहीं, बल्कि गोपनीयता और विशेषाधिकार वाले आवास की मांग से भी जुड़ा हुआ है।
शेयर बाजार के कारोबारी की रियल एस्टेट में इतनी बड़ी खरीद का क्या अर्थ?
दिनेश ठक्कर का पूरा कारोबारी जीवन शेयर बाजार और वित्तीय सेवाओं से जुड़ा रहा है। ऐसे में 711 करोड़ रुपये की रियल एस्टेट खरीद को केवल व्यक्तिगत विलासिता के नजरिये से देखना इस कहानी के एक हिस्से को ही दिखाएगा। यह उस बदलाव का भी संकेत है जिसमें लंबे समय तक व्यवसाय में पूंजी लगाने के बाद कोई उद्यमी अपनी व्यक्तिगत संपत्ति और पारिवारिक जरूरतों के लिए बड़े स्तर पर निवेश करता है। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस खरीद को कंपनी के निवेश या शेयर बाजार में निवेश की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक व्यक्तिगत आवासीय संपत्ति का सौदा है और ठक्कर ने इसे परिवार के घर के रूप में इस्तेमाल करने की बात कही है।
ठक्कर की संपत्ति का आकलन कैसे करें?
दिनेश ठक्कर की व्यक्तिगत संपत्ति को लेकर कई वेबसाइटों पर अलग-अलग अनुमान प्रकाशित होते हैं। लेकिन ऐसे अनुमानों में अंतर हो सकता है। अधिक ठोस सार्वजनिक आंकड़ा उनकी सूचीबद्ध कंपनी में हिस्सेदारी है। एंजेल वन की वित्त वर्ष 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2025 को ठक्कर के पास 16.77 करोड़ शेयर यानी लगभग 18.57 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। इस हिस्सेदारी का बाजार मूल्य शेयर की कीमत के साथ बदलता रहता है। इसलिए इसे उनकी स्थायी ‘नेटवर्थ’ मानना सही नहीं होगा। किसी व्यक्ति की कुल संपत्ति में निजी निवेश, अन्य कंपनियों में हिस्सेदारी, संपत्ति, देनदारियां और अन्य परिसंपत्तियां भी शामिल हो सकती हैं।
महंगी कारों से भी जुड़ी है उनकी अलग पहचान
दिनेश ठक्कर की सार्वजनिक प्रोफाइल का एक और पहलू उनका महंगी और प्रदर्शन-केंद्रित कारों के प्रति लगाव है। विभिन्न साक्षात्कारों में उन्होंने कारों को लेकर अपनी पसंद के बारे में बात की है। रिपोर्टों में उनके पास Ferrari, Lamborghini और Porsche जैसे ब्रांडों की कारों का उल्लेख मिलता है। ठक्कर ने यह भी स्पष्ट किया है कि शेयर खरीदने और कार खरीदने के फैसले को वे अलग नजरिये से देखते हैं। शेयर के मामले में आंकड़े, मुनाफा और बाजार हिस्सेदारी जैसे कारक महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि कार के मामले में पसंद और भावनात्मक जुड़ाव ज्यादा मायने रखता है।
एक कारोबारी कहानी जिसमें ‘आजादी’ से लेकर 711 करोड़ तक का पड़ाव है
दिनेश ठक्कर की कहानी को केवल ‘12वीं पास से 711 करोड़ के घर’ जैसे एक वाक्य में समेटना आसान है, लेकिन इससे उनकी कारोबारी यात्रा की जटिलता छूट जाती है। उनका सफर पारिवारिक कारोबार से अलग होकर स्वतंत्र पहचान बनाने की इच्छा से शुरू हुआ। उन्होंने शेयर बाजार में प्रवेश किया, ब्रोकिंग कारोबार खड़ा किया, 1992 के बाजार संकट का सामना किया, 2001 के आसपास डॉट-कॉम दौर में बड़ा नुकसान देखा और फिर अपने व्यवसाय को तकनीक के साथ बदलने पर जोर दिया। उनकी कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कारोबारी सफलता हमेशा एक सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ती। शुरुआती जोखिम, बाजार के झटके, पूंजी का नुकसान और बदलती तकनीक—इन सभी के बीच कारोबार को बनाए रखना और उसे नई परिस्थितियों के अनुरूप बदलना किसी भी उद्यमी की यात्रा का हिस्सा होता है।
711 करोड़ का टावर केवल एक संपत्ति नहीं, तीन दशक की यात्रा का नया अध्याय
जुहू का 711 करोड़ रुपये का यह सौदा निश्चित रूप से असाधारण है। लेकिन दिनेश ठक्कर की कहानी का महत्व केवल इस रकम में नहीं है। इसकी असली दिलचस्पी उस सफर में है, जिसमें एक कारोबारी परिवार का युवा अपने लिए स्वतंत्र रास्ता चुनता है, शेयर बाजार में प्रवेश करता है, कठिन दौर देखता है और फिर तीन दशकों में ब्रोकिंग व्यवसाय को तकनीक आधारित वित्तीय सेवा मंच में बदलने की प्रक्रिया का हिस्सा बनता है। अब मुंबई के जुहू तारा रोड पर बनने वाला ‘Angelus’ उसी यात्रा का नया अध्याय है। कभी पूंजी को रियल एस्टेट में लगाने के बजाय कारोबार में लगाने को प्राथमिकता देने वाले ठक्कर अब करीब 63,000 वर्ग फुट के RERA कार्पेट क्षेत्र वाला पूरा G+7 टावर अपने परिवार के लिए ले रहे हैं। एम्बेसी डेवलपमेंट्स द्वारा लगभग 711 करोड़ रुपये का बताया गया यह सौदा भारत के बड़े आवासीय लेनदेन में दर्ज हो चुका है। इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प विरोधाभास यही है—जिस व्यक्ति ने अपने करियर की शुरुआत स्वतंत्रता की तलाश में की और खुद को ‘आजाद परिंदा’ कहकर परिवार के कारोबार की सीमाओं से बाहर निकलना चाहा, उसी ने वर्षों की कारोबारी यात्रा के बाद अपने परिवार के लिए मुंबई के सबसे प्रतिष्ठित इलाकों में एक पूरा टावर चुन लिया। यह बदलाव केवल जीवनशैली का नहीं, बल्कि एक लंबे कारोबारी सफर के उस पड़ाव का भी प्रतीक है जहां उद्यम, जोखिम, तकनीक और संपत्ति—चारों एक ही कहानी में दिखाई देते हैं।






