
संवाद 24 रायपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर छत्तीसगढ़ के रायपुर अंतर्गत अभनपुर के सोनपैरी स्थित असंग देव कबीर आश्रम में एक विशाल हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह आयोजन संघ के शताब्दी वर्ष के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक माना जा रहा है।
इस सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी, मुख्य अतिथि पूज्य गुरुदेव राष्ट्रीय संत श्री असंग देव जी, तथा विशिष्ट अतिथि गायत्री परिवार की समाजसेवी उर्मिला नेताम जी की गरिमामयी उपस्थिति रही।

शताब्दी वर्ष उत्सव नहीं, कार्य के संकल्प का वर्ष
सरसंघचालक ने अपने संबोधन में कहा कि संघ के सौ वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर देशभर में हिंदू सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि शताब्दी वर्ष केवल उत्सव का समय नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज कार्य को गति देने का अवसर है। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक पंच परिवर्तन का विषय लेकर समाज में जा रहे हैं, ताकि समाज जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सके।
भय और परिवर्तन का प्रसंग
अपने संबोधन में उन्होंने एक प्रेरक प्रसंग सुनाया जिसमें एक खरगोश बार-बार अलग-अलग रूप मांगता रहा। भगवान ने उसे रूप देने के बाद कहा कि यदि वह क्षमता बदलने की जगह भय दूर होने का वरदान मांगता, तो उसकी समस्याएँ समाप्त हो जातीं। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने कहा कि जीवन में रूप, आकार या सामर्थ्य से अधिक आवश्यक है निर्भयता और आत्मविश्वास।
पंच परिवर्तन के पाँच मुख्य बिंदु
मोहन भागवत जी ने कहा कि समाज में पाँच बातें व्यवहार में लानी होंगी: पहला, आपसी भेद समाप्त कर सामाजिक समरसता को मजबूत करना। सुख-दुख में साथ खड़े रहना, यही समाज की एकता है। दूसरा, सप्ताह में एक दिन परिवार में भजन, भोजन और संवाद का समय तय कर संस्कारों को जीवित रखना। तीसरा, पर्यावरण संरक्षण में व्यक्तिगत भूमिका निभाना, सिंगल यूज प्लास्टिक कम करना, पेड़ लगाना और जल संरक्षण जैसे कार्य करना। चौथा, स्व भाषा, स्व वेश और स्वदेशी को अपनाकर आत्मसम्मान की भावना को मजबूत करना। पांचवां, धर्मसम्मत आचरण, नागरिक कर्तव्य, बड़ों का सम्मान, बच्चों में संस्कार और दान की परंपरा को जीवन में उतारना।
मुख्य अतिथि संत असंग देव जी का संदेश
पूज्य गुरुदेव राष्ट्रीय संत श्री असंग देव जी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं सेवा की सीख देता है। उन्होंने कहा कि मधुमक्खी संगठन में रहती है तो हाथी भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मनुष्य का जीवन देवताओं से भी श्रेष्ठ है, लेकिन इसके लिए संस्कार और आत्मानुशासन अनिवार्य हैं। बिना संस्कार के मनुष्य दिशाहीन हो जाता है।
समाज सुधार में मातृशक्ति की भूमिका – उर्मिला नेताम जी
गायत्री परिवार की सामाजिक कार्यकर्ता उर्मिला नेताम जी ने कहा कि आज परिवार टूट रहे हैं और संस्कृति पर बाहरी प्रभाव बढ़ रहा है। ऐसे में मातृशक्ति का जागरण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि संस्कार और संगठन के माध्यम से ही समाज की आधारशिला मज़बूत रह सकती है।
सांस्कृतिक प्रस्तुति और आध्यात्मिक वातावरण
सम्मेलन के दौरान छत्तीसगढ़ी लोक कलाकार एवं गायिका आरु साहू और उनकी टीम ने भजन और लोकगीत प्रस्तुत किए। इनके भजनों से पूरा वातावरण आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा से भर गया। श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा गया।
पर्यावरण संदेश के साथ पौधारोपण
कार्यक्रम के समापन पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने सोनपैरी गांव में कोविदार पौधा लगाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। यह प्रतीकात्मक कार्य समाज को जिम्मेदारी और प्रकृति के प्रति संवेदनशील होने का संदेश देता है।
रायपुर में सम्पन्न यह हिंदू सम्मेलन संघ के शताब्दी वर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनकर सामने आया, जहाँ संगठन, संस्कार, समरसता, स्वदेशी, पर्यावरण और कर्तव्यबोध के संदेश को व्यवहार में लाने की बात रखी गई। सम्मेलन का मूल संदेश यही रहा कि समाज का उत्थान केवल विचारों से नहीं, व्यवहार से होता है।






