असम की जनसांख्यिकी पर संकट, 50 प्रतिशत आबादी होने पर बांग्लादेश में मिलाने की कोशिश संभव: हिमंत सरमा
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संवाद 24 गुवाहाटी। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य की बदलती जनसांख्यिकी को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए कड़ा अलर्ट जारी किया है। शनिवार को भारतीय जनता पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि असम में बांग्लादेशी मूल के लोगों की आबादी 50 प्रतिशत के आंकड़े को पार कर जाती है, तो राज्य को बांग्लादेश का हिस्सा बनाने जैसी साजिशें शुरू हो सकती हैं। उन्होंने इसे असम की अस्मिता, संस्कृति और अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बताया।
मुख्यमंत्री ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान में बांग्लादेशी मूल के लोगों की आबादी 40 प्रतिशत के पार पहुंच चुकी है और यह लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि यह कोई कल्पना नहीं बल्कि आंखों के सामने दिखने वाली वास्तविकता है। यदि यह संख्या 50 प्रतिशत से अधिक हो गई तो असम के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।
बांग्लादेश में हाल ही में हुई दीपू दास की मॉब लिंचिंग की घटना का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने असम के नागरिकों को सतर्क किया। उन्होंने कहा कि यदि आज वहां ऐसी घटनाएं हो रही हैं तो आने वाले 20 वर्षों में असम की स्थिति क्या होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है। उन्होंने घुसपैठियों की निष्ठा पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि भारत और बांग्लादेश के बीच कभी युद्ध की स्थिति बनी, तो यह स्पष्ट नहीं होगा कि ये लोग किसके पक्ष में खड़े होंगे।
मुख्यमंत्री सरमा ने आगामी विधानसभा चुनावों को सामान्य राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि ‘सभ्यता की लड़ाई’ करार दिया। उन्होंने कांग्रेस पर दशकों तक तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि इसी कारण राज्य में एक नई सभ्यता विकसित हुई है, जिसकी संख्या अब लगभग डेढ़ करोड़ तक पहुंच चुकी है।
उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल सत्ता की नहीं, बल्कि अपनी भूमि (माटी), पहचान (जाति) और आधार (भेटी) को बचाने की है। मुख्यमंत्री ने भाजपा को असम के लिए उम्मीद की आखिरी किरण बताते हुए कहा कि पार्टी राज्य को घुसपैठ और उससे पैदा हो रहे अंधकार से बचाने का काम करेगी।
जनसांख्यिकीय आंकड़ों की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्ष 2011 में असम में मुस्लिम आबादी 34 प्रतिशत थी, जिसमें बांग्लादेशी मूल के मुस्लिम 31 प्रतिशत और स्थानीय मुस्लिम मात्र 3 प्रतिशत थे। अनुमान है कि वर्ष 2027 तक यह आबादी बढ़कर 40 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जबकि स्वदेशी आबादी घटकर 60 प्रतिशत रह गई है और इसमें और गिरावट की आशंका है।
भावुक स्वर में मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके जीवनकाल में घुसपैठियों की आबादी 21 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत हो चुकी है और यदि यही स्थिति रही तो उनके बच्चों के समय तक असमिया समुदाय की आबादी सिमटकर मात्र 30 प्रतिशत रह सकती है।
सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हुए मुख्यमंत्री ने असम को ‘शंकर-अजान’ की भूमि कहे जाने की धारणा को खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि असम केवल ‘शंकर-माधव’ यानी महापुरुष शंकरदेव और माधवदेव की धरती है। अजान फकीर के साथ महापुरुषों की तुलना कर असम की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने के प्रयासों को उन्होंने अस्वीकार्य बताया।
अपने संबोधन के अंत में मुख्यमंत्री ने अहोम सेनापति लाचित बोरफुकन को स्मरण करते हुए कहा कि जिस तरह उन्होंने बीमारी की अवस्था में भी मुगलों को पराजित किया था, उसी संकल्प के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में असम की पहचान और संस्कृति की रक्षा की जाएगी और इस लड़ाई में जीत सुनिश्चित होगी।






