
संवाद 24 समालखा। भारत की प्राचीन सामाजिक-सांस्कृतिक स्मृति को सहेजने वाली वंशावली लेखन परम्परा के संरक्षण, पुनर्जीवन और आधुनिक संदर्भों में विकास को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल के तहत की दो दिवसीय अखिल भारतीय बैठक हरियाणा के समालखा में आयोजित की गई। यह बैठक 20 एवं 21 दिसम्बर, 2025 को सम्पन्न हुई, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से वंशावली परम्परा से जुड़े प्रतिनिधियों, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने सहभागिता की।

बैठक का मुख्य उद्देश्य वंश लेखकों की पारंपरिक भूमिका को समकालीन समय की आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्परिभाषित करना, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाना तथा सदियों पुरानी वंशावली परम्परा को संरक्षित रखते हुए उसे डिजिटल युग से जोड़ना रहा। बैठक में 10 प्रान्तों से आए लगभग 120 प्रमुख कार्यकर्ताओं ने संगठनात्मक समीक्षा, भविष्य की कार्ययोजना और जमीनी चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के अखिल भारतीय प्रमुख शरद ढोले ने अपने संबोधन में कहा कि वंशावली लेखक केवल जाति या परिवारों का विवरण संजोने वाले नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय समाज के इतिहास, परम्परा और सांस्कृतिक निरंतरता के संवाहक हैं। उन्होंने कहा कि समय की मांग है कि वंशावली लेखन को केवल पारंपरिक बहियों तक सीमित न रखते हुए डिजिटल माध्यमों से जोड़ा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस विरासत से जुड़ सकें। शरद ढोले ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि कई स्थानों पर निष्क्रिय हो चुके वंश लेखकों को पुनः अपने यजमानों से संपर्क स्थापित कर सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, जिससे इस परम्परा की सामाजिक उपयोगिता बनी रहे।
संस्थान के अखिल भारतीय अध्यक्ष परमेश्वर ब्रह्माभट्ट ने संगठन की अब तक की यात्रा और उपलब्धियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 में स्थापना के बाद से संस्थान लगातार वंश लेखकों के उत्थान और आपसी समन्वय के लिए कार्य कर रहा है। उन्होंने जानकारी दी कि संस्थान के दो अनिवार्य वार्षिक कार्यक्रमों में से एक ‘स्थापना दिवस’ का आयोजन इस वर्ष जुलाई माह में जिला स्तर पर किया गया, जो देश के 50 जिलों तक पहुँचा। इसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर वंश लेखकों को संगठित करना और समाज में उनकी भूमिका को रेखांकित करना रहा।
परमेश्वर ब्रह्माभट्ट ने बताया कि दूसरा महत्वपूर्ण कार्यक्रम ‘सरस्वती पूजन’ का है, जिसे वसंत ऋतु के दौरान 19 जनवरी से 1 फरवरी के बीच आयोजित करने की योजना बनाई गई है। यह आयोजन देशभर के लगभग 300 ऐसे ग्रामों और कस्बों में किया जाएगा, जहाँ वंशावली लेखकों की परम्परा आज भी जीवित है। इस कार्यक्रम के माध्यम से वंश लेखन को विद्या, संस्कृति और परम्परा से जोड़ते हुए नई पीढ़ी को इसके प्रति जागरूक करने का लक्ष्य रखा गया है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संस्थान ने जागा, राव, भाट, बारोठ, बड़वा जैसे विभिन्न नामों और परम्पराओं में बँटे वंश लेखकों को एक साझा पहचान देने का कार्य किया है। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों से पहचाने जाने वाले इन समुदायों को ‘वंश लेखक’ की एकीकृत संज्ञा देकर आपसी मतभेदों और दूरी को कम करने का प्रयास किया गया है। संस्थान के प्रयासों से अनेक ऐसे वंश लेखक, जिन्होंने यजमानी प्रथा छोड़ दी थी, पुनः अपने पारंपरिक दायित्वों की ओर लौटे हैं।
संस्थान के महासचिव बाबूलाल भाट ने संगठन की आगामी योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि देश के सभी प्रान्तों में ‘युवा प्रशिक्षण वर्ग’ प्रारम्भ करने का निर्णय लिया गया है। इन वर्गों का उद्देश्य युवा पीढ़ी को वंशावली लेखन की मूल तकनीकों से परिचित कराना है। प्रशिक्षण के दौरान पारंपरिक लिपि पढ़ने, लिखने और वाचन की विधियों का अभ्यास कराया जाएगा, ताकि ज्ञान का हस्तांतरण व्यवस्थित रूप से हो सके और परम्परा की निरंतरता बनी रहे।
बैठक के दौरान धर्म जागरण समन्वय के अखिल भारतीय कार्यकर्ता अरुण कान्त और श्याम वसंत राव हरकरे ने भी उपस्थित कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया। उन्होंने वंशावली परम्परा को भारत की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए इसके संरक्षण को सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने संगठनात्मक अनुशासन, आपसी सहयोग और दीर्घकालीन दृष्टि के साथ कार्य करने का आह्वान किया।
दो दिनों तक चली इस बैठक में संगठनात्मक सत्रों के साथ-साथ विचार-विमर्श, अनुभव साझा करने और भावी रणनीति तय करने के सत्र आयोजित किए गए। बैठक का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि वंशावली लेखन की इस अनूठी भारतीय परम्परा को संरक्षित रखते हुए आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाएगा और समाज में इसकी प्रासंगिकता को और अधिक सशक्त रूप से स्थापित किया जाएगा। आयोजकों के अनुसार, यह बैठक वंश लेखकों के लिए केवल एक संगठनात्मक आयोजन नहीं, बल्कि उनकी पहचान, भूमिका और भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मंच साबित हुई।






