रनियां में ओवरब्रिज का इंतजार : हर रोज मौत को दावत देते लोग
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संवाद 24 संवाददाता। कानपुर देहात के रनियां कस्बे के हजारों लोग पिछले कई सालों से एक ओवरब्रिज का इंतजार कर रहे हैं। दिल्ली-कोलकाता 6 लेन हाई-वे ने जहां देश को जोड़ा, वहीं इस कस्बे को दो टुकड़ों में बांट दिया। हाई-वे के बीच लगे लोहे के बैरियर ने स्थानीय लोगों का रास्ता रोक दिया है। अब स्कूल जाते बच्चे, बाजार जाती महिलाएं, दफ्तर जाने मजदूर और बुजुर्ग सभी जान जोखिम में डालकर सड़क पार करते हैं। आए दिन हादसे हो रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारों की नींद नहीं टूट रही।
जानलेवा हो गया हाई-वे पार करना – रनियां औद्योगिक क्षेत्र का बड़ा केंद्र है। दिन-रात ट्रक,कंटेनर और तेज रफ्तार गाड़ियां दौड़ती रहती हैं। पहले लोग जहां-तहां से हाई-वे पार कर लेते थे, लेकिन 6 लेन बनने के बाद बीच में ऊंचे-ऊंचे लोहे के बैरियर लगा दिए गए। अब पार करने का एक ही रास्ता बचा है, बैरियर के नीचे रेंगना या ऊपर से कूदना। मैं रोज स्कूल जाती हूं। बैरियर के नीचे लेटकर गुजरना पड़ता है। किताबें गंदी हो जाती हैं, कपड़े फट जाते हैं। कई बार तो ट्रक वाले हॉर्न बजाते रहते हैं, डर लगता है कि कहीं कुचल न दें। प्रिया (नाम बदला हुआ), कक्षा 10 की छात्रा बुजुर्ग और दिव्यांग तो और भी बदतर हालत में हैं। कई बार तो उन्हें दूसरों की मदद लेनी पड़ती है।
आंदोलन पर आंदोलन, वादे पर वादे स्थानीय लोगों ने हार नहीं मानी। हस्ताक्षर अभियान चलाया, धरना-प्रदर्शन किए, सांसद-विधायक से लेकर जिलाधिकारी तक के चक्कर लगाए। सैकड़ों प्रार्थना-पत्र प्रधानमंत्री कार्यालय तक भेजे गए। आखिरकार एनएचएआई ने सर्वे कराया और ओवरब्रिज बनाने की स्वीकृति भी दे दी। लोगों को लगा कि अब राहत मिलेगी। लेकिन साल बीत गए, फाइलें इधर-उधर घूमती रहीं और निर्माण शुरू नहीं हुआ। अब लोग कहने लगे हैं, “बस उम्मीद छोड़ दी है। लगता है हमें यही जिंदगी काटनी है।
हादसे बढ़ते जा रहे, जिम्मेदारी कौन लेगा?पिछले दो सालों में रनियां हाई-वे पर कई जानलेवा हादसे हो चुके हैं। लोग बताते हैं कि अक्सर तेज रफ्तार वाहन बैरियर के पास रुके लोगों को टक्कर मार देते हैं। छोटे-मोटे हादसे तो रोज की बात है। ग्राम प्रधान राकेश यादव कहते हैं, हमने हर दरवाजा खटखटाया। एनएचएआई कहता है फंड नहीं है, लोक निर्माण विभाग कहता है यह हमारा प्रोजेक्ट नहीं।
आखिर जनता कहां जाए?” अब भी वक्त है रनियां की यह समस्या कोई नई नहीं है। देश के कई कस्बों-शहरों में ऐसे ही हालात हैं जहां हाई-वे ने लोगों की जिंदगी मुश्किल कर दी। जरूरत है तो सिर्फ इच्छाशक्ति की। अगर ओवरब्रिज या अंडरपास समय रहते बन जाए तो न जाने कितनी जिंदगियां बच सकती हैं।सवाल यह है कि क्या प्रशासन और एनएचएआई को तब तक इंतजार करना है जब तक कोई बड़ा हादसा हो जाए? या फिर रनियां के लोगों को अभी और कितने साल मौत के मुंह में धकेलते रहना है?






