
संवाद 24 नई दिल्ली। डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) के जरिए व्यापारियों को 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) यानी शुल्क लगाने के केंद्र सरकार के फैसले पर विवाद गहरा गया है। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ गई है। सरकार की ओर से यह दावा किया गया कि वित्त मामलों की संसद की स्थायी समिति ने इस तरह के राजस्व मॉडल का समर्थन किया था और रिपोर्ट अपनाए जाते समय कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद भी बैठक में मौजूद थे। वहीं, कांग्रेस पार्टी ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि उसके किसी भी सांसद ने सरकार द्वारा हाल ही में घोषित विशिष्ट यूपीआई शुल्क प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया था।
सरकार का पक्ष: समिति की रिपोर्ट और सांसदों की उपस्थिति
एक वरिष्ठ सरकारी पदाधिकारी के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने यूपीआई के लिए एक त्रि-स्तरीय (टियर्ड) एमडीआर राजस्व ढांचे की सिफारिश की थी। सरकार की तरफ से कहा गया कि समिति की 44वीं रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया था कि बिना देरी किए एक राजस्व मॉडल अधिसूचित और लागू किया जाना चाहिए, ताकि भुगतान सेवा प्रदाताओं की वित्तीय स्थिरता बनी रहे।
सरकारी सूत्रों का कहना था कि 12 अगस्त को जब समिति ने अपनी रिपोर्ट स्वीकार की, तब उसमें कांग्रेस के पांच प्रमुख सांसद – पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ मौजूद थे। सरकार का तर्क है कि प्रकाशित कार्यवृत्त (मिनट्स) में किसी भी सदस्य की ओर से असहमति (डिसेंट नोट) दर्ज नहीं कराई गई थी। इसके आधार पर सत्तापक्ष ने सवाल उठाया कि जब संसदीय समिति के पटल पर इस व्यवस्था की आवश्यकता पर सहमति थी, तो अब विपक्ष इसका विरोध क्यों कर रहा है।
कांग्रेस का खंडन: ‘विशिष्ट प्रस्ताव कभी सामने नहीं आया’
कांग्रेस ने सरकार के इन दावों को भ्रामक बताते हुए खंडन जारी किया। लोकसभा में पार्टी के उपनेता गौरव गोगोई ने कहा कि वित्त संबंधी संसदीय समिति के समक्ष सरकार द्वारा हाल ही में घोषित यूपीआई टैक्स या शुल्क का कोई विशिष्ट प्रस्ताव नहीं रखा गया था। गोगोई के अनुसार, जब वित्त विभाग के अधिकारी समिति के सदस्यों से मिले थे, तब उन्होंने यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने को लेकर कोई औपचारिक मसौदा प्रस्तुत नहीं किया था और एमडीआर को लेकर उठाए गए सवालों पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया था।
समिति के सदस्य और कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी प्रक्रियात्मक नियमों का हवाला देते हुए सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। तिवारी ने कहा कि संसदीय स्थायी समितियों की कार्यवाही विशेषाधिकार प्राप्त और गोपनीय होती है, जिसे राजनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए सार्वजनिक रूप से पेश करना अनुचित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 15 अक्टूबर से लागू होने वाले 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई मर्चेंट भुगतानों पर शुल्क की दर, मात्रा, छूट की सीमा आदि से संबंधित कोई विशिष्ट प्रस्ताव समिति की बैठक में विचारार्थ नहीं लाया गया था। उन्होंने कहा कि समिति में सामान्य सिद्धांत के रूप में भी एमडीआर की उपयोगिता और आवश्यकता पर चिंताएं दर्ज कराई गई थीं।
विवाद के केंद्र में क्या है नया यूपीआई नियम?
सरकार द्वारा घोषित नए नियम के तहत, 15 अक्टूबर से व्यापारियों को किए जाने वाले 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत तक का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) देय होगा। यह शुल्क केवल बड़े व्यापारी लेनदेन पर केंद्रित है और 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतानों के लिए इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये तय की गई है।
नियमों के मुताबिक, आम नागरिकों द्वारा किए जाने वाले दैनिक व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) लेनदेन और 2,000 रुपये तक के छोटे व्यापारी भुगतानों को पूरी तरह शुल्क मुक्त रखा गया है। इसके अतिरिक्त, रेलवे, टेलीकॉम, बीमा, ईंधन, बिजली और पाइप वाली प्राकृतिक गैस जैसी जनोपयोगी सेवाओं के लिए 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर 5 रुपये का फ्लैट शुल्क तय किया गया है।
संसदीय रिपोर्ट के तकनीकी बिंदु
संसदीय समिति की रिपोर्ट में मुख्य रूप से डिजिटल भुगतान तंत्र के वित्तीय अंतर (फंडिंग गैप) का विश्लेषण किया गया था। रिपोर्ट में रेखांकित किया गया कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए रूपे डेबिट कार्ड और कम मूल्य के भीम-यूपीआई लेनदेन के प्रोत्साहन हेतु 2,000 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन किया गया है।
समिति ने अपनी टिप्पणियों में कहा था कि उद्योग की वास्तविक परिचालन लागत लगभग 20,700 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जबकि वर्तमान सरकारी प्रोत्साहन केवल 11 प्रतिशत लागत को ही पूरा करता है। समिति का मानना था कि अत्यधिक सब्सिडी निर्भरता से साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकथाम और नेटवर्क बुनियादी ढांचे में दीर्घकालिक निवेश प्रभावित हो सकता है। इसी तकनीकी सिफारिश को आधार बनाकर सरकार ने राजस्व मॉडल को आवश्यक बताया, जबकि कांग्रेस का कहना है कि लागत विश्लेषण की सामान्य चर्चा को मौजूदा विशिष्ट शुल्क संरचना का प्रत्यक्ष समर्थन नहीं माना जा सकता। यह राजनीतिक और नीतिगत विवाद आगामी दिनों में संसद से लेकर सार्वजनिक मंचों तक चर्चा का विषय बना रहेगा।






